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ये कविताएं सत्‍ता का सिरदर्द हैं!

अभिषेक श्रीवास्तव | Updated on: 12 January 2016, 11:16 IST
QUICK PILL

16 मई,\r\n2014 - यह\r\nनरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री\r\nचुने जाने की तारीख थी,\r\nलेकिन\r\nबड़ी संख्या में लोगों के लिए\r\nयह 2015\r\nके\r\nअंत तक प्रतिरोध की तवारीख\r\nबन चुकी थी.\r\nइस\r\nतवारीख का एक दृश्य दिल्‍ली\r\nमें चल रहे विश्‍व पुस्‍तक\r\nमेले में आगामी बुधवार को\r\nदिखेगा जब देश भर से कुल 59\r\nचुनिंदा\r\nकवियों की रचनाओं का संकलन\r\n\'\'प्रतिरोध\r\nका पक्ष\'\'\r\nनाम\r\nसे लोकार्पित किया जाएगा.

बीते साल 30 अगस्‍त को साहित्‍य अकादमी पुरस्‍कृत कन्‍नड़ के विद्वान प्रो. एमएम कलबुर्गी की हत्‍या पर अकादमी की चुप्‍पी व उपेक्षा के खिलाफ़ जब हिंदी के लेखक उदय प्रकाश ने अपना साहित्य अकादमी पुरस्‍कार लौटाया, तब कोई नहीं जानता था कि आने वाले दिनों में यह प्रतीकात्‍मक कार्रवाई एक आंदोलन का रूप ले लेगी.

महीने भर के फासले के बाद अक्‍टूबर से जब पुरस्‍कार वापसी की झड़ी लगी और दुनिया भर के वैज्ञानिकों, लेखकों, बुद्धिजीवियों व अकादमिकों ने एक स्‍वर में देश में पनप रहे असहिष्‍णुता के माहौल की निंदा करनी शुरू की, तो देखते-देखते यह अंतरराष्‍ट्रीय मसला बन गया. आज़ादी के बाद भारत में पहली बार ऐसा कुछ घट रहा था, जिसने बहुमत से चुनी हुई सरकार के इक़बाल को हिला दिया था. ''असहिष्‍णुता'' 2015 में सत्‍ता की पहचान बन चुकी थी.

इसी दौरान एक पक्ष ऐसा भी था जो पुरस्‍कार वापसी को आत्‍मप्रचार का स्‍टन्‍ट करार देते हुए बार-बार इस बात पर ज़ोर दे रहा था कि लेखकों को अपने लेखन से प्रतिरोध करना चाहिए. इसमें बड़ी संख्या उनकी थी जिन्‍होंने कभी भी अपने लेखकों के लिखे को गंभीरता से पढ़ने की ज़हमत नहीं उठायी, वरना उन्‍हें पता होता कि असहिष्‍णुता पर बहस जहां से शुरू हो रही थी वहां प्रतिरोध का लेखन परिपक्‍व आकार ले चुका था. इस लेखन को अक्‍टूबर 2014 से ही सहेजने का काम देश भर में एक अभियान कर रहा था, जिसका नाम था ''कविता: 16 मई के बाद''.

16 मई, 2014 - यह नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री चुने जाने की तारीख थी, लेकिन बड़ी संख्या में लोगों के लिए यह 2015 के अंत तक प्रतिरोध की तवारीख बन चुकी थी. इस तवारीख का एक दृश्य दिल्‍ली में चल रहे विश्‍व पुस्‍तक मेले में आगामी बुधवार को दिखेगा जब देश भर से कुल 59 चुनिंदा कवियों की रचनाओं का संकलन ''प्रतिरोध का पक्ष'' नाम से लोकार्पित किया जाएगा.

जैसा कि नाम से स्‍पष्‍ट है, प्रतिरोध का यह पक्ष एक दिन में नहीं बना बल्कि इसकी आहटें 16 मई 2014 के बाद से ही सुनी जानी शुरू हो चुकी थीं. यह हिंदी में राजनीतिक कविताओं की वापसी का संकेत था, जो नई सरकार के छह माह बीतते-बीतते अक्‍टूबर तक साफ़ सुना जाने लगा था. इन्‍हीं स्‍वरों को पहली बार ''कविता: 16 मई के बाद'' के बैनर तले दिल्‍ली के प्रेस क्‍लब में अक्‍टूबर 2014 में संगठित किया गया.

प्रेस क्‍लब का क्षमता से ज्‍यादा भरा हुआ दालान बता रहा था कि नई सरकार का इक़बाल छह महीने में ही चुक रहा है. इसके बाद उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखण्‍ड, पंजाब और असम तक यह मुहिम जा पहुंची. सुदूर गांवों, कस्‍बों, जनपदों के सैकड़ों कवियों ने कविताओं से अपना आक्रोश प्रकट किया. सरकार का साल पूरा होने पर 17 मई, 2015 को दिल्‍ली में एक दिन का भारी जुटान हुआ जिसमें 10 राज्‍यों से आए लेखकों ने हिस्‍सा लिया.

राजनीतिक सत्‍ता के प्रतिरोध में एक सांस्‍कृतिक विपक्ष के खड़े होने का यह मज़बूत संकेत था, जिसे सत्‍ता, उसके प्रतिष्‍ठानों और मीडिया ने सिर्फ इसलिए नज़रंदाज़ किया क्‍योंकि प्रतिरोध लेखन के माध्‍यम से हो रहा था. 20 फरवरी, 2015 को दिन के उजाले में कामरेड गोविंद पानसरे की हत्‍या के बावजूद लेखक अगर अब भी लिख पा रहा था, तो इसलिए क्‍योंकि उसकी अपने लेखकीय प्रतिरोध में आस्‍था कायम थी.

सिर्फ तीन महीने लगे लेखक को यह बात समझने में कि अकेले लेखन से राजनीतिक सत्‍ता का प्रतिरोध कारगर नहीं हो सकता. फिर एक और गोली चली. प्रो. कलबुर्गी की हत्‍या कर दी गई. एक लेखक ने अपनी कलम खड़ी कर दी. पहली पुरस्‍कार वापसी उदय प्रकाश के रूप में हुई. इसके बाद करीब महीने भर सन्‍नाटा रहा, लेकिन 28 सितंबर को दादरी में हुई अखलाक़ की हत्‍या ने सतह के नीचे खदबदा रहे असंतोष को अंतिम हवा दे दी.

असहिष्‍णुता और पुरस्‍कार वापसी के नाम रहे साल 2015 का कोई भी जि़क्र ''कविता: 16 मई के बाद'' नामक अभियान के बगैर अधूरा ही होगा. लेखक का बुनियादी धर्म लिखना है, लेकिन 16 मई, 2014 के बाद दिल्‍ली से लेकर झारखण्‍ड और बिहार के सुदूर गांवों तक जो कुछ भी लिखा-पढ़ा गया, उसकी संगठित शिनाख्‍त अकेले प्रस्‍तुत संकलन में मिलती है जिसे संभव प्रकाशन ने छापा है और कवि रंजीत वर्मा ने संपादित किया है, जो ''कविता: 16 मई के बाद'' के राष्‍ट्रीय संयोजक भी हैं.

देश भर का चक्कर लगा कर प्रतिरोध का पक्ष 13 जनवरी की सुबह 11 बजे देश भर के लेखकों की मौजूदगी में प्रगति मैदान में पुस्तक के रूप में सामने आएगा. राजनीतिक प्रतिरोध की कविताएं पहले भी लिखी जाती रही हैं, लेकिन 16 मई 2014 के बाद की रचनाओं में ऐसा क्‍या खास है, उसके बारे में संपादकीय टिप्‍पणी की इन पंक्तियों से बेहतर परिचय फिलहाल कुछ नहीं हो सकता.

''कविता: 16 मई के बाद'' का अर्थ 16 मई, 2014 के बाद की तारीख में लिखी गई कविताओं से सिर्फ नहीं है बल्कि उसके प्रतिरोध के चरित्र से है. ऐसा प्रतिरोध जो तथ्‍य दर्ज करता है और फिर उन्‍हीं तथ्‍यों के आधार पर अपने समय से जिरह करता है. यहां सिर्फ भावनाओं का उत्‍कट संसार नहीं होता. इस अर्थ में यह पहले की प्रतिरोध की कविताओं से भिन्‍न है. इन कविताओं का इस्‍तेमाल सत्‍ता कभी नहीं कर सकती, जैसा कि पहले की कविताओं का वे यदा-कदा कर लेते हैं. ये कविताएं उनके माथे में तेज़ उठने वाले दर्द की तरह हमेशा मौजूद रहेंगी.

(लेख में प्रस्तुत विचार लेखक के निजी हैं. संस्थान का इनसे सहमत होना जरूरी नहीं है)

First published: 12 January 2016, 11:16 IST
 
अभिषेक श्रीवास्तव @abhishekgroo

स्‍वतंत्र पत्रकार हैं. लंबे समय से देशभर में चल रही ज़मीन की लड़ाइयों पर करीबी निगाह रखे हुए हैं. दस साल तक कई मीडिया प्रतिष्‍ठानों में नौकरी करने के बाद बीते चार साल से संकटग्रस्‍तइलाकों से स्‍वतंत्र फील्‍डरिपोर्टिंग कर रहे हैं.

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