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अगर एक्टिंग का मन न हो तो एक्टर के साथ काम से तौबा करनी चाहिए

तत्याना षुर्लेई | Updated on: 28 January 2017, 8:31 IST

राहुल ढोलकिया की रईस गॉड फादर परंपरा की एक नयी फ़िल्म है. फ़िल्म का नायक, रईस (शाहरुख़ खान) बचपन से बहुत ही चालाक है. कमजोर आंखों के बावजूद होशियारी हमेशा उसका साथ देती है.

वह शहर जाकर एक बड़े गैंगस्टर के लिए काम करना शुरू कर देता है. रईस जवान होकर अपना खुद का धंधा शुरू करना चाहता है, लेकिन जब वह खुद बड़ा गैंगस्टर बन जाता है और पुलिस इंस्पेक्टर (नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी) से लुकाछिपी का खेल शुरू होता है, तभी अचानक से फ़िल्म का पूर्वनियोजित प्लॉट टूट जाता है और कहानी गायब हो जाती है.

इंस्पेक्टर रईस को बार-बार गिरफ्तार करने की कोशिश करता है और रईस नई-नई चालाकियों के साथ हर बार उसके फंदे से बच निकलता है. कहानी में अचानक से थोड़ा-सा रोमांस भी आ जाता है. फिर फिल्मवाले गरीबों के प्रति रईस के दयालु मनोभाव की जानकारी देते हैं.

इसके बाद फिर से कुछ चालाकियां दिखाई जाती हैं और अंत में एक बड़ी धोखेबाजी का शिकार होकर नायक मारा जाता है. असल में यह पूरी फ़िल्म सिर्फ कुछ रेखाचित्रों का कोलाज बनकर रह गयी है, जिसमें नायक के मनोवैज्ञानिक चित्र का अभाव सबसे अधिक खटकने वाली बात है.

कमजोर स्क्रिप्ट

अच्छी स्क्रिप्ट नहीं होने के बावजूद नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी ने अपने दर्शकों को चमकदार अभिनय दिया है जबकि शाहरुख़ खान असफल रहे हैं. मधुर भंडारकर की 'हीरोइन' फ़िल्म में यह बात अच्छी तरह दिखाई जाती है कि भारतीय फ़िल्म इंडस्ट्री में दो तरह के लोग अभिनय करते हैं एक्टर्स और हीरोज.

'रईस' इस बात का बहुत अच्छा उदहारण है, शाहरुख़ खान इसमें बस हीरो है जो सिर्फ दर्शन देने और लोगों द्वारा पसंद किये जाने वाले भाव के साथ दर्शकों के सामने आता है. यह बात फ़िल्म में उसके पहले दृश्य के साथ ही स्थापित हो जाती है, जब दर्शक हीरो के चेहरे से मुखातिब होने के पहले ही उसके परफेक्ट नंगे शरीर दर्शन करते हैं.

पूरी फ़िल्म में शाहरुख़ खान के ऐसे ही चित्रों की भरमार है, स्लो मोशन में चलने वाले और दस लोगों को झटपट निपटाने वाले हीरो की. शाहरुख़ खान ज्यादा कुछ नहीं करता है, मानो उसका शरीर और उसकी सुपरस्टार वाली पदवी ही सफलता की चाभी है. और यह सचमुच काफी हो सकता था अगर फिल्मवाले नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी के लिए फ़िल्म में जगह नहीं बना पाने में सफल हो पाते.

शाहरुख़ खान की एक्टिंग ठीक है लेकिन नवाज़ुद्दीन के साथ काम करने के लिए शाहरुख़ को ज्यादा तैयारी करनी चाहिए थी

फ़िल्म के दूसरे एक्टर्स, खास तौर पर फ़िल्म की हीरोइन के सामने शाहरुख़ खान की एक्टिंग ठीक है लेकिन नवाज़ुद्दीन के साथ काम करने के लिए शाहरुख़ को ज्यादा तैयारी करनी चाहिए थी. यह इसलिए कहा जा रहा है क्योंकि शाहरुख़ खान ने अपनी पुरानी फिल्मों में दिखाया है कि उनको अभिनय आता है. लेकिन हाल के कउछ सालों के अनुभव से लगता है कि वह अपने इस हुनर लगातार भूलते जा रहे हैं.

कभी-कभी तो यह भी लगता है कि हिंदी सिनेमा में आये इधर के बदलावों का सबसे बड़ा शिकार शाहरुख़ खान हो गए हैं. पहले के ज़माने में फिल्म उद्योग में एक सीधा विभाजन था– एक ओर मुख्य धारा की फिल्में थीं तो दूसरी ओर में पैरेलल (सामानांतर) सिनेमा. आजकल दोनों विधाएं एक साथ मिलने लगी हैं और अक्सर साथ रहकर कुछ न कुछ नया और ताज़ा भी दे रही हैं.

कुछ एक्टर्स, जैसे सलमान खान, पुराने ढर्रे वाली मुख्यधारा की फिल्मों से ही खुश हैं और उनको और उनके प्रशंसकों को कुछ नया देखने की ज़रुरत नहीं है. आमिर खान जैसे एक्टर भी हैं जो नये माध्यमों और अनुभवों को आजमाते हैं और दोनों तरीकों के सिनेमा में शानदार प्रदर्शन करते हैं.

शाहरुख़ खान हमेशा सलमान और आमिर के बीच की चीज होते थे. लेकिन नयी फिल्मों और अभिनय के नये तरीकों के बारे में अवगत होने के बावजूद वह अपना नया स्टाइल नहीं ढूंढ़ सके. इस फिल्म के साथ अच्छी बात यह रही कि उन्होंने 'रईस' में 'डॉन' बनने की कोशिश नहीं की. फिर भी यह साफ दिख गया कि अपनी हीरो वाली छवि को बरकरार रखने के लिए उसके पास कोई नया आईडिया नहीं है.

70 के दशक की याद

'रईस' सत्तर के दशक में बनी हुई फिल्मों से प्रेरित है. परदे पर आते-जाते रईस का अपनी मां के प्रति बार-बार दिखाए जाने वाले प्रेम से लेकर सनी लियोन के गाने में हेलेन की छवि उकेरना इसी कोशिश का नतीजा है. फिल्म में अमिताभ बच्चन की फिल्में देखते 'रईस' के किरदारों से भी इसे समझा जा सकता है.

उस दौर की अमिताभ की फिल्मों में ‘खतरनाक व्यवसाय’ एक केंद्रीय विषय की तरह सामने आता है. लेकिन रईस की शख्सियत में सत्तर के दशक वाले ‘एंग्री यंग मैन’ वाली छवि बिलकुल नदारद है. रईस बचपन से गैंगस्टर के साथ काम करता है, वह बहुत चालक है, फिर अचानक रोमांटिक प्रेमी बन जाता है और बाद में शहर के गरीबों की देखभाल करने वाला रॉबिनहुड बन जाता है. इस अचानक बदलाव और उसके दोहरे व्यक्तित्व की कोई भी व्याख्या फिल्म में नहीं है.

अफ़सोस की बात यह है कि फिल्मकार ने यह नहीं दिखाया कि रईस का साम्राज्य (एम्पायर) कैसे खड़ा हुआ

फ़िल्म में एक प्रभावी प्लॉट अधिक दिलचस्पी जगाने में हमेशा सहायक होता है. शायद इसीलिए नायक में आये इस अचानक बदलाव को फ़िल्म में जगह दी गयी है, क्योंकि फ़िल्म के पहले हिस्से में दर्शक पुलिस ऑफिसर की तरफ खड़े नज़र आते हैं, फ़िल्म के हीरो की तरफ नहीं. और यह कोई सामान्य बात नहीं है जबकि यह हीरो अच्छा आदमी है, चालाक है, बहादुर है और तो और रोमांटिक भी है. फिर भी कड़क पुलिस इंस्पेक्टर में एक ऐसा चमत्कार है कि दर्शक अपना ध्यान इससे हटा ही नहीं पाते.

शायद इसीलिए फ़िल्म के दूसरे हिस्से में दर्शकों को जोर देकर यह बताना चाहिए था कि रईस सच में बहुत अच्छा आदमी है. वह सबकी मदद करता है, गरीब लोगों के लिए मकान बनवाना चाहता है. इन्हीं सब सामाजिक कामों में कुछ लोग रईस को धोखा देते हैं और यह सब हीरो के लिए रो पड़ने वाली बात बन जाती है.

यहां पर एक सवाल उभरता है कि अगर ऐसा ही हीरो बनवाना था तो उसे गैंगस्टर बनाने की क्या जरूरत थी? गैंगस्टर हीरो में बहुत सारी संभावनाएं हैं जिनको फिल्मवालों ने मिस किया और जो बच गया उसका सही इस्तेमाल शाहरुख़ खान ने खुद ही नहीं किया.

फ़िल्म की फोटोग्राफी बहुत अच्छी है. इसमें ज्यादातर नीला और हरा रंग दिखाई देता है जो रईस के पॉलिटिकल कैंपेन के पोस्टर के रंग हैं. जो दुनिया दर्शकों को दिखाई जाती है वह रईस की ‘अपनी दुनिया’ है. फ़िल्म का नैरेटर पुलिस ऑफिसर है, लेकिन जो दर्शक देखते हैं वह सब कुछ रईस की आंखों से देखते हैं.

एक और अफ़सोस की बात यह है कि फिल्मकार ने यह नहीं दिखाया कि रईस का साम्राज्य (एम्पायर) कैसे खड़ा हुआ और साथ-ही-साथ उसकी सफलताओं का कोई तार्किक कारण रख पाने में भी समर्थ नहीं हो सके. हां, फ़िल्म एक भ्रष्टाचार के बड़े जंजाल के बारे में है जिसमें पुलिस, पॉलिटिक्स और गैंगस्टर्स सब साथ-साथ काम करते हैं. लेकिन जितनी जल्दी वे लोग एक दूसरों के दोस्त बनते हैं, उतनी ही जल्दी एक दूसरे से नफरत भी कर सकते हैं.

पुरानी और नयी सिनेमा का एक छोटा कन्फ्यूजन फ़िल्म के गानों में भी दिखाई देता है. उदहारण के लिए 'धिंगाना' गाने के शुरू में रईस और उसके दोस्त गाना गाते हैं लेकिन कुछ समय बाद, मानो उन्हें अचानक याद आया कि यह उस तरह की फ़िल्म नहीं है इसीलिए गाना बंद हो जाता है और सिर्फ बैकग्राउंड म्यूजिक बनकर रह जाता है जैसे नयी फिल्मों में होता है.

'जालिमा' गाने का सीक्वेंस बस एक बड़ा झटका है इसके लिए फ़िल्म में बिल्कुल स्थान नहीं है और यह रोमांटिक से ज्यादा पैथेटिक लगता है. इसी तरह फ़िल्म का रोमांस वाला हिस्सा भी नेचुरल कम कृत्रिम ज्यादा लगता है.

First published: 28 January 2017, 8:31 IST
 
तत्याना षुर्लेई @catchhindi

तत्याना षुर्लेई पोलैंड की रहने वाली हैं. वह एक इंडोलॉजिस्ट (भारतीय उपमहाद्वीपीय भाषा और संस्कृति की जानकार) हैं. फिल्म समीक्षा बी करती रहती हैं. हिंदी की मशहूर पत्रिकाओं और ब्लॉग्स के लिए लिखती रही हैं. पोलैंड के शहर क्राकोव स्थित जेगिलोनियन विश्वविद्यालय से "द कोर्टसान फिगर इन इंडियन पॉपुलर सिनेमा: 'ट्रेडिशन, स्टीरियोटाइप, मैनिपुलेशन" नामक विषय पर पीएचडी हैं. वर्तमान में मनिपाल विश्वविद्यालय, कर्नाटक के यूरोपीय अध्ययन संस्थान में पढ़ाती हैं.

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