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अंडमान की वो जनजातियां जिनसे दूर रहते हैं लोग! देखते ही मार देते हैं तीर

कैच ब्यूरो | Updated on: 25 February 2021, 13:00 IST

भारत को विभिन्नता में एकता वाला देश कहा जाता है. यहां की जनसंख्या का 70% भाग आज भी गावों में रहता है. भारत में कुछ जनजातियां आज भी आदिम काल में जी रहीं हैं. इन्हीं जनजातियों में है जारवा जनजाति. यह जनजाति, अंडमान और निकोबार द्वीप समूह की 6 आदिवासी जनजातियों में से एक है.

इस जनजाति का सम्बन्ध नेग्रिटो समुदाय की जनजाति से है. वर्तमान में यह जनजाति मध्य अंडमान के पश्चिमी भाग और दक्षिण अंडमान के इलाके में रहती है.ये जगह है नॉर्थ सेंटिनल द्वीप में जो अंडमान निकोबार की राजधानी पोर्ट ब्लेयर से केवल 50 किलोमीटर की दूरी पर है.


23 वर्ग में फैले इस द्वीप में पिछले 60 सालों से इंसान रहते हैं. वर्ष 2011 में हुई जनगणना के मुताबिक यहां सिर्फ 10 ही घर हैं. कहा जाता है कि यहां रहने वाले आदिवासियों की संख्या 100 से भी कम है. लेकिन इस द्वीप पर रहने वाले आदिवासियों से कोई भी संपर्क नहीं बना सकता है और न ही उन पर कोई केस कर सकता है.

हालांकि इन आदिवासियों की भाषा शैली कैसी है ? वो क्या खाते-पीते हैं ? इस बारे में भी किसी को कोई जानकारी नहीं है.
वर्ष 2004 में सुनामी आई थी, उस दौरान उन आदिवासियों को बचाने के लिए भारतीय कोस्ट गार्ड के हेलिकॉप्टर भेजे गए थे. लेकिन उन लोगों ने हेलिकॉप्टर को देखते ही तीर चलाना शुरू कर दिया था.

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वहीं एक बार वर्ष 2006 में दो मछुआरे भटकर उस द्वीप पर पहुंच गए थे. इन आदिवासियों ने उन्हें भी जान से मार दिया था. एक अमेरिकी टूरिस्ट जॉन एलन चाऊ वहां उनसे मिलने पहुंचे थे. जिनकी हत्या भी इन आदिवासियों ने कर दी थी.

अंडमान-निकोबार में एक समय मूल जनजातियों के 6 से 7 समूह पाए जाते थे. जिसमें जारवा, ओन्गे, ग्रेट अंडमानीज, सेंटिनल द्वीप पर आज भी हजारों साल पुराना इंसानी कबीला रहता है.

बताते चलें कि भारत का क्रेंद्र शासित राज्य अंडमान-निकोबार द्वीप समूह 200 सालों तक ब्रिटिश राज में रहा था. इस दौरान अंग्रेद सरकार विद्रोहियों और खतरनाक अपराधियों को यहां की सेलुलर जेल भेज देती थी जिसे भारतीय कालापानी के नाम से भी जानते हैं. यहां के आदिवासी हमेशा से ही चर्चा में रहे हैं.

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First published: 25 February 2021, 13:00 IST
 
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