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सीबीएसई स्कूलों में नैतिक शिक्षा: नैतिकता में दखल से सुप्रीम कोर्ट का इनकार

सौरभ दत्ता | Updated on: 10 February 2017, 1:48 IST

अक्सर लोग न्यायपालिका को एक ऐसे कारगर हथियार के रूप में देखते हैं जिसके सहारे सामाजिक ढांचे में बदलाव के प्रतिमान गढ़े जा सकते हैं. लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने अपने 22 जुलाई के एक निर्णय में इस विचार से अपनी नाइत्तेफाकी जाहिर कर दी है.

मामले की शुरुआत

फरवरी 2015 में एक महिला वकील संतोष सिंह ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की थी. याचिका का विषय यह था कि वो इस बात से व्यथित हैं कि आज के भारत के युवा किस तरह दिग्भ्रमित होते जा रहे हैं. उन्होंने याचिका में समाज में गिरते नैतिक मूल्यों पर चिंता जताते हुए सीबीएसई स्कूलों के पाठ्यक्रम में नैतिक शिक्षा को अनिवार्य विषय के रूप में शामिल किए जाने की मांग की थी.

सिंह ने अपनी याचिका में सुप्रीम कोर्ट से मांग की थी कि वह समाज में नैतिक मूल्यों में तेजी से आ रही गिरावट को रोकने के लिए समुचित दिशा-निर्देश जारी करे. याचिका में यह भी कहा गया था कि पाठ्यक्रम में नैतिक शिक्षा को जरूरी करने से छात्रों में राष्ट्रीय चरित्र का विकास होगा. इसलिए स्कूलों में नैतिक शिक्षा अनिवार्य होनी चाहिए और ये सरकार का संवैधानिक दायित्व भी है.

उस समय जस्टिस एचएल दत्तू और जस्टिस एके सीकरी की पीठ ने मानव संसाधन मंत्रालय और सीबीएसई को इस बाबत नोटिस जारी किया था. मई 2015 में नैतिक शिक्षा को अनिवार्य बना दिया गया.

अब सुप्रीम कोर्ट के एक अन्य जस्टिस चंद्रचूड ने अपने पूर्ववर्तियों से अलग हटकर विचार व्यक्त किया है. उन्होंने व्यवस्था दी कि कोर्ट की अपनी एक सीमा है और वो इसके आगे नहीं जा सकता. सामाजिक बदलाव की कोशिशों में लिप्त होने से न्यायपालिका को दूर रहना चाहिए. उन्होंने यह भी कहा कि समाज में हर अच्छी बात को लागू करने के लिए अदालत का आदेश जनहित याचिका के माध्यम से नहीं लिया जा सकता.

न्यायिक मॉडल पर नियंत्रण

वर्तमान में न्यायिक सक्रियता के विरोध के कई उदाहरण सामने आए हैं कि अदालत उन नीतिगत मामलों में अपना हथौड़ा चला रही है जिन मामलों को सरकार को तय करना है.

इस बाबत भारत के एक सम्मानित पूर्व न्यायाधीश बीएन श्रीकृष्ण ने 2005 में लिखे एक लेख में न्यायिक सक्रियता की आलोचना करते हुए इसे खतरनाक औजार बताया था.

वर्तमान मामले में भी न्यायाधीश चंद्रचूड ने जजों की किसी भी एक्टिविस्ट भूमिका से स्पष्ट इनकार किया है. उन्होंने यह भी रेखांकित किया है कि कोर्ट का काम संविधान और कानून से जुड़े मामलों को देखना है. न्यायपालिका की भूमिका इसी सीमा में रहनी चाहिए. नैतिक मूल्यों को लागू कराने जैसी नीतियों को लागू कराने में कोर्ट को नहीं उलझाना चाहिए. ऐसे मामलों पर निर्णय लेने का अधिकार उन लोगों का है जो सरकार और सत्ता में बैठे हैं.

जजों ने अपने निर्णय के पैरा 19 में कहा है कि यह याचिका उन मामलों में से एक उदाहरण है जो न्यायिक पुनर्विचार के दायरे से परे है. कक्षा एक से 12 तक के कोर्स में नैतिक शास्त्र को अलग विषय बनाया जाए, यह तय करने का काम कोर्ट का नहीं है. मूल्य आधारित शिक्षा व्यवस्था, नैतिक शिक्षा को अलग विषय के रूप में शामिल करने से बेहतर होगी या मूल्य आधारित शिक्षा को एक निर्धारित पाठ्यक्रम में पढ़ाया जाए, इसका समाधान न्यायिक पुनर्विचार के मानकों को लागू करके नहीं सुलझाया जा सकता.

समाज में शिक्षा की भूमिका

याचिका के प्रति अपनी अनिच्छा जाहिर करने के बाद भी जस्टिस चंद्रचूड ने यह कहा है कि सचमुच में समाज में नैतिकता बेहद जरूरी है. नैतिक शिक्षा दी जानी चाहिए. ऐसे समय में जब याचिकाकर्ता के साथ ही सत्तारूढ़ सरकार के द्वारा बार-बार नैतिकता का पाठ पढ़ाने का राग अलापा जा रहा है, ऐसे में जस्टिस चंद्रचूड के विचार स्वागतयोग्य हैं.

उन्होंने कहा कि कोई भी शिक्षा तब तक अपूर्ण है जब तक कि वह मूल्य आधारित नहीं बनती, धर्म और मान्यताओं का सम्मान करना और उसको स्वीकार करना नहीं सिखाती. सबसे अधिक तो यह कि इसके जरिए लोकतंत्र में विश्वास पक्का होना चाहिए. लोगों को भरोसा होना चाहिए कि लोकतंत्र सिर्फ गवर्नेंस की व्यवस्था नहीं है बल्कि यह जीवन जीने का तरीका भी है.

वर्तमान में देश में व्यवस्था के खिलाफ कई प्रदर्शन हुए हैं जहां सत्ता ने उन्हें दबाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है. विश्वविद्यालय के छात्र जो अपनी असहमति के अधिकार के साथ प्रदर्शन कर रहे थे, उन पर भी देशद्रोह का अभियोग लगाया गया. असहमति तो लोकतंत्र का एक महत्वपूर्ण पोषक तत्व है.

अशांति और अराजकता के मौजूदा दौर में जस्टिस चंद्रचूड़ के ये शब्द उन लोगों को जगाने वाले होंगे जो बदलाव के बहाने शिक्षा को तोड़मरोड़ रहे हैं, उसे विकृत कर रहे हैं.

First published: 25 July 2016, 8:21 IST
 
सौरभ दत्ता @catchnews

संवाददाता, कैच न्यूज़

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