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राहुल डाकुन्हा: ब्रांड अंबेसडर नहीं बड़े आइडिया की जरूरत है

अतुल चौरसिया | Updated on: 2 May 2016, 8:27 IST
QUICK PILL
हाल ही में हमने देखा जब लोगों ने आम्रपाली बिल्डर के ब्रांड अंबेसडर \r\nमहेंद्र सिंह धोनी की सोशल मीडिया में जमकर खिंचाई की. कारण आम्रपाली \r\nबिल्डर वादे के मुताबिक और तय सीमा के अंदर लोगों को घर मुहैया \r\nकरवाने में बुरी तरह असफल रहा है.इस घटना ने ब्रांड अंबेसडर की\r\n उपयोगिता को लेकर एक बहस छेड़ दी है. अब सरकार ने भी कंपनियों के ब्रांड \r\nअंबेसडर की जवाबदेही तय करने की दिशा में कदम बढ़ा दिया है. सरकार ने खाद्य\r\n एवं उपभोक्ता मामलों की संसदीय समिति से इस बारे में विचार करने को कहा \r\nहै.बीते पांच दशकों से अमूल बटर का एक थीम पर आधारित विज्ञापन \r\nबनाने वाली ऐड एजेंसी डाकुन्हा कम्यूनिकेशंस के क्रिएटिव हेड राहुल \r\nडाकुन्हा से ब्रांड अंबेसडर के मूल विचार, इसकी जरूरत जैसे तमाम विषयों पर बातचीत:

आपका अपना ब्रांड अमूल एक बड़ा और स्थापित ब्रांड है. आपके विज्ञापन अनूठे और बेहद रचनात्मक होते हैं. यह सब बिना किसी बड़े ब्रांड अंबेसडर के कर रहे हैं. इसकी तुलना में हम आज की विज्ञापन की दुनिया देखें तो यहां ब्रांड अंबेसडर की जड़ें गहराई तक जड़ जमा चुकी हैं. आप इसे कैसे देखते हैं?

मैं ब्रांड अंबेसडर के विचार को कतई पंद नहीं करता. मैं इस संबंध में कई लेख और ब्लॉग भी लिख चुका हूं. इस विचार से मैं कतई इत्तेफाक नहीं रखता. बल्कि मै इसे इस तरह से कहूं कि मैं सेलिब्रेटी ब्रांड अंबेसडर के विचार से कतई इत्तेफाक नहीं रखता, ज्यादा ठीक रहेगा. बॉलीवुड या क्रिकेट से आने वाले इंडोर्सर मुझे कतई रास नहीं आते.

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क्या कोई ब्रांड बिना सेलिब्रेटी ब्रांड अंबेसडर के भी सुपर हिट हो सकता है?

एक एड एजेंसी के नजरिए से देखूं तो मुझे लगता है कि ब्रांड अंबेसडर बहुत थका हुआ विचार है. इसके पीछे इतनी सी सोच होती है कि चलो कुछ बना लो, साथ में एक सेलीब्रेटी है, तो सामान अपने आ बिक जाएगा. जिस तरह से ये काम हो रहा है वह तरीका ही अपने आप में गलत है.

एक बड़ा सेलीब्रेटी साल में दो-तीन दिन एड एजेंसी को दे देता है. इस दौरान वह दसियों ब्रांड इंडोर्स करता है. एक-एक विज्ञापन के चार-पांच करोड़ रुपए लेता है. यह पैसे की भी बर्बादी है. इतने कम समय में कोई एजेंसी क्या नया करवा पाएगी किसी से. तो वहां पर क्रिएटिविटी और नएपन की मौत हो जाती है.

किसी हिट विज्ञापन के लिए सबसे जरूरी क्या है, नई सोच, नया आइडिया या सेलीब्रेटी ब्राड अंबेसडर?

बड़े ब्रांड अंबेसडर के जुड़ने के बाद एड एजेंसिया बड़े आइडिया पर सोचने की मुसीबत नहीं उठाती हैं. इसका नतीजा होता है कि ऐसे एड अगले ही दिन दम तोड़ देते हैं. इतने सारे सेलीब्रेटी आज एड कर रहे हैं किसको याद रहते हैं उनके विज्ञापन.

अमूल इतने सालों से लोगों के दिल दिमाग पर छाया हुआ है तो उसकी एक बड़ी वजह है उसका आइडिया. एक छोटी बच्ची उसमें लोगों से बात करती है. बिना मजबूत आइडिया के फ्लिपकार्ट का ऐड कैसे लोगों की जुबान पर चढ़ता. उसके पीछे एक बड़ी सोच थी कि सामान नकली हुआ तो क्या होगा. ऑनलाइन बाजार में फ्लिपकार्ट ने लोगों को भरोसा दिया कि उसका माल नकली नहीं होगा. तो आइडिया के स्तर पर मजबूत हुए बिना कोई ब्रांड सफल नहीं हो सकता.

इसकी तुलना एक बड़े स्टार द्वारा किए जा रहे एक पेंट के विज्ञापन से करें तो वह एक कमरे से दूसरे कमरे में जाता है और एक लाइन कहता है हर घर कुछ कहता है. किसको उनका एक दीवार से दूसरे दीवार में जाना याद रहेगा.

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आज की तारीख में हम अमूल, एमडीएच मसाले या बाबा रामदेव के पतंजलि को देखें, तो क्या यह कहा जा सकता है कि ब्रांड अंबेसडर का चलन दम तोड़ रहा है?

पतंजलि पूरी तरह से बाबा रामदेव पर निर्भर है. वह खुद अपने आप में सेलिब्रेटी है. पतंजलि का मामला अलग है. उनका पूरा अप्रोच अलग है. वो लोगों को हर्बल, ऑर्गैनिक उत्पाद बेचने का दावा कर रहे हैं. लोगों को हेल्थ का भरोसा दे रहे हैं. वो असल में लोगों को बेहतर जीवन का भरोसा दे रहे हैं. इस मामले में वे बड़े स्मार्ट हैं.

मुझे नहीं लगता कि सेलिब्रेटी विज्ञापन का दौर हाल फिलहाल में खत्म होने वाला है. लेकिन आपको नान सेलिब्रेटी विज्ञापन भी दिनों दिन बढ़ता हुआ दिखेगा. आज आप देखिए फ्लिपकार्ट, अमेजन समेत तमाम ऑनलाइन रिटेल कंपनियां बिना किसी सेलिब्रेटी के अपना ब्रांड फैला रही हैं.

सेलिब्रेटी विज्ञापन के दो पहलू हैं. इसके खतरे भी बड़े हैं. किसी फिल्म स्टार की तीन-चार फिल्में पिट गईं या कोई क्रिकेटर एक सिरीज में फेल हुआ तब उसके ब्रांड का क्या होगा. दूसरी बात सेलिब्रेटी दुनिया में दो-तीन ही बड़े नाम है. अमिताभ बच्चन, शाहरुख खान, धोनी कोहली आदि.

विज्ञापन की दुनिया में रचनात्मकता और नवीनता पहली जरूरत होती है. जैसे ही कोई बड़ा सितारा इसमें कूदता है. सबसे पहला नुकसान रचनात्मकता की मौत के रूप में होता है?

बिल्कुल. इसके अलावा भी मैं कुछ चीजों पर अध्ययन कर रहा हूं. मसलन किसी ब्रांड के साथ सेलिब्रेटी के जुड़ने के बाद उसके टर्न ओवर में दोगुना, तीनगुना या चारगुना की बढ़ोत्तरी हुई या नहीं. इसी तरह सेलीब्रेटी और नॉन सेलीब्रेटी ब्रांड के विज्ञापनों के बीच किस तरह का अंतर था. जितनी बड़ी मात्रा में सेलीब्रेटी के ऊपर पैसा खर्च हो रहा है क्या उसके मुकाबले में रिटर्न भी है.

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एक बड़ा सेलिब्रेटी जब किसी ब्रांड को एंडोर्स करता है तो उसके साथ लोगों का एक भरोसा भी जुड़ता है. ऐसे में क्या कोई ऊंच-नीच होने पर उसकी भी जवाबदेही तय होनी चाहिए.

आपने किसी सेलिब्रेटी को अपने साथ जोड़ लिया अब आप कहें कि उसके ऊपर भी प्रोडक्ट की रिसपॉन्सिबिलिटी होगी. यह मूर्खतापूर्ण विचार है. एक ब्रांड अंबेसडर कैसे किसी प्रोडक्ट के लिए जिम्मेदर होगा. कैडबरी के चॉकलेट में कीड़े निकलते हैं तो अमिताभ बच्चन कैसे जिम्मेदार होंगे. जवाबदेही कंपनी की होगी. किसी ब्रांड अंबेसडर को कैसे पता चलेगा कि कंपनी क्या कर रही है.

तो यहां एक और सवाल पैदा होता कि क्या एक सेलीब्रेटी ब्रांड अंबेसडर को अपने व्यक्तिगत दायरे में नैतिकता की एक लकीर खींचनी चाहिए कि वह किसी भी तरह के भ्रामक विज्ञापन या उत्पाद के प्रचार से खुद ही दूर रहें जैसे हमारे समय में तमाम बड़े सितारे फेयरनेस क्रीम का विज्ञापन कर रहे हैं. जो कि पूरी तरह से मिथ्या पर आधारित धंधा है.

इस मामले में मेरा कहना है कि जो भी ऐसे विज्ञापन है जिनमें मोरल इश्यु जुड़े हैं, चाहे वह धूम्रपान हो, शारब हो, दहेज हो, अंतरजातीय मसले हों, कहने के मतलब ऐसा कोई भी मुद्दा जो हमारे देश में बहस का विषय है वहां सेलिब्रेटी अपने लिए सीमा तय कर सकते हैं.

सेलिब्रेटी ब्रांड अंबेसडर का सबसे बेहतर इस्तेमाल असल में उन क्षेत्रों के विज्ञापन में ही हो सकता है जो जनता और समाज से जुड़े मसले हैं. यहां आकर मुझे बहुत निराशा होती है कि हमारे बड़े सितारे सोशल सेक्टर में अपनी जिम्मेदारी निभाने में पूरी तरह से असफल सिद्ध होते है.

अगर हमारे सभी बड़े सितारे एसिड अटैक, महिलाओं को जलाने या महिलाओं की इज्जत करने की जरूरत पर बोलने लगे आप देखिए कि देखते ही देखते लोगों की सोच बदल जाएगी. सेलिब्रेटी को मुद्दों के लिए जवाबदेह बनाया जा सकता है किसी उत्पाद के लिए नहीं.

तो हमारी सरकार जो संसदीय कमेटी में ब्रांड अंबेसडर की जवाबदेही तय करने की दिशा में आगे बढ़ रही है उस पर आपकी क्या राय है.

किस तरह की एकाउंटबिलिटी. मान लीजिए कि उत्पाद का स्तर मानक के हिसाब से नहीं है. तो इसमें सेलिब्रेटी क्या कर सकता है.

हम धोनी का उदाहरण लेते हैं. वो आम्रपाली बिल्डर्स के ब्रांड अंबेसडर थे. खरीददारों को पांच साल बाद भी उनके घर नहीं मिले. लोगों ने सोशल मीडिया पर उन्हें घेर लिया. आपको लगता है कि वह सही था?

मेेरा यही कहना है कि धोनी क्या कर सकता है.

मैं इसमें सरकार की भूमिका भी जोड़ना चाहता हूं. अब तक हमारे यहां ऐसी कोई व्यवस्था ही नहीं है. आपको लगता है कि इसमें सरकार की कोई भूमिका बनती है?

बिल्कुल सरकार की बहुत बड़ी भूमिका बनती है. यह हमारे जीवन से जुड़ा मसला है लेकिन सरकार अक्सर गलत चीजों में टांग फंसाती है. अगर बिल्डर ने सही समय पर प्रोजेक्ट डिलिवर नहीं किया तो यह सरकार की मशीनरी की असफलता है. धोनी क्या घर बनाएगा. यह व्यावहारिक रूप से संभव नहीं है.

कंपनी को अगर अपने वादे पूरा नहीं करने की कोई चिंता नहीं है तो जाहिर है कि उसके अंदर लॉ ऑफ द लैंड का डर नहीं है. इसमें ब्रांड अंबेसडर क्या करेगा. किसी खाने का सामान की गुणवत्ता खराब है तो यह साबित करता है कि सरकारी की मानक सुनिश्चित करने वाली एजेंसियां असफल है. इसमें उसके ब्रांड अंबेसडर की क्या भूमिका बनेगी. व्यावहारिक रूप से उसकी जवाबदेही तय करना संभव नहीं होगा.

सेलिब्रेटी ब्रांड अंबेसडर का मैं विरोधी हूं लेकिन उसे किसी उत्पाद के लिए जिम्मेदार ठहराना भी गलत है. एक सेलिब्रेटी जिसने सड़क पर सो रहे तीन लोगों पर कार चढ़ा दी, जिसके ऊपर प्रतिबंधित जानवर के शिकार का आरोप है वह कैसे किसी कंपनी का आदर्श ब्रांड अंबेसडर हो सकता है. यह कंपनियों को तय करना होगा. इसी तरह किसी सेलिब्रेटी की जवाबदेही सामाजिक मुद्दों पर तय होनी चाहिए न कि किसी प्रोडक्ट के एंडोर्समेंट के लिए.

First published: 2 May 2016, 8:27 IST
 
अतुल चौरसिया @beechbazar

एडिटर, कैच हिंदी, इससे पूर्व प्रतिष्ठित पत्रिका तहलका हिंदी के संपादक के तौर पर काम किया

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