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इसलिए निकलती है जगन्नाथ यात्रा, पुराणों में है विशेष महत्व

कैच ब्यूरो | Updated on: 14 July 2018, 12:55 IST

ओडिशा के पुरी में भगवान जगन्नाथ की यात्रा शुरू हो गई है. इस बार भगवान जगन्नाथ की इस सालाना रथयात्रा का थीम को 'धरोहर' रखा गया है. पुरी की ये रथ यात्रा कई मायनों में बहुत महत्वपूर्ण है. यूनेस्को ने इस यात्रा के एक हिस्से को वर्ल्‍ड हेरिटेज यानी कि वैश्विक धरोहर की सूची में शामिल किया गया है.

भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा (Jagannath RathYatra) आषाढ़ शुक्ल द्वितीया को जगन्नाथपुरी से शुरू होती है. देश के अलग-अलग हिस्सों से इस यात्रा में शामिल होने लोग आते हैं.

 

आषाढ़ महीने की द्वितीय तिथि को भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा का आयोजन किया जाता है. अहमदाबाद में आज यानी 14 जुलाई से भगवान जगन्नाथ की 141वीं रथयात्रा शुरू हो गई है. अहमदाबाद में रथयात्रा का शुभारंभ भगवान जग्गनाथ के मुख्य मंदिर से शुरू हुआ है. इसके अलावा ओडिशा के पुरी में भी भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा शुरू हो चुकी है.

इस रथ यात्रा में साल में एक बार भगवान को गर्भ गृह से निकालकर यात्रा कराई जाती है. भगवान जगन्नाथ के साथ भगवान कृष्ण, उनके भाई बलराम और बहन सुभद्रा को भी रथ में बैठाकर यात्रा कराई जाती है. ये उत्सव पूरे 9 दिनों तक मनाया जाता है.

 

पुरी जग्गनाथ यात्रा का महत्व

पुरी की जगन्नाथ यात्रा का महत्व सबसे ज्यादा माना जाता है. भारतीय पुराणों में जगन्नाथ पुरी को धरती का बैकुंठ कहा गया है. ब्रह्म और स्कंद पुराण के अनुसार, पुरी में भगवान विष्णु ने पुरुषोत्तम नीलमाधव के रूप में अवतार लिया था.

इस रथ यात्रा के दौरान भगवान् बलराम, श्रीकृष्ण और देवी सुभद्रा के रथों को तैयार किया जाता है. रथा यात्रा में सबसे बलराम जी का रथ फिर देवी सुभद्रा और अंत में भगवान् जगन्नाथ श्रीकृष्ण का रथ होता है. रथों को उनके रंगों और ऊंचाई से पहचाना जाता है.

पुरी का ये जगन्नाथ धाम करीब 800 सालों से भी ज्यादा पुराना माना जाता है. भगवान जगन्नाथ का नंदीघोष रथ 45.6 फीट ऊंचा, बलरामजी का तालध्वज रथ 45 फीट ऊंचा और देवी सुभद्रा का दर्पदलन रथ 44.6 फीट ऊंचा होता है.

कैसे होती है रथ यात्रा
रथ यात्रा की शुरुआत रथ के सामने सोने के हत्थे वाली झाड़ू लगाकर की जाती है. उसके बाद परंपरा के अनुसार ढोल ताशों के बीच भगवान् का ये रथ सैकड़ों लोग खींचते हैं.रथ यात्रा में सबसे पहले बालभद्र का रथ प्रस्‍थान करता है. उसके बाद बहन सुभद्रा का रथ चलता है. फिर आखिर में भगवान जगन्नाथ का रथ खींचा जाता है.

 

ऐसी मान्यता है कि जो भी इस रथ को खींचता है उसके सभी कष्ट दूर हो जाते हैं. और मोक्ष की प्राप्ति होती है. रथ दिन भर नगर भ्रमण करते हैं और फिर तीनों रथ गुंडिचा मंदिर पहुंच जाते हैं. अगले दिन भगवान रथ से उतर कर मंदिर में प्रवेश करते हैं और सात दिन वहीं रहते हैं. ऐसा कहा जाता है कि गुंडिचा मंदिर को भगवान् जगन्नाथ की मौसी का घर माना जाता हैं.

जगन्नाथ मंदिर की कुछ ख़ास बातें

जगन्नाथ मंदिर के शिखर पर एक झंडा लगाया गया है. ये झंडा हमेशा हवा की विपरीत दिशा में लहराता है. इस मंदिर में रखा एक चक्र भी आश्चर्य के विषय है. इसे भगवान् श्रीकृष्ण का सुदर्शन चक्र माना जाता है, ऐसा कहते कि इस चक्र को किसी भी दिशा से मालूम होता है जैसी चक्र का मुंह देखने वाले की तरफ है.

First published: 14 July 2018, 12:55 IST
 
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