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मस्तानी के बिना भी था एक बाजीराव

नलिन चौहान | Updated on: 4 January 2016, 23:21 IST
QUICK PILL
  • इतिहास के पन्ने खंगालने पर पता चलता है कि बाजीराव ने न केवल महाराष्ट्र \r\nबल्कि पूरे देश के इतिहास को एक दौर में अपनी विलक्षण प्रतिभा और वीरता से प्रभावित \r\nकिया था
  • 1737 में पेशवा बाजीराव दिल्ली लगभग जीत चुके थे लेकिन वे सिर्फ तीन दिन यहां ठहरे. \r\nइस घटना ने मुगल सल्तनत की कमजोरी को दुनिया के सामने उजागर कर दिया था.

निर्देशक संजय लीला भंसाली की फिल्म "बाजीराव मस्तानी" की रिलीज के साथ ही आम लोगों के मन में बाजीराव को लेकर उत्सुकता पैदा हुई है. आखिर यह मराठा था कौन? लाख टके का सवाल यह है कि फिल्मी मस्तानी से अलग बाजीराव का व्यक्तित्व कैसा था? इतिहास के पन्ने खंगालने पर पता चलता है कि बाजीराव ने न केवल महाराष्ट्र बल्कि पूरे देश के इतिहास को अपनी विलक्षण प्रतिभा और वीरता से प्रभावित किया था.

मुगल दिल्ली से बाजीराव का परिचय युवावस्था में ही हो गया था. वे अपने पिता पेशवा बालाजी विश्वनाथ के साथ पहली बार दिल्ली साल 1718-1719 में आए थे. तब बालाजी विश्वनाथ ने मुगल बादशाह फर्रूख़सियर के वजीर और सैयद बंधुओं में से एक हुसैन अली खां के साथ संधि की थी. इस संधि में मराठों को मुगलों के छह दक्खिनी सूबों की चौथ और सरदेशमुखी वसूलने तथा छत्रपति शाहू को मराठा राज्य का शासक होने के अधिकार मिला.

छत्रपति शाहू ने सिर्फ 19 वर्ष की उम्र में बाजीराव को 1720 में अपना पेशवा नियुक्त किया था जो 1740 तक इस पद पर बने रहे

बादशाह फर्रूखसियर ने इस संधि से इंकार कर दिया. नतीजतन उनके ही वजीर सैयद बंधुओं ने तख्तापलट कर उन्हें जेल में डाल दिया और उनकी जगह पर रफीउलद्दौला को नया बादशाह घोषित करवा दिया. रफीउद्दौला ने मराठा संधि को अपनी स्वीकृति दे दी. इस पूरे घटनाक्रम में बाजीराव को पहली दिल्ली यात्रा में ही मुगल सल्तनत के खोखलेपन का आभास हो गया.

छत्रपति शाहू ने पेशवा बालाजी विश्वनाथ की मृत्यु के बाद उनके ज्येष्ठ पुत्र 19 वर्षीय बाजीराव को सन् 1720 अपना पेशवा नियुक्त किया. बाजीराव अपनी मृत्यु तक यानी सन् 1740 तक पेशवा के पद पर बने रहे. पेशवा बाजीराव अपने पिता से अधिक महत्वाकांक्षी और युद्धप्रिय थे. इस कालखंड को मुगल भारत के इतिहास में हिंदू चेतना के उत्थान का काल कहा जाता है. यह दौर बालाजी विश्वनाथ के पेशवा बनने से (सतारा, 1713) से आरंभ होकर बाजीराव पेशवा के अंत तक जारी रहा.

बाजीराव ने पेशवा बनने के बाद मराठा राज्य को उत्तर दिशा में विस्तार देने की नीति अपनाई. छत्रपति शाहू के दरबार में उनका एक कथन मशहूर है- "जो कुछ तुम्हारे पास है उसे बचाओ और उसकी वृद्धि के लिए प्रयत्न करो, सब ओर महाराष्ट्र साम्राज्य का प्रसार करो. मुझे विश्वास है कि हमारी संगठित शक्ति निजामुल मुल्क मुहम्मद खां आदि को शीघ्र की पराजित कर देगी." बाजीराव का कहना था, "यदि हम जर्जर वृक्ष के तने पर ही सीधे प्रहार करेंगे तो उसकी शाखा-प्रशाखाएं स्वयं ही गिर पड़ेंगी.” उनकी वाक प्रतिभा से प्रभावित होकर छत्रपति शाहू ने उन्हें मुगलों के खिलाफ अभियान चलाने की स्वीकृति दे दी.

जिस हिंदू पद पादशाही का विचार आज राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का आदर्श है उसका प्रतिपादन बाजीराव ने किया था

बाजीराव ने दक्कन में मराठा राज्य को निष्कंटक करने के लिए निजाम आसफजाह निजाम उल मुल्क से अनेक बार मोर्चा लिया और उन्हें हराया भी. मार्च 1728 को पालखेड़ के समीप निजाम को हराकर उन्होंने ऐतिहासिक जीत दर्ज की. इसके फलस्वरूप निजाम ने मुंगी शिवागांव की संधि की. इस संधि के अनुसार, निजाम ने शाहू को चौथ और सरदेशमुखी देना, शंभूजी को सहायता न देना, विजित प्रदेश लौटाना स्वीकार किया. निजाम की इस हार से दक्कन में मराठों की सर्वोच्चता स्थापित हुई और उनका देश के पूर्व तथा दक्षिण भाग में प्रसार का मार्ग खुल गया.

पेशवा बाजीराव के बारे में अंग्रेज इतिहासकार रिचर्ड टेम्पल ने लिखा है कि वे घुड़सवारी में अद्वितीय थे तथा आक्रमण में आगे रहकर भयंकर से भयंकर स्थितियों में अपने को सदैव परखते रहते थे. देशभक्ति और हिंदुत्व से अतिशय प्रभावित होने के कारण वे मुगलों और अंग्रेजों पर विजय पाना राष्ट्रीय कर्तव्य समझते थे. जिस हिंदू पद पादशाही का विचार आज राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का आदर्श है उसका प्रतिपादन बाजीराव ने ही किया और इसे लोकप्रिय बनाया. इसका उद्देश्य तत्कालीन हिंदू राजाओं को धर्म के आधार पर अपने पक्ष में संगठित करना था.

उत्तर भारत में, इलाहाबाद के मुग़ल सूबेदार मुहम्मद खान बंगश ने बुंदेलखंड पर हमला किया. इस आपात स्थिति में बुंदेला राजा छत्रसाल ने पेशवा बाजीराव को सहायता के लिए पत्र लिखा-

''जो गति ग्राह गजेन्द्र की, सो गति भइ है आज. बाजी जात बुन्देल की, राखो बाजी लाज.''

इस पत्र के उत्तर में पेशवा बाजीराव ने लिखा कि आप निश्चिंत रहें. हम इस धर्मयुद्ध में सब प्रकार से आपके साथ हैं-

''वे होंगे छत्तापता, तुम होगे छतसाल.वे दिल्ली की ढाल तो, तुम दिल्ली ढालनवाल.''

सन् 1728 तक मराठों ने बुंदेलखंड के सभी विजित प्रदेश मुगलों से वापिस छीन लिए

पेशवा बाजीराव की मराठा सेना और छत्रसाल के बुंदेलों ने मिलकर मुग़ल फौज को मात दे दी. मुग़ल सूबेदार ने अंतत: राजा छत्रसाल और पेशवा बाजीराव से संधि कर ली. सन् 1728 तक मराठों ने बुंदेलखंड के सभी विजित प्रदेश मुगलों से वापिस छीन लिए.

पेशवा बाजीराव की इस सहायता से अभिभूत छत्रसाल ने सन 1733 में अपनी मृत्यु के समय अपने राज्य को तीन भागों में बांट दिया. पहले दो भाग अपने पुत्रों और तीसरा भाग पेशवा बाजीराव को दे दिया. यहीं से मध्य भारत में मराठा शासन की शुरुआत हुई. छत्रसाल के उत्तराधिकारी भी बाजीराव के मित्र और सहायक बने रहे.

सन् 1735 तक मराठों ने गुजरात और मालवा पर नियंत्रण कायम कर लिया था. पर स्थानीय मुगल अधिकारियों से मिलकर कुछ जागीरों ने मराठा प्रभुत्व मानने से इंकार कर दिया. मुगल बादशाह मुहम्मद शाह भी मराठों को चौथ वसूली का आदेश नहीं दे रहे थे. मुगल बादशाह पेशवा बाजीराव से प्रस्तावित मुलाकात को भी टाल रहा था.

इस स्थिति में बाजीराव ने अपनी लड़ाई को दिल्ली तक पहुंचाने का फैसला किया. सन 1737 में बाजीराव एक बड़ी मराठा सेना के साथ दिल्ली की तरफ बढ़ा. बाजीराव ने मराठा सेना को दो टुकडि़यों में बांट दिया. सेना की एक टुकड़ी का नेतृत्व पेशवा बाजीराव और दूसरी टुकड़ी की संयुक्त कमान पीलाजी जाधव और मल्हारराव होल्कर के हाथ में थी. अवध के नवाब और आगरा के मुगल सूबेदार सआदत खान की विशाल सेना से हुए टकराव में होल्कर की मराठा टुकड़ी को मुंह की खानी पड़ी.

होल्कर की टुकड़ी वापस बाजीराव की टुकड़ी में आकर मिल गई. उधर दिल्ली में मुगल बादशाह मुहम्मदशाह रंगीला को खबर दे दी गई कि मराठे हार गए. फलस्वरूप मथुरा से दिल्ली तक मुगल जश्न मनाने लगे. यह खबर सुनकर दूसरे मुगल सेनापति भी लापरवाह हो गए.

कुछ समय के लिए मराठा साम्राज्य भारत का शक्ति केंद्र बन गया था जिसका केंद्र बिंदु दिल्ली नहीं पूना था

ऐसे समय में पेशवा बाजीराव ने मुगलों को हैरत में डालते हुए दिल्ली पर हमला बोल दिया. बाजीराव के नेतृत्व में मराठा टुकड़ी ने दिल्ली के बाहरी इलाके तुगलकाबाद में डेरा डाल दिया. कहते हैं कि बाजीराव ने दस दिन की दूरी केवल अड़तालीस घंटे में पूरी की थी. इसके बाद मराठों ने दिल्ली को बुरी तरह रौंद डाला. मुगल बादशाह सुरक्षित लाल किले में छिपे रहे. हालांकि पेशवा बाजीराव दिल्ली लगभग जीत चुके थे लेकिन वे सिर्फ तीन दिन यहां ठहरे. इस घटना ने मुगल सल्तनत की कमजोरी को दुनिया के सामने उजागर कर दिया था.

सन् 1738 में मुगल बादशाह ने एक बार फिर से निजाम को दिल्ली बुलाकर मराठों के खिलाफ अभियान चलाने का आदेश दिया. पेशवा बाजीराव ने उसे एक बार फिर भोपाल के युद्ध में बुरी तरह पराजित किया. इस हार की एवज में पेशवा ने निजाम को दुरई-सराय की संधि के लिए मजबूर किया. निजाम ने मालवा, नर्मदा के बीच की संपूर्ण भूमि और 50 लाख रुपए बाजीराव को दिए. मुगल सल्तनत के लिए यह बड़ी हार थी.

देश के एक बड़े हिस्से पर पेशवा बाजीराव का मराठा शासन स्थापित हो गया था. इतिहासकार जदुनाथ सरकार पेशवा के बारे में लिखते हैं, "यदि सर राबर्ट वालपोल ने इंग्लैंड के प्रधानमंत्री पद को निर्विरोध सत्ता का केंद्र बना दिया था तो ठीक उसी प्रकार बाजीराव ने मराठा राज्य को सत्ता का प्रमुख केंद्र बना दिया था."

कुछ समय के लिए मराठा साम्राज्य भारत का शक्ति केंद्र बन गया था जिसका केंद्र बिंदु दिल्ली नहीं पूना था.

First published: 4 January 2016, 23:21 IST
 
नलिन चौहान @catch_hindi

देश की राजधानी में जी टीवी के स्थानीय केबल चैनल सिटी टीवी से पत्रकारिता के जीवन की शुरुआत करने के बाद इंडिया टुडे हिंदी और फिर पीटीआई में नौकरी. संघ लोक सेवा आयोग से चयन के पश्चात दिल्ली सरकार की सूचना सेवा में उपनिदेशक के पद पर कार्यरत.

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