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स्वरूपानंद सरस्वती: एक अप्रासंगिक नारी विरोधी शंकराचार्य

श्रिया मोहन | Updated on: 12 April 2016, 23:05 IST

कहते हैं कि बुद्धि उम्र के साथ बढ़ती है, लेकिन द्वारका पीठ के 91 वर्षीय शंकराचार्य स्वरूपानंद सरस्वती के साथ ऐसा नहीं है. उनके मामले में तो बुद्धिमत्ता बढ़ती उम्र के साथ कम होती जा रही है.

शनि शिंगणापुर मंदिर में महिलाओं पर प्रतिबंध की 400 साल पुरानी परम्परा टूटने पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने मीडिया से कहा, “यदि महिलाओं पर शनि-दृष्टि पड़ गई तो भारत में बलात्कार की घटनाएं और बढ़ेंगी.”

इसको लेकर सामाजिक कार्यकर्ता खफा हैं. प्रमुख नारीवादी और मानवाधिकार अधिवक्ता फ्लेविया एग्निस का तर्क है कि सरस्वती की टिप्पणी सीधे तौर पर अदालत की अवमानना है. 

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वो सरस्वती से सवाल करती हैं, “यदि अदालत ने पुरुषों और महिलाओं दोनों को शनि देव की पूजा करने की अनुमति दी है तो ऐसे में वे होते कौन हैं कुछ भी कहने वाले? अदालत को इस पर कार्रवाई करनी चाहिए और उनके खिलाफ अदालत की अवमानना का केस चलना चाहिए.”

महिलाओं को शनि मंदिर में अनुमति न देने के सबसे प्रमुख तर्क पर एग्निस का तर्क है, “मासिक धर्म कोई गंदी चीज नहीं है, यह तो प्रजनन प्रक्रिया का हिस्सा है. यह तो भगवान का उपहार है.”

सिर्फ नारीवादी ही नहीं, ट्विटर वाले भी स्वरूपनंद के इस गैरजरूरी बयान पर गुस्से से फट पड़े. कुछ ने तो उनके बारे में यहां तक कह डाला कि वे "नाम बड़े और दर्शन छोटे" कहावत के बेहतरीन उदाहरण हैं. इस कहावत का मोटा-मोटा अर्थ होता है कि "प्रतिष्ठा तो बहुत है, लेकिन उदारता के मामले में क्षुद्र हैं.” कुछ अन्य ने टिप्पणियां की कि जो महिलाएं सरस्वती में विश्वास रखती हैं, भगवान उनकी रक्षा करे.

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उनके तरीके से परिचित लोगों का कहना है कि इन दिनों सरस्वती का उपयोग उनके मुंह से कुछ भी बुलवाने के लिए किया जाता है. यहां तक की राजनीतिक शुचिता का भी ध्यान नहीं रखा जाता.

उन्होंने हाल ही में महाराष्ट्र में सूखे को लेकर भी अपने विचार व्यक्त किए थे, जिन्हें सोशल मीडिया पर विचार की बजाय बुढ़ापे में सठियाना करार दिया गया. उन्होंने कहा, "महाराष्ट्र में बार-बार पड़ रहा सूखा सिर्फ शिरडी के “अयोग्य” साईं बाबा की पूजा करने के कारण है.” साईं बाबा की उपासना के खिलाफ वे पिछले एक-दो साल से लड़ाई छेड़े हुए हैं.

सरस्वती जोर देकर कहते हैं कि एक "मुस्लिम फकीर” साईं बाबा और कांची के शंकराचार्य जैसे लोगों की पूजा देवों की तरह नहीं होनी चाहिए. क्योंकि भगवान श्रीराम और कृष्ण की तरह वे सशरीर देवलोक नहीं गए, बल्कि उन्होंने अपनी पार्थिव देह धरती पर ही छोड़ दी, इसलिए उनको देवता नहीं कहा जा सकता.

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दो साल पहले जब उनकी इस तरह की टिप्पणियों के खिलाफ साईं बाबा के भक्तों ने देश भर में कई जनहित याचिकाएं दायर की थी. एफआईआर दर्ज होने के बाद उन्होंने माफी मांगी.

राजनीतिक अवतार

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पीटीआई

सरस्वती का सरोकार सिर्फ धर्म से नहीं है. 1990 के दशक में वे एक प्रभावशाली राजनीतिक व्यक्तित्व थे जिसे कांग्रेस का संरक्षण प्राप्त था. उस समय 1993 से 2003 तक मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे दिग्विजय सिंह ने सरस्वती को अपना "गुरु” नियुक्त कर दिया था. 

जाहिर है, धर्म, राजनीति के प्रति प्यार और पावर को लेकर दोनों में एक सा जुनून था और इसी जुनून के कारण दोनों में काफी करीबी भी थी.

सोनिया गांधी की आत्मकथा लिखने वाले वरिष्ठ पत्रकार राशीद किदवई कहते हैं, "वे सरस्वती के 'हरे-भरे दिन' थे. चूंकि सरस्वती भाजपा और विहिप दोनों के विरोधी थे, इसलिए वे कांग्रेस के स्वाभाविक सहयोगी थे.”

जुलाई 2013 में दिग्विजय सिंह ने “हिन्दू-विरोधी” होने के आरोपों से खुद का बचाव करते हुए खुलासा किया था कि उन्होंने सरस्वती से दीक्षा ली हुई है. उन्होंने अपने ब्लॉग पर लिखा था, "जो लोग भी मानते हैं कि मैं हिन्दू विरोधी हूं, क्या वे कृपया ये बात नोट करेंगे? या वे भाजपा या आरएसएस में मुझसे ज्यादा किसी हिन्दू भक्त को जानते हैं? यदि वे ऐसे किसी व्यक्ति को जानते हैं तो मैं उससे मिलना चाहूंगा.”

जो लोग भी मानते हैं कि मैं हिन्दू विरोधी हूं, क्या वे कृपया ये बात नोट करेंगे

ये दिग्विजय सिंह ही थे जिन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव के पूछने पर शंकराचार्य सरस्वती को रामालय ट्रस्ट का नेतृत्व करने के लिए राजी कर लिया था. रामालय ट्रस्ट का गठन अयोध्या में श्रीराम मंदिर निर्माण का रास्ता साफ करने की महत्वाकांक्षा से किया गया था, जो अंततः असफल रहा. 

सरस्वती इस कारण राजी हो गए थे, क्योंकि वे नहीं चाहते थे कि श्रीराम मंदिर निर्माण बनवाने की सारी कोशिशों का "श्रेय” विश्व हिन्दू परिषद को मिल जाए.

किदवई बताते हैं, “जब भी कांग्रेस के नेताओं को आवश्यकता महसूस हुई, सरस्वती का उपयोग उन्होंने किया. और सरस्वती यह बात जानते भी हैं.”

मूल रूप से मध्य प्रदेश के सिवनी जिले के रहने वाले सरस्वती का दावा है कि उनके गृह प्रदेश के गांवों और कस्बों से लेकर उत्तर प्रदेश तक बड़ी संख्या में उनके अनुयायी हैं. लेकिन वे अपना राजनीतिक प्रभाव काफी समय पहले खो चुके हैं.

इसलिए उनकी ताजा टिप्पणियों को एक बूढ़े आदमी की 'प्रासांगिकता' पाने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है. इस पूरे प्रकरण की सबसे अच्छी बात यह रही कि अपनी टिप्पणियों के बावजूद वे कोई हलचल पैदा करने में असफल रहे और उनकी अप्रासंगिकता साबित हो गई.

First published: 12 April 2016, 23:05 IST
 
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