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नीलाभ 'अश्क': एक सच्‍चे अवां गार्द की झूठी मौत

अभिषेक श्रीवास्तव | Updated on: 24 July 2016, 14:42 IST
QUICK PILL
स्‍मृतिशेष

नीलाभ 'अश्क' नहीं रहे- इस सूचना की प्रतिक्रिया में शनिवार की सुबह अधिकतर इंसानी चेहरे प्रश्‍नवाचक चिह्न में तब्‍दील हो गए. उससे पहले तक उनका होना भी कई प्रश्‍नों से घिरा हुआ था. नीलाभ हिंदी के सृजनात्‍मक समाज में एक प्रश्‍न की तरह रहे, गोया कोई दूसरे ग्रह का निवासी आकर अमनपसंद व सभ्‍य धरतीवासियों को हर पल बेचैन करने में जुटा हुआ हो. याद पड़ता है कि वे जब इलाहाबाद से दिल्‍ली आए थे, तो साहित्‍य-समाज के तमाम लोगों ने उन पर पीठ पीछे फ़ब्‍ती कसी थी कि अपनी ज़मीन तलाशने बंदा ढलती उम्र में दिल्‍ली चला आया है. निगमबोध घाट पर उनकी अंतिम यात्रा में शामिल वे ही लोग यह कहते पाए गए कि दिल्‍ली आकर इस शख्‍स ने अपनी मिट्टी पलीद कर ली. ''ही इनवाइटेड हिज़ डेथ''- ऐसे वाक्‍य बार-बार कानों में पड़ते रहे.

सत्‍तर बरस की उम्र में ढेर सारा रंगा हुआ काग़ज़ छोड़कर चले जाना अस्‍वाभाविक नहीं होना चाहिए. क्‍या यूरोप में किसी ऐसे लेखक की मौत होती तो नज़ारा वही होता जो कल दिल्‍ली में था? पचास बरस से ज्‍यादा का रचनाकर्म, विविध क्षेत्रों में उत्‍कृष्‍ट सृजनात्‍मक काम, उर्दू व पंजाबी मिश्रित हिंदी भाषा की जादूगरी, नाटकों और कविताओं के उम्‍दा अनुवाद और आखिरी वक्‍त तक अपने संपादकत्‍व में निकलने वाली राष्‍ट्रीय नाट्य विद्यालय की पत्रिका 'रंग प्रसंग' के आखिरी अंक को यादगार बनाने की चेष्‍टा- ऐसी जिजीविषा और बहुमुखी ऊर्जा हिंदी प्रदेश के किस कोने में पाई जाती है? एक व्‍यक्ति अपने निजी जीवन में इस समाज की प्रचलित मान्‍यताओं को लगातार ठेंगे पर रखे रहा, केवल इसलिए क्‍या उसे आखिरी वक्‍त में अकेले छोड़ देना चाहिए?

पिछले एकाध महीने से बीमार चल रहे नीलाभ की अचानक हुई मौत इस शहर की मरती हुई संवेदना और हिंदी के रचना-वृत्‍त में बढ़ते हुए अलगाव पर एक गंभीर टिप्‍पणी है. दिल्‍ली ने इधर बीच कई मौतें देखी हैं. बीते एक साल के भीतर नीलाभ के साथी कवि वीरेन डंगवाल और पंकज सिंह चले गए. इन सब की मौत के बाद का आयोजन उसी अनुपात में व्‍यवस्थित रहा जितना इनका निजी जीवन था. इन सब के उलट नीलाभ सुबह पांच बजे गुज़रे, एकाध पड़ोसी लेखकों को छोड़ दें तो दिन के 11 बजे तक तक उन्‍हें घर जाकर पूछने वाला कोई नहीं था और दिन में डेढ़ बजे तक यह तय ही नहीं हो सका कि अंत्‍येष्टि कहां की जानी है. जब तय हुआ, उस वक्‍त केवल दो घंटे शेष थे. एम्‍बुलेंस शव को लेकर निगमबोध घाट पहुंची तो बमुश्किल बीस लेखक-पत्रकार वहां जमा थे. गेट पर खड़ी एम्‍बुलेंस में करीब बीस मिनट तक उनका शव पड़ा रहा, उसके बाद जब आगे जाकर शव को चबूतरे पर रखने की बारी आई तो दो पत्रकारों को अपना कंधा लगाना पड़ा.

नीलाभ की मौत शहर की मरती हुई संवेदना और हिंदी के रचना-वृत्‍त में बढ़ रहे अलगाव पर एक गंभीर टिप्पणी है

समय रहते कुछ और लेखक-पत्रकार पहुंच चुके थे. डर था कि नीलाभ का कर्मकांड भी आखिरी वक्‍त में कहीं राजेंद्र यादव जैसा न हो, लेकिन शव को जब सीएनजी शवदाहगृह ले जाया जाने लगा तो मित्रों ने राहत की सांस ली. शवदाह के तुरंत बाद हालांकि जो विद्रूप उपस्थित हुआ, वह इस बात की ताकीद करता है कि नीलाभ अपने जीते-जी वास्‍तव में कितने अकेले पड़ चुके थे. एक पत्रकार ने मौके पर कबीर की याद दिलाई जिनकी मौत के बाद फूल चुनने को लेकर लोग बंट गए थे. आज इस समाज में एक और कबीर मरा था. इस कबीर के लिए उन लोगों की ज़बान पर आज सिर्फ नुस्‍खे हैं, जो जीते-जी उनसे कटते ही रहे. यह बात इतनी नई भी नहीं है. बरसों पहले एक लेखक ने आधी रात में नीलाभ को अपने घर से सड़क पर निकाल फेंका था. नीलाभ कोई सनकी नहीं थे कि सबके लिए उनके मन में बराबर रुखाई बनी रही. इसकी ठोस वजहें थीं. बेशक, कुछ वजहें अपनी भी थीं.

अज्ञेय ने 'शेखर: एक जीवनी' में शेखर के पिता के लिए एक जगह लिखा है कि हर व्‍यक्ति को अपनी रुखाई का मोल जिंदगी के किसी कोने में अकेले में चुकाना ही पड़ता है. अधिकतर लोगों को नीलाभ से यही शिकायत है कि उन्‍होंने किसी को नहीं बख्‍शा. बरसों बरस वे अपने निकटतम मित्रों से नाराज़ रहे, फिर पिघल भी गए. अज्ञेय के ही शब्‍दों में ''सबके प्रति सूक्ष्‍म अवमानना'' के पीछे छुपे वैचारिक कनविक्‍शन को हिंदी का समाज नहीं समझता. एक सामंती आवरण है जिसके भीतर सृजनात्‍मकता का सारा कारोबार यहां फलता-फूलता रहता है. नीलाभ इस सामंती आवरण को छिन्‍न-भिन्‍न करते थे. शायद यही वजह है कि वे हमारे समय के सबसे लोकतांत्रिक लेखकों में से एक थे जो अपनी उम्र से आधे से भी कम लड़कों को बराबरी से बरतते थे. उनका निजी जीवन तो खैर इसका गवाह ही है. राजेंद्र यादव, जिनकी लोकतांत्रिकता का दम भरते लोग नहीं अघाते हैं, उनमें एक अलग किस्‍म की भव्‍यता थी. नीलाभ में यह नदारद थी. उनके भीतर एक लुम्‍पेन बैठा हुआ था. यह कला में बुनियादी प्रेरणा या ईमान को नए सिरे से खोजने या ईजाद करने की ज़रूरत से पैदा होता था. नीलाभ की पंजाबियत इसमें छौंक लगाती थी. इस अर्थ में कहें तो वे एक सच्‍चे अवां गार्द थे.

असद ज़ैदी ने एक बार लिखा था कि ''पूंजीवाद अवां गार्द को भी जल्‍द ही वल्‍गराइज़ कर डालता है'' (कुछ बातें- अवां गार्दिज्‍़म-1). नीलाभ के साथ दरअसल यही हुआ है. मुख्‍यधारा से बाहर जाकर किए गए काम के रास्‍ते इस अवां गार्द के ''दूल्‍हा बनने की बारी'' तो आजीवन कभी नहीं आई, लेकिन हिंदुस्‍तानी पूंजीवाद के सामंती ज़हर-बुझे तीरों ने एक बड़ी शख्सियत को जीते-जी अश्‍लील बना डाला. इस बात को कहने में कोई दिक्‍कत नहीं होनी चाहिए कि नीलाभ इस हिंदी समाज के लायक नहीं थे और हिंदी समाज नीलाभ जैसी अराजक प्रतिभाओं को बरदाश्‍त करने के लायक अभी नहीं बन सका है.

उन्‍हें शनिवार को दिन में 12 बजे समाचार अपार्टमेंट के करीब स्थित रिवरसाइड क्‍लब में विश्‍वमोहन बडोला के 80वें जन्‍मदिवस की पार्टी में आना था. कवि मंगलेश डबराल से उन्‍होंने कहा था कि उनके पैरों में दिक्‍कत है इसलिए वे शायद न आ पाएं. यह सूचना देते हुए नीलाभ के निकटतम मित्रों में एक पत्रकार आनंदस्‍वरूप वर्मा कहते हैं, ''पैर में दर्द था तो पार्टी में नहीं आ सका, लेकिन इतनी लंबी यात्रा पर निकल गया.'' कह कर वे बमुश्किल ऐसे मुस्‍कराते हैं जैसे काफी कुछ अनकहा भीतर रह गया हो. नीलाभ 'अश्क' के बारे में जितना कहा गया है, उससे कहीं ज्‍यादा अनकहा लोगों के निजी संस्‍मरणों और यादों में संचित है. काश, यशपाल का 'परदा' प्रेमी हिंदी समाज कभी इतनी हिम्‍मत जुटा पाता कि- धूमिल के शब्‍दों में- ''भाषा के भुन्‍नासी ताले को खोलता'' और उस शख्‍स के बारे में बस एक बार सच बोल देता, जिसकी जिंदगी में एक परदे के सिवाय बाकी सब कुछ था.

First published: 24 July 2016, 14:42 IST
 
अभिषेक श्रीवास्तव @abhishekgroo

स्‍वतंत्र पत्रकार हैं. लंबे समय से देशभर में चल रही ज़मीन की लड़ाइयों पर करीबी निगाह रखे हुए हैं. दस साल तक कई मीडिया प्रतिष्‍ठानों में नौकरी करने के बाद बीते चार साल से संकटग्रस्‍तइलाकों से स्‍वतंत्र फील्‍डरिपोर्टिंग कर रहे हैं.

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