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एक प्रदर्शन स्थल मात्र नहीं है रंगमंच

त्रिपुरारी शर्मा | Updated on: 10 February 2017, 1:51 IST

इसमें संदेह नहीं कि रंगमंच जीवन का मुहावरा है. व्यक्ति के जीवनकाल की तरह यह भी स्थान और समय से बाध्य है और जीवन की तरह ही यह अद्भुत है. अनेक रसों का संगम और विभिन्न विधाओं का समावेश हर प्रस्तुति में झलक उठता है. अंग्रेज़ अपने साथ जब आधुनिक प्रेक्षागृहों का नक्शा लाए, तब वाजिद अली शाह लखनऊ के केसरबाग में आकाश तले 'रहस' रच रहे थे.

पारसी रंगमंच मनोरंजन के माध्यम से अपना स्थायित्व बना रहा था और उधर भारतेंदु हरिश्चंद्र ने सामाजिक सरोकार और लोकशैलियों के ताने बाने से 'अंधेर नगरी, चौपट राजा' खेलकर मंच के संदर्भ में समकालीनता को नया आयाम दिया.

आज़ादी के बाद भी समकालीन चिंतन नागरी मंच का विशेष ध्येय बना रहा. राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के प्रारंभिक दौर के एक दीक्षांत समारोह में ज़ाकिर हुसैन ने इस ओर इशारा करते हुए कहा था कि प्राचीन नाटक के प्रासंगिक बन पाने में ही उसके खेले जाने का औचित्य है.

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नाटक सदा वर्तमान में है किंतु स्थिर नहीं, क्योंकि उसका वर्तमान दर्शक से है और वे भिन्न सूत्रों को एकसाथ ग्रहण करने की क्षमता रखते हैं. इसीलिए कई तरह के प्रयोग यहां संभव हो पाए हैं.

इब्राहिम अल्काज़ी ने मंच के प्रति वैज्ञानिक दृष्टि उत्पन्न की और तकनीक की सुक्ष्मता के साथ कलात्मक प्रवीणता को प्रखर किया. हबीब तनवीर ने प्रेक्षागृह की परिधि के बाहर जनमानस और लोक अभिनय की क्षमताओं से ऐसा रंगकर्म रचा जो जीवन की गति से अधिक सजीव और सहज है.

उत्पल दत्त वर्ग संघर्ष और मानव मूल्यों से जूझते रहे. बव कारंत ने लोक ऊर्जा और ध्वनि के संगीत से मंच को भरना चाहा. कोवलम नारायण पाणिकर ने वर्तमान की कसौटी पर अतीत के महाग्रंथों को पुनःअवतरित किया. विजय तेंदुलकर ने मुंबई की कठोर विडंबनाओं को रेखांकित किया.

नाटक सदा वर्तमान में है किंतु स्थिर नहीं, क्योंकि उसका वर्तमान दर्शक से है और वे भिन्न सूत्रों को एकसाथ ग्रहण करने की क्षमता रखते हैं

नंद किशोर आचार्य ने महाभारत के पात्रों द्वारा स्त्री अस्मिता का प्रश्न उठाया, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना का नाटक 'बकरी' सत्ता का उपहास करता है. इन सभी प्रयोगों का चमत्कार अलग था, किंतु इन सब के प्रयास में सामाजिक यथार्थ का गहरा बोध था, विचारों में समानता नहीं थी किंतु विचारों का टकराव नींव में निहित था.

इनका उद्देश्य सेखी बघारना नहीं था, न ही वे चतुर चुस्त तात्कालिक टिप्पणी करते हैं. किंतु इतना अवश्य प्रतीत होता है कि समय का यथार्थ ही इन रचनाओं का प्रेरक बिंदु रहा है. वे वास्तविकता को इस तरह उजागर करते हैं कि सतह की गहरी कोई परत छू जाती है.

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कन्हैयालाल की प्रस्तुति 'द्रौपदी' सेना और समाज के बीच के द्वन्द्व और अविश्वास को प्रतिरोध की पराकाष्ठा तक ले जाती है. मणिपुर से अपना मुहावरा तराशकर रतन थियेम का काम अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त कर रहा है. शब्द से उत्पन्न मनोस्थिति को वे सक्षम रंगभाषा में ढाल लेते हैं.

रंगभाषा का विस्तार ही एक तरह से आधुनिक मंच का इतिहास है. अनेक शहरों में उत्पन्न नाट्यदल इस प्रक्रिया में सक्रिय रहे. उनके लिए रंगकार्य आनंद का श्रोत रहा. कुछ ने उसे सामाजिक दायित्व भी माना. बीकानेर, जयपुर, उदयपुर, नैनीताल, गोरखपुर, कानपुर, इलाहाबाद, उज्जैन जैसे कई शहर स्तरीय गतिविधियों का केंद्र रहे हैं. कलाकारों ने प्रशिक्षित रंगकर्मियों के साथ काम किया, उससे उत्साहित हुए और अपने भीतर के कलाकार को विकसित किया.

इसी फैलाव का दूसरा पक्ष भी था. लगभग हर ज़िले के किसी दल या कालेज की नुक्कड़ नाटक में भागीदारी और उसका व्यापक मंचन. आपातकाल के बाद से ही अभिव्यक्ति की ऐसी जागरूकता फैली कि महिलाएं, मजदूर, दलित, सभी अपनी आवाज़ का मज़बूत ऐलान करना चाहते थे. इसका सीधा परिणाम न सही, लेकिन कुछ समय बाद यही स्वर मुख्यधारा के मंच पर भी सुनाई देने लगे.

महिला निर्देशकों ने अपनी पहचान बनाई. उषा गांगुली, नीलम मानसिंह, माय राव, अनुराधा कपूर के काम में स्त्री दृष्टि उभर पाई. वामन केंद्रे ने दलित और शोषित की अवहेलना का चित्रण किया. धीरे-धीरे आत्मविश्वास बढ़ा और ऐसे कई ग्रुप और निर्देशक सामने आए जो पूर्व रचित आलेख का प्रयोग न करके स्वयं ही नाट्य प्रस्तुतियां रचने लगे. बहुतों ने देवेंद्रराज अंकुर की राह पर चलते हुए कहानियों का मंचन किया. कुछ ने किसी घटना, अनुभव, अख़बार से भी संदर्भ लेकर उसकी रचनात्मक व्याख्या और संरचना करने का प्रयास किया.

शब्द से उत्पन्न मनोस्थिति को वे सक्षम रंगभाषा में ढाल लेते हैं

यह एक रुचिकर अध्याय है क्योंकि इसमें कई नए तरह के प्रयोग सामने आए. जितने विभिन्न रूप, उतने ही विभिन्न स्तर. उन्हें एक तरह से आंका नहीं जा सकता. आंकना आवश्यक भी नहीं. क्योंकि बढ़ते हुए केंद्रित (टीवी के माध्यम से) एकतरफा प्रचार प्रसार के दौर में निजी रचनात्मकता अपने आप में एक साहस का कार्य हो गया है. और इस साहस को अगर कोई समूह जुटा पाता है तो वह निश्चित रूप से सराहनीय है. क्योंकि आज स्वरचना का अर्थ है उपभोक्ता से अधिक होने की इच्छा को प्रकट करना. इस इच्छा से समाज लाभान्वित ही होता है.

यहां यह कहना अनुचित नहीं होगा कि रंगकर्म के सामने आज भी कठिनाइयां हैं. उचित दर पर अच्छे प्रेक्षागृह उपलब्ध नहीं हो पा रहे. सरकारी सहयोग से बने प्रेक्षागृह भी आज रंगकर्मियों की पहुंच से बाहर हैं. हाशिए पर छूटे लोक कलाकारों की तरह ही मंच अभिनेता के पास आर्थिक स्थायित्व नहीं है. संसाधनों का अभाव भी साथ साथ चलता है.

दूसरी तरफ यह भी देखा जा सकता है कि रंगमंच को लेकर चहल-पहल बहुत बढ़ गई है. एक के बाद एक नाट्योत्सव आयोजित किए जा रहे हैं. अधिकांश उत्सव चुनिंदा नामों पर केंद्रित होते जा रहे हैं. फ़िल्म या टेलीविज़न के कलाकार इसका प्रमुख आकर्षण होते हैं. महंगे टिकट पर मनोरंजन का विशेष स्तर निश्चित है. इस चमक के बीच बहुत से रंगकर्मी खुद को विस्थापित होता हुआ पाते हैं. वे इस उत्सव का हिस्सा नहीं हैं.

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यथार्थ से जूझने वाला रंगकर्म उत्सव की संस्कृति के दायरे में आसानी से नहीं आता. उत्सव के संयोजक तय करते हैं कि किस नाटक का चुनाव किया जाए. किस नाटक को अधिक पब्लीसिटी दी जाए. किसकी प्रसिद्धि की डोर से उनका उत्सव और बड़ा बन सकता है. लेकिन यह देश की विराट प्रतिभा का प्रतिनिधित्व नहीं हो सकता. उत्सवों की चयन प्रक्रिया रंगकर्म के स्वभाव को प्रभावित कर रही है.

विरोधाभास तब खड़ा होता है जब टिकट खरीदने वाले का यथार्थ और रंगकर्मी का यथार्थ एक न हो

उभरते हुए रंगकर्मी के लिए अब निजी कलात्मक निर्णय लेना सरल नहीं रह गया है. दूसरों के अनुकूल अपने मंच को परिभाषित करने की प्रवृत्ति अगर बढ़ती गई तो प्रयोग की स्वतंत्रता का घट जाना स्वाभाविक है. पुराने रंगकर्मियों का यह कहना कि "असफलताओं से मत घबराओ पर खुद को मत दोहराओ- प्रयोग करो" आज किसी भविष्य की गूंज लगती है.

टिकट के माध्यम से हो रहा लेन-देन जो स्वीकृति पा रहा है, वह अच्छी बात है. पर यह भी नहीं मान लेना चाहिए कि पहले तो यह संभव ही नहीं था. स्वतंत्र सार्थक रचनात्मकता के पक्ष में खड़े रहने वाले रंगकर्मियों ने इसे नकारा था. हो सकता है यह सही न रहा हो, पर तात्कालिक आर्थिक लाभ भी इसका उत्तर नहीं है.

विरोधाभास तब खड़ा होता है जब टिकट खरीदने वाले का यथार्थ और रंगकर्मी का यथार्थ एक न हो. इस तनाव में संवेदना का बना रहना एक चुनौती है और इसके लिए कलाकार को क्या अब व्यापारी भी होना होगा? मंच क्योंकि एक सार्वजनिक प्रयोजन है इसलिए उसके व्यवसायिक स्वरूप का चिंतन आज आवश्यक हो गया है लेकिन यदि बाज़ारवाद हावी होने लगा तो इसके वस्तुकरण से रंगकर्म की आत्मा का हनन हो सकता है. मंच मात्र प्रदर्शन स्थल नहीं है. वह सार्वजनिक संप्रेषण और अनुभूति की संभावना है.

First published: 29 March 2016, 10:22 IST
 
त्रिपुरारी शर्मा @catchhindi

प्रोफेसर त्रिपुरारी शर्मा राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय(एनएसडी) में अभिनय की प्रोफेसर हैं.

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