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राम आडवाणी: वह निश्चिन्तता पैदा करने वाला एक घोंसला था

यतींद्र मिश्र | Updated on: 13 March 2016, 9:30 IST

राम आडवाणी का होना, एक ऐसी शख्सियत का हम सब के बीच होना था, जिन्होंने आज के नये समय में भी लखनऊ और अवध की संस्कृति को अपनी छोटी सी किताबों की दुकान में आबाद कर रखा था. विनम्रता में वे खुद को एक किताब बेचने वाला ही कहते थे, मगर उनसे जुड़े हुए दो पीढि़यों के लोगों को यह अच्छी तरह मालूम है कि दरअसल राम आडवाणी होने का मतलब एक सभ्यता से जीवन-संवाद का मामला भी बनता है.

लखनऊ, हज़रतगंज की मेफेयर बिल्डिंग में ‘राम आडवाणी बुक सेलर्स’ की दुकान वैसे तो सामान्य अर्थों में अंग्रेज़ी की किताबों की दुकान रही है, लेकिन वहां पर सिर्फ किताबें ही नहीं मिलती थीं, बल्कि वहां पर एक पूरी जीती-जागती अवध संस्कृति और उसके छीजते का दुख देखा जा सकता था. 

मैं स्वयं उस दुकान में अपनी किशोरावस्था से ही जाता रहा हूं, जब मेरी उम्र मात्र तेरह या चौदह साल की रही होगी. आज मैं बीते हुए लगभग चौबीस वर्षों के बाद यह देख पाता हूं कि मेरे लेखक होने में जिन लोगों ने योगदान किया है, उनमें से एक राम आडवाणी भी थे.

आज उसमें रहने वाला पक्षी उड़ गया है. मालूम नहीं, हम सब के लिए एक नया नींड़ कब कहां आकार लेगा?

मुझे याद है कि अवध की संस्कृति और इतिहास को लेकर कुछ बेहद ऐतिहासिक व प्रासंगिक किताबों का पहले-पहल जि़क्र मैंने उन्हीं से सुना था. वे ही इस मामले में मेरे पहले उस्ताद रहे, जिन्होंने स्तरीय किताबों से मेरा तआरुफ़ करवाया.

इनमें ढेरों विषयों पर किताबें होती थीं, जिनमें गदर, लखनऊ की गंगा-जमुनी तहज़ीब, संगीत और अदब की रवायतें, रियासतों के किस्से और अवध का खाना व पहनावा, सभी कुछ शामिल था. ऐसी पुस्तकों में जिन ज़हीन लेखकों की किताबें शामिल हैं, उनमें राम आडवाणी जी के माध्यम से प्राप्त पुस्तकों में अतिया हुसैन, मेरू जाफ़र, कुर्रतुलैन हैदर, वीना तलवार ऑल्डनबर्ग, शीला धर, सुशीला मिश्रा आदि के नाम लिये जा सकते हैं.

वे एक पढ़े-लिखे बड़े विचारक के रूप में हम सबसे मुखातिब होते थे. उनके जीवन का सबसे दिलचस्प पहलू यह रहा कि उन्हें अपनी दुकान से किसी किताब को बेचने से उतनी खुशी नहीं मिलती थी, जितना कि उस पर चर्चा करने से या कि उस किताब को लेकर उनके पाठक की अपनी राय या आलोचना से होती थी. 

कई बार वे इसी क्रम में किसी चर्चित मगर उनके लिहाज से कम स्तरीय पुस्तक को न खरीदने की ताकीद भी करते थे. यह उनमें एक ऐसा मानवीय पहलू था, जो उन्हें एक व्यावसायी से बढ़कर संस्कृति का पैरोकार बनाता है. उनके उदार और समावेशी व्यक्तित्व के चलते यह सिर्फ़ मेफेयर बिल्डिंग की उस छोटी सी दुकान में ही सम्भव था कि वहां आपको कोई किताब खरीदते हुए पढ़ने-लिखने वाले और कला समाज की बड़ी हस्तियों से मुलाकात हो सकती थी.

मैंने पहली बार इतिहासकार शाहिद अमीन, सलीम किदवई, वीना तलवार ऑल्डनबर्ग आदि को वहीं देखा और पाया

मैंने स्वयं वहां इतिहासकार शाहिद अमीन, सलीम किदवई, वीना तलवार ऑल्डनबर्ग आदि को पहली दफ़ा देखा और पाया है. उस दुकान में जाने वाले लोगों में सत्यजित रे, कुंवर नारायण, श्रीलाल शुक्ल, डॉ. रूपर्ट स्नेल, मारिओला ओफेद्री, मुज़फ्फ़र अली, सलीम आरिफ और तमाम सारे मित्र शामिल रहे हैं.

हम सब के लिए वह दुकान वह निश्चिन्तता पैदा करने वाला एक ऐसा घोंसला था, जहां थोड़ी देर के लिए भी जाना, खुद को नये सिरे से स्फूर्त कर देता था. आज उसमें रहने वाला पक्षी उड़ गया है. मालूम नहीं, हम सब के लिए एक नया नींड़ कब कहां आकार लेगा?

First published: 13 March 2016, 9:30 IST
 
यतींद्र मिश्र @catchhindi

दिल्ली से दूर अयोध्या में बैठकर साहित्य, कला और संगीत की साधना करते हैं.

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