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"आरा से मेरी वाक़फ़ियत रही है लिहाजा अनारकली ऑफ आरा से बेहतर कोई नाम नहीं सूझा"- अविनाश दास

कैच ब्यूरो | Updated on: 16 February 2017, 8:53 IST
कैच न्यूज़

अंग्रेजी के दौर में भी आरा पूरी धार से आरी चला रहा है, भोजपुरी में. यहां कायदे से हिंदी ही भोजपुरी को रिप्लेस नहीं कर पायी है तो अंग्रेजी की क्या बिसात. बल्कि कहें तो इस इलाके में अंग्रेजी, भोजपुरी की दास बन गई है. लोग धड़ल्ले से अंग्रेजी का हाथ, कान, नाक भोजपुरी में मरोड़ते रहते हैं. शायद ऐसे ही कुछ अनुभवों से टकरा कर वरिष्ठ साहित्यकार और व्यंग्यकार शरद जोशी ने एक लेख में कहा था जब पूरी दुनिया से अंग्रेजी मिट जाएगी तब भी बिहार में यह लोकभाषा के रूप में बची रहेगी.

इसी आरा की मिट्टी से निकले पूर्व पत्रकार अविनाश दास अब फिल्मकार बन गए हैं. फिल्मकार तो बन गए लेकिन आरा नहीं छूटा. पहली फिल्म ही आरा की अनारकली पर बना दी. बिल्कुल कंन्फूज़ न हों इस अनारकली का के आसिफ की अनारकली से दूर-दूर तक वास्ता नहीं है.

फिल्म पूरा होने के मुकाम पर है तब अविनाश और उनके दोस्तों ने फेसबुक पर एक शानदार चौपाल लगाई. बातचीत का सिलसिला शुरू हुआ तो फिल्म से जुड़े एक से एक रोचक किस्से सामने आते गए. मगर फिर भी कहानी का संस्पेंस अविनाश छुपाए रखने में कामयाब रहे.

अनारकली ऑफ आरा की रिलीज से पहले इस खुली बातचीत को पढ़ें और समझे कि एक फिल्म सिर्फ तीन घंटे का मनोरंजन नहीं बहुत कुछ और भी है. फिल्म बंबई से, फार्मूले से और सितारों की महफिल से निकल कर बलिया-आरा की धुरखंड पगडंडियों पर चलने लगी है. फिल्में अपने हिंदुस्तान को दिखाने लगी है. आरा भी उस राह में आहूति दे रही है.

सवाल-जवाब

नवीन रमण: पटकथा का ड्राफ्ट बनाने के लिए नए पटकथा लेखकों को क्या सुझाव देना चाहेंगे?

अविनाश दास: मन में अपनी फिल्म देखते रहिए और उसे काग़ज़ पर उतारते रहिए. बाकी किसी के सुझाव पर कोई अमल मत कीजिए. मेरे सुझाव पर तो बिल्कुल भी नहीं- क्योंकि मैंने क्या किया है, क्या नहीं- यह अभी सामने नहीं आया है.

निखिल आनंद गिरि: फिल्म के डिस्ट्रीब्यूशन को लेकर क्या-क्या दिक्कतें आती हैं, ख़ास तौर पर एक नए डायरेक्टर के लिए.

अविनाश दास: प्रोड्यूसर का समर्थ होना ज़रूरी है. वही नये डायरेक्टर के साथ फिल्म बनाने का ज़ोख़िम लेता है. फिल्म के फाइनल प्रिंट से प्रोड्यूसर संतुष्ट होता है, तभी वह रीलीज़ के लिए क़दम आगे बढ़ाता है. वैसे कई तरह से डिस्ट्रीब्यूशन होते हैं- आप गूगल करेंगे तो इसका जवाब आसानी से मिल जाएगा. हां, मेकिंग के लिए धन हो और उससे आगे आप ठन-ठन गोपाल हों, तो मुश्किल आती है. लेकिन फिल्म आउटस्टैंडिंग हुई, तो कोई न कोई डिस्ट्रीब्यूटर आपका हाथ थाम लेता है.

निखिल आनंद गिरि: क्या 24 मार्च को और भी कोई बड़ी रिलीज़ हो रही है? क्या रिलीज़ की तारीख तय करने में ये सब गणित भी देखना पड़ता है? कौन तय करता है?

अविनाश दास: 24 मार्च को अनारकली ऑफ आरा के साथ दो और फिल्में रीलीज़ हो रही है. अनुष्का शर्मा की फिल्लौरी और अब्बास मस्तान की मशीन, लेकिन हमारी टीम में अपनी फिल्म को लेकर काफी उत्साह है.

निखिल: ख़ुद ही स्क्रिप्ट, डायलॉग, डायरेक्शन करना अच्छा रहता है कि अलग-अलग लोगों से करवाना.

अविनाश दास: यह निर्देशक पर निर्भर करता है कि वह किस तरह से कम्फर्टेबल है.

निखिल: बिना डायरेक्शन की ट्रेनिंग के मैदान में कूदना कितना चैलेंजिंग होता है.

अविनाश दास: मूल बात है संवेदना. फिर कल्पनाशीलता. फिर उस कल्पनाशीलता की भौतिक अभिव्यक्ति. ट्रेनिंग अच्छी चीज़ होती है, लेकिन कई बार वह तकनीकी मामलों में ही आपको समृद्ध कर पाती है. निर्देशक का मूल काम है सोचना. बाकी एग्जीक्यूशन के लिए वह एक टीम बनाता है और यही टीम निर्देशक की सोच को फिल्म में रूपांतरित करती है.

रश्मि चौबे: आपको इस कहानी की प्रेरणा कहां से मिली?

अविनाश दास: यूट्यूब पर ताराबानो फैज़ाबादी का एक वीडियो देख कर अनारकली आॅफ आरा बनाने का आइडिया आया.

यूट्यूब पर ताराबानो फैज़ाबादी का एक वीडियो देख कर अनारकली आॅफ आरा बनाने का आइडिया आया.

रश्मि: इस वास्तविक कथानक (अगर हो) में आपने कल्पना का मिश्रण कहां तक किया है?

अविनाश दास: दाल में नमक के बराबर फिल्म में सच्चाई की मात्रा है.

रश्मि: सेंसर बोर्ड से इस फिल्म को पास कराने में आपको क्या दिक्कत हुई?

अविनाश दास: फिल्म अभी सेंसर होने की प्रक्रिया में है.

रश्मि: क्या आपकी फिल्म पर किसी निर्देशक का प्रभाव है?

अविनाश दास: हां, उन तमाम निर्देशकों का प्रभाव है, जिनकी फिल्में आज तक मैंने देखी हैं.

कुमार रजत: अनारकली आरावाली से नाम अनारकली ऑफ आरा क्यों कर दिया गया?

अविनाश दास: हमने बहुत कोशिश की कि अनारकली आरावाली नाम हमें मिल जाए, लेकिन नहीं मिल पाया. फिर कई और नाम आये, जैसे देसी पॉप और अनारकली द क्वीन आदि-आदि. लेकिन नाम में चूंकि आरा का ज़िक्र ज़रूरी था इसलिए इसका नाम हमने अनारकली ऑफ आरा रखा. अलग से एक प्रसंग बताना चाहता हूं. इम्तियाज़ अली हमेशा से गीत बनाना चाहते थे, लेकिन अंतत: 'जब वी मेट' बन पाया. तो कभी कभी जो चीज़ आ जाती है, वही मान्य होती है.

रजत: फिल्म में ऐसा क्या खास है, जो इसकी यूएसपी है?

अविनाश दास: कई बात है. हिंदुस्तान में अब तक स्ट्रीट सिंगर पर कोई फिल्म नहीं है. दूसरी बात इसका देसीपन है. बिहार में जिस तरीके की हिंदी बोली जाती है, वह अनारकली आॅफ आरा की ज़बान है. संगीत तो खैर सबसे अहम है, जिसे ज़ी म्यूज़िक प्रमोट कर रहा है.

रजत: फिल्म प्रमोशन के लिए क्या टीम पटना, आरा जैसे शहरों में भी जाएगी या मेट्रो शहरों को टारगेट किया जाएगा?

अविनाश दास: हम पटना और आरा तो जाएंगे ही- रांची और जमशेदपुर भी जाएंगे.

रजत: फिल्म के नाम में आरा जुड़ा है तो क्या इसमें भोजपुरी लोकगायकों की ही बात होगी या फिर मैथिली, मगही, अंगिका या अन्य भाषाओं को भी जगह मिली है.

अविनाश दास: बात बस इतनी है कि अनारकली आॅफ आरा एक देसी गायिका के जीवन का एक टुकड़ा भर है. इसमें अन्य किसी लोकगायक का संदर्भ नहीं आया है. चूंकि कहानी आरा में सेट है, तो जो ज़बान आरा में बोली जाती है- उसके अलावा बिहार की दूसरी भाषा को कैसे उसमें शामिल किया जा सकता है. और यह हिंदी फिल्म है. स्थानीय बोली का हल्का सा तड़का भर है.

इस फिल्म की कई ख़ास बातें हैं, मसलन हिंदुस्तान में अब तक स्ट्रीट सिंगर पर कोई फिल्म नहीं है.

नवीन चंद्रकला कुमार: क्या अनारकली के गाये गीत लोकगीत ( भोजपुरी ) है या उससे प्रेरित हिंदी + भोजपुरी मिश्रित है?

अविनाश दास: हमारी फिल्म के संगीतकार रोहित शर्मा हैं. उनके साथ हमने हज़ारों की संख्या में बिहार यूपी के लोकगीत सुने होंगे. फिर उन्होंने अपनी रचनाशीलता के साथ एक नए तरह का संगीत रचा, जिसमें लोक (फोक) की बेहतरीन छौंक है. एक ट्रैक ख़ालिश भोजपुरी में भी है- लेकिन वह बैकग्राउंड में इस्तेमाल हुआ है. क्योंकि शहर आरा है, तो हवाओं में भोजपुरी का तैरना लाज़िमी था.

कुमार: अनारकली आरा से क्यों, फैजाबाद से क्यों नही , जबकि खुद अविनाश भाई ताराबानो फैजाबादी से प्रभावित हैं.

अविनाश दास: आपने शायद बात समझी नहीं. ताराबानो से मैं प्रभावित नहीं था. जब मैंने उनका गीत सुना, तो वह बहुत ज़्यादा इरोटिक था. लेकिन उनके चेहरे पर वैसा कोई भाव नहीं था. मैं चेहरे पर तैर रहे उस दर्द से जुड़ गया था. फिर गया में एक बार लोकगायिका देवी के साथ कुछ कांड हुआ था, जिसमें जयप्रकाश नारायण विश्वविद्यालय के कुलपति को इस्तीफा देना पड़ा था. यह एक हुक प्वाइंट था मेरी कहानी के सफ़र में. चूंकि मैं बिहार से हूं- मुझे लगा कि यह कहानी अगर वहां की ज़मीन इस्तेमाल करते हुए कहता हूं, तो ज़्यादा सही होगा.

कुमार: एक भोजपुरी भाषी होने के नाते (चुंकि भोजपुरी सिनेमा और संगीत अश्लीलता, फूहड़पन के चंगुल में है) इस फिल्म से एक बेहतर भविष्य कि कल्पना कर सकते है?

अविनाश दास: मैंने एक कहानी कहने की कोशिश की है. कहानी एक स्ट्रीट सिंगर की है. जैसे गाने वो गाती है, उसकी वजह से उसके जीवन की त्रासदियां क्या है- यह दिखाने की मैंने कोशिश की है. अब वह किस किस्म का भविष्य तय करेगा, वह फिल्म आ जाने के बाद ही तय होगा. लेकिन इतना ज़रूर यक़ीन दिला सकता हूं कि फिल्म का संगीत ही फिल्म की जान है. हमारी फिल्म में रेखा भारद्वाज, सोनू निगम, पावनी पांडे, स्वाति शर्मा और इंदु सोनाली (भोजपुरी) ने अपनी आवाज़ दी है.

कुमार: फिल्म का स्क्रिप्ट राइटर कौन है?

अविनाश दास: कथा, पटकथा और संवाद- तीनों ही मेरे लिखे हुए हैं.

कुमार: फिल्म के गीत किसने लिखे है?

अविनाश दास: कई गीतकार हैं, जिनसे हमने गीत लिखवाये हैं. रवींद्र रंधावा (फिल्मिस्तान), डाॅ सागर जेएनयू (मैं और चार्ल्स, बाॅलीवुड डायरीज़), प्रशांत इंगोले (बाजीराव मस्तानी), रामकुमार सिंह (भोभर, ज़ेड प्लस और सरकार 3) के अलावा मेरे भी गीत हैं.

कुमार: फिल्म क्या दुबई में भी प्रदर्शित होगी?

अविनाश दास: इंडिया के अलावा हम अनारकली आॅफ आरा को कहां कहां दिखाने में सक्षम हैं, अभी यह प्लानिंग चल रही है.

सुमान सौरभ: संगीत लोकसंगीत पर आधारित है या आज के दौर का असर होगा?

अविनाश दास: जाहिर है कि अनारकली आॅफ आरा गाने वाली लड़की की कहानी है - तो फिल्म म्यूज़िकल है. हमारे म्यूज़िक डाइरेक्टर रोहित शर्मा ने फिल्म का संगीत रचते हुए लोक यानी फोक की ज़मीन नहीं छोड़ी. हमारी फिल्म का संगीत आपको एक नयी दुनिया में ले जाएगा.

 अश्विनी सिंह: फिल्म की एडिटिंग के दौरान क्या महौल रहा, छोटे बजट की फिल्मों में अक्सर फुटेज की कमी और अन्य कमियों पर भी चर्चा होती है, तो इसकी एडिटिंग के समय और पूरे स्टूडियो में कैसा माहौल रहा.

अविनाश दास: हमारे प्रोड्यूसर संदीप कुमार ने कभी हमें ये नहीं कहा कि इसे छोटी फिल्म की तरह ट्रीट करो. उन्होंने किसी भी सामान्य मुख्यधारा की फिल्म की तरह हमें सारी सुविधाएं दीं. शूट के बाद आठ महीने तक के लिए हमारे पास एडिट रूम रहा.

निखिल आनंद गिरि: फिल्म के गाने लिखने की प्रक्रिया बताएँ. क्या गाने पहले ही से लिखे गए और बाद में म्यूज़िक आया. या उल्टा हुआ. ये कन्फ्यूजन हमेशा से दिमाग में रहती है मेरे.

अविनाश दास: हमारे म्यूज़िक डाइरेक्टर रोहित शर्मा शब्दों को ज़्यादा महत्व देते हैं. इसलिए पहले वे गाना लिखवाते थे - फिर उसकी धुन पर काम करते थे.

श्रीराम डाल्टन: कितने स्क्रीन पर एकसाथ फिल्म आयेगी? फिल्म में जितने गाने हैं उन सभी गानों को अनारकली स्टेज पर ही गायी है क्या?

अविनाश दास: अनारकली आॅफ आरा पैन इंडिया रीलीज़ हो रही है. स्क्रीन अभी तय नहीं है. लेकिन यह देश की हर प्रमुख जगहों पर रीलीज़ होगी. स्टेज परफाॅर्मेंसेज़ के अलावा भी फिल्म में संगीत की एक बड़ी दुनिया है.

अनारकली आॅफ आरा पैन इंडिया रीलीज़ हो रही है. स्क्रीन अभी तय नहीं है.

श्रीराम डाल्टन: किस उम्र में तय किया कि आपको सिनेमा करना है? क्या-क्या त्याग करना पड़ा सुर से सम्बंधित?

अविनाश दास: सिनेमा करने की बात बचपन से थी, लेकिन जीवन की परिस्थितियों के चलते मैं कुछ और कर रहा था. लेकिन जब चार-पांच साल पहले यह अंतिम तौर पर तय किया- तो ज़ाहिर है परिवार से दूर मुंबई आना पड़ा. मेरी पत्नी मुक्ता ने कहा- जा सिमरन, जी ले अपनी ज़िंदगी. सुर और हम दोनों एक दूसरे को बहुत मिस करते रहे. लेकिन अब दो-तीन महीनों में हम साथ-साथ रहने जा रहे हैं.

मेरे पास एक कहानी थी और मैं उस कहानी को सिनेमा के परदे पर कहने में कामयाब हुआ. यह बात मुझे भीतर से उत्साहित कर रही है. मैं इस उत्साह को आगे भी अच्छी रचनाधर्मिता में रूपांतरित करना चाहूंगा. बाकी श्याम बेनेगल की बात अपने आप में उनके अनुभव का क़तरा है. निचोड़ है. मैं तो बस यहां अपनी तरह की कहानी कहने के लिए आया हूं.

अरुण शीतांष: अविनाश आरा का ही चयन क्यों किया? साहित्यकारों के क्षेत्र के वजह से तो नहीं?

अविनाश दास: आरा से मेरी अच्छी वाक़फियत रही है. मैं यूपी के एक सिंगर से इंस्पायर्ड हुआ था- लेकिन चूंकि यूपी की ज़बान पर मेरी पकड़ नहीं थी- इसलिए मैंने बिहार के इस शहर का चयन किया. यह एक बहुत सही फ़ैसला था.

फिरोज़ खान: क्या "अनारकली ऑफ़ आरा" छोटे शहरों के सिनेमा घरों में भी लगेगी?

अविनाश दास: जहां जहां मल्टीप्लेक्सेज़ हैं - वहां वहां ये फिल्म लगेगी.

सुजित सिन्हा: हम इस फिल्म को क्यों देखें और दूसरों को क्यों देखने को कहें?

अविनाश दास: क्योंकि यह स्त्री अस्मिता की कड़ी में आने वाली एक अहम फिल्म है. समाज के तथाकथित फूहड़ पायदान पर दिखने वाली एक स्त्री के स्वाभिमान की कहानी है. इसलिए इसे ज़रूर देखना चाहिए.

सुजित सिन्हा: दरभंगा, मधुबनी को छोड़कर आरा को ही क्यों चुना?

अविनाश दास: क्योंकि दरभंगा मधुबनी में बाईजी के नाच की लोकप्रिय परंपरा नहीं रही है. पुराने मध्य बिहार में पीढ़ियों ने इसका आस्वाद लिया है और ले रही है.

मृणालिनी पाटिल: एक ऑफबीट फिल्म, जिसमें कोई स्टार नहीं है, उसे प्रोड्यूसर और डिस्ट्रीब्यूटर कैसे मिले?

अविनाश दास: इस मामले में मैं ख़ुशकिस्मत हूं कि मुझे संदीप कपूर जैसे प्रोड्यूसर मिले. उन्होंने सबसे पहले कहानी पर भरोसा किया और उसके बाद एक अच्छी टीम बनाने में उन्होंने मदद की. वे ख़ुद स्टारडम से ज्यादा टैलेंट पर भरोसा करते हैं, इसलिए उन्होंने मुझे फिल्म में एक्टर लेने के लिए प्रोत्साहित किया था, स्टार नहीं.

जैग़म इमाम: अविनाश भाई बॉलीवुड में जिस तरह की फ़िल्मों को म्यूजिक़ल का तमगा दिया जाता है उसमें आप कितने फ़िट हो पाएंगे. आपका आकलन. जाहिर सी बात है आपकी फ़िल्म में भोजपुरी संगीत भी होगा.

अजय ब्रह्मात्मज: मेरी धारणा में हिंदी फिल्‍म इंडस्‍ट्री सुपर हाईवे है. कुछ ही डायरेक्‍टर इस हाईवे पर सफलता से ड्राइव कर पाते हैं. आप और अविनाश जैसे फिल्‍मकार वैसी जरूरी पगडंडियां हैं, जो देश के सुदूर इलाकों को इस हाईवे से जोड़ती हैं. आप गौर करें कि पिछले 15 सालों में अनेक फिल्‍मकार इन पगडंडियों से हाईवे पर आए और सफल रहे हैं. आप दोनों भी सफल होंगे.

अविनाश दास: आपका सवाल बहुत अच्छा है ज़ैगम भाई लेकिन इसका जवाब तो आने वाले समय में ही साबित हो पाएगा. अभी तो हम यही कह सकते हैं कि फिल्म का संगीत एक तरह से लोगों के लिए सरप्राइज़ एलीमेंट है.

यूनुस खान: एक नये निर्देशक को बहुत संघर्ष करना पड़ता है. फिर आप तो पत्रकारिता से आए हैं. संघर्ष किस तरह का रहा. बना बनाया संसार छोड़कर मुंबई में कदम रखने के बाद.

अविनाश दास: हर तरह की यात्रा एक संघर्ष ही होती है. फिल्म बनाने के बारे सोचना और फिल्म बनाने की कोशिश करना और फिल्म बना लेना- यह एक प्रक्रिया है, यात्रा है. और कोई संसार बना बनाया नहीं होता. यह संसार भी. इसे भी एक दिन छोड़ कर जाना होता है. तो मुझे लगता है आदमी को विदेह होना चाहिए. मैं कुछ हद तक विदेह हूं.

सुजित सिन्हा: क्या यह उम्मीद की जाए कि इस फिल्म के आने के बाद बाईजी को लेकर लोगों का नजरिया बदलेगा, खासकर भोजपुर क्षेत्र में?

अविनाश दास: बाईजी लोगों के बहाने यह फिल्म हर स्त्री की कहानी है. हमारा काम कहानी बताना है - उस अमल करना न करना समाज का अपना विशेषाधिकार है.

आशुतोष कुमार पांडेय: अविनाश पर्दे पर फ़िल्म आने से पहले दिमाग में फ़िल्म बन रही होगी या बनी होगी. यह फ़िल्म बनाने का ख्याल कब आया मेरा मतलब कि वह कौन सा वाकया हुआ या दिलो-दिमाग में जादू हुआ कि बस अब फ़िल्म 'ही' या 'भी' बनानी है?

अविनाश दास: 2006 या 07 में मैंने यूट्यूब पर ताराबानो फ़ैज़ाबादी का एक गाना सुना था- 'हरे हरे नेबुआ कसम से गोल गोल.' इस म्यूज़िक वीडियो में कुछ सेकेंड के लिए ताराबानो का फुटेज़ है. उसमें उनके चेहरे के सपाट भाव ने मुझे एक स्ट्रीट सिंगर की कहानी कहने के लिए प्रेरित किया.

ताराबानो के चेहरे के सपाट भाव ने मुझे एक स्ट्रीट सिंगर की कहानी कहने के लिए प्रेरित किया.

सुजित सिन्हा: स्वरा भास्कर को लेने का विचार कैसे आया? बिहार से कौन-कौन से कलाकार को लिया गया है?

अविनाश दास: स्वरा को इसलिए लिया क्योंकि स्वरा के अलावा इस किरदार को कोई और कर ही नहीं सकता था. फिल्म में नब्बे फ़ीसदी से ज्यादा बिहार के ही कलाकार हैं.

बृजेश अनय: एक लाइन में कहानी या उसका विषय बताने का कष्ट करें...

अविनाश दास: एक गाने वाली लड़की की अपने आत्मसम्मान की रक्षा की कहानी है.

First published: 16 February 2017, 8:53 IST
 
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