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'अभी जान की क़ीमत केवल श्मशान है'

कैच ब्यूरो | Updated on: 29 July 2017, 13:06 IST

रजा फाउंडेशन ने दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर के साथ मिलकर कविता पाठ की एक नई श्रृंखला 'आज कविता' शुरू की है, जिसका दूसरा आयोजन गुरुवार शाम किया गया. इसमें लीलाधर मंडलोई, अरुणाभ सौरभ, आस्तीक वाजपेयी और प्रभात त्रिपाठी ने अपनी कविताओं के माध्यम से बाहर व भीतर की दुनिया के कोलाहल को बिना किसी लुकाव-छुपाव के श्रोताओं के सामने रखा. कार्यक्रम का संचालन प्रसिद्ध साहित्यकार व रजा फाउंडेशन के प्रबंध न्यासी अशोक वाजपेयी ने किया.

इस कार्यक्रम में कई जाने-माने साहित्यिक जनों के अलावा कविता में रुचि रखने वाले सामान्य श्रोता भी मौजूद थे. सभी ने रजा फाउंडेशन की इस पहल को सराहा. योजना के अनुसार, इस आयोजन में दो वरिष्ठ व दो युवा कवियों को कविता पाठ के लिए आमंत्रित किया गया था.

कविता पाठ का आरंभ अरुणाभ ने अपनी कविता 'दुनिया बदलने तक' से की. 'लौट आओ पंछियों, चहको इतनी तेज कि हुक्मरानों के कान के परदे फट जाएं'. अरुणाभ की कविताओं में मिथिला और बिहार की सौंधी खुशबू थी. उनकी कविता 'बेरोजगार लड़का' बेरोजगार युवाओं के संघर्ष के विभिन्न परतों को उधेड़ता है वहीं पटना की गलियों को जीवंत कर देता है. उनकी कविता की पंक्ति 'अभी जान की कीमत केवल श्मशान है', एक कड़वी सच्चाई को सामने रख हृदय में उथल-पुथल पैदा कर देता है.

लीलाधर मंडलोई की कविताओं में सीरिया, इराक में हो रही हिंसा से लहूलुहान हुई मानवता चीखती हुई सुनाई पड़ती हैं, लेकिन 'वे हमारी तरह जीवन का रोना नहीं रोते हैं' पंक्तियां वहां के लोगों के संघर्ष और जिजीविषा को सलाम करने के लिए मजबूर करती हैं.

'कहीं नहीं है कोई भी मानवीय चेहरा, मानवीय सरकार' कवि आशा और निराशा के लहरों में एक पल झूलता हुआ दिखता है, तो दूसरे ही पल युद्ध और अशांति के बीच प्यार भरी एक रात की याचना करता है. उनकी पराजित कविता में पर्दों में कैद की हुई स्त्री की आजाद आंखें अचानक सभागार में ठंडी हवा का झोंका ले आती हैं.

'ऐस ही होता है' कविता में आस्तीक वाजपेयी ने द्वंद्व और यथार्थ से उत्पन्न बेचैनी के ताने बाने को महाभारत के पात्रों के माध्यम से सटीक तरीके से व्यक्त किया है. आस्तीक अपनी कविता 'दांडी' में कहते हैं कि मानवीय होना सही होने से ज्यादा जरूरी है.

गांधी के आदर्श और गीता के संदेश के बीच तर्क-वितर्क करती यह कविता कई सवाल जेहन में छोड़ जाती है. उनकी कविता 'पहला चुंबन' की पंक्तियां 'मिट्टी और पानी का जब पहला मिलन हुआ था, तब तुम ही थी जिसे मैंने पाया था पहली बूंद में' भावनाओं के सागर में गोते लगाने के लिए मजबूर करती हैं.

प्रभात त्रिपाठी की कविता 'एक आदमी सिर पर पत्थर रख कर जा रहा था' यथार्थ के रूप और उन्हें समझने के नजरिये पर सवाल खड़ा करता है. उनकी कविता 'बड़ी सड़क पर मां के साथ चलती बच्ची' का बिंब, गरीबी, शहर की विशालता और भीड़ में खोते जीवन की कहानी है.

प्रभात की प्रेम कविताओं में जहां एक तरफ मृत्यु की आहट है, वहीं पल को भरपूर जीने की इच्छा है. उन्होंने लंबे शोक गीत के कुछ अंश भी सुनाए, जिसमें जीवन और मृत्यु के बीच सुकून देने वाली शांति पसरी हुई है.

रजा फाउंडेशन की स्थापना विख्यात कलाकार स्वर्गीय सैयद हैदर रजा द्वारा की गई थी. 'आज कविता' को महत्वाकांक्षी परियोजना के रूप में फाउंडेशन के प्रबंध न्यासी अशोक वाजपेयी द्वारा शुरू किया गया है.

(स्रोत-आईएएनएस)

First published: 29 July 2017, 13:06 IST
 
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