Home » कल्चर » Swami Vivekananda Jayanti: National Youth Day celebration, PM Modi salutes the saint
 

स्वामी विवेकानंद: जीवन में खतरे मोल लीजिए, जीते तो नेतृत्वकर्ता हारे तो पथ प्रदर्शक

कैच ब्यूरो | Updated on: 12 January 2017, 12:05 IST

महान विचारक स्वामी विवेकानंद की जयंती पर देशभर में उनके विचारों को याद करते हुए श्रद्धांजलि दी जा रही है. उनकी जयंती को राष्ट्रीय युवा दिवस (नेशनल यूथ डे) के तौर पर भी मनाया जा रहा है. 

पीएम नरेंद्र मोदी ने ट्वीट करते हुए स्वामी विवेकानंद को याद किया. पीएम मोदी ने लिखा, "मैं स्वामी विवेकानंद को नमन करते हुए उनके शक्तिशाली विचारों को याद कर रहा हूं. ऐसे विचार और आदर्श जो कई पीढ़यों की विचारधारा को आकार देते रहेंगे."

जीवन और दर्शन

प्रसार भारती ने स्वामी विवेकानंद के जीवन पर प्रकाश डालते हुए ट्वीट किया है. विवेकानंद का जन्म 12 जनवरी 1863 को कोलकाता में हुआ था. उनके बचपन का नाम नरेंद्रनाथ दत्त था. 

प्रसार भारती के ट्वीट के जरिए बताया गया है कि स्वामी विवेकानंद पहले ऐसे धर्मगुरु थे, जिन्होंने कहा कि भारत के पिछड़ने की मुख्य वजह जनता की अनदेखी है. विवेकानंद ने रामकृष्ण मठ, बारानगर मठ, रामकृष्ण मिशन और वेदांत सोसाइटी की स्थापना की. इसके अलावा उन्होंने हिंदू वेदांत के दर्शन के बारे में बताने के साथ ही इस विचार का दुनिया में प्रसार किया. 

इसके साथ ही शिकागो का उनका संबोधन काफी प्रसिद्ध है. अमेरिका के शहर में आयोजित इस धर्मसंसद में 11 सितंबर 1893 को उन्होंने भारत का प्रतिनिधित्व करते हुए सम्मोहित करने वाला भाषण दिया. इस दौरान संबोधन की शुरुआत में अमेरिका के मेरे प्यारे भाइयों और बहनों कहते ही तालियों की गड़गड़ाहट होने लगी थी.

वित्त मंत्री अरुण जेटली ने राष्ट्रीय युवा दिवस का जिक्र करते हुए स्वामी विवेकानंद को महान दार्शनिक और संत करार दिया.

रेल मंत्री सुरेश प्रभु ने कहा, "स्वामी विवेकानंद जी की जयंती पर उन्हें मेरी श्रद्धांजलि. उनके सिद्धांत और विचार हमें हमेशा प्रेरणा देते रहेंगे."

उत्तराखंड के मुख्यमंत्री हरीश रावत ने अपने ट्वीट में लिखा, "युवा संन्यासी के रूप में भारतीय संस्कृति की सुगंध विदेशों में बिखेरने वाले साहित्य दर्शन और इतिहास के प्रकांड विद्वान स्वामी विवेकानंद की जयंती पर नमन."

महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस ने अपने ट्वीट में लिखा, "महान विचारक और असली यूथ आइकन स्वामी विवेकानंद जी को उनकी जयंती पर नमन." 

बॉलीवुड अदाकारा जूही चावला ने अपने ट्वीट में लिखा, "हमारा देश दुनिया का सबसे युवा देश है. आइए हमारी युवा शक्ति दुनिया का नेतृत्व करे."

पूर्व क्रिकेटर वीरेंद्र सहवाग ने लिखा, "महान स्वामी विवेकानंद को उनकी जयंती पर श्रद्धांजलि. जीवन में खतरे मोल लेने चाहिए. अगर आप जीतते हैं तो नेतृत्व करने को मिलेगा और अगर हारते हैं तो मार्गदर्शक बन सकते हैं."

परमहंस से मुलाकात

युवावस्था में स्वामी विवेकानंद को पाश्चात्य दार्शनिकों के निरीश्वर भौतिकवाद तथा ईश्वर के अस्तित्व में दृढ़ भारतीय विश्वास के कारण गहरे द्वंद्व से गुज़रना पड़ा. परमहंस जी जैसे जौहरी ने रत्न को परखा. 

उन दिव्य महापुरुष के स्पर्श ने नरेन्द्र को बदल दिया. इसी समय उनकी भेंट अपने गुरु रामकृष्ण से हुई, जिन्होंने पहले उन्हें विश्वास दिलाया कि ईश्वर वास्तव में है और मनुष्य ईश्वर को पा सकता है. 

रामकृष्ण ने सर्वव्यापी परमसत्य के रूप में ईश्वर की सर्वोच्च अनुभूति पाने में नरेंद्र का मार्गदर्शन किया और उन्हें शिक्षा दी कि सेवा कभी दान नहीं, बल्कि सारी मानवता में निहित ईश्वर की सचेतन आराधना होनी चाहिए. यह उपदेश विवेकानंद के जीवन का प्रमुख दर्शन बन गया.  

रामकृष्ण परमहंस से मुलाकात के बाद नरेंद्रनाथ दत्त का स्वामी विवेकानंद के तौर पर रूपांतरण हुआ.

25 साल में संन्यास

कहा जाता है कि उस शक्तिपात के कारण कुछ दिनों तक नरेन्द्र उन्मत्त-से रहे. उन्हें गुरु ने आत्मदर्शन करा दिया था. पचीस साल की अवस्था में नरेन्द्रदत्त ने गेरुआ वस्त्र धारण किया. अपने गुरु से प्रेरित होकर नरेंद्रनाथ ने संन्यासी जीवन बिताने की दीक्षा ली और स्वामी विवेकानंद के रूप में जाने गए. 

जीवन के आलोक को जगत के अन्धकार में भटकते प्राणियों के समक्ष उन्हें उपस्थित करना था. स्वामी विवेकानंद ने पैदल ही पूरे भारत की यात्रा की.

राष्ट्र का पुनर्निर्माण

रामकृष्ण की मृत्यु के बाद उन्होंने स्वयं को हिमालय में चिंतनरूपी आनंद सागर में डुबाने की चेष्टा की, लेकिन जल्दी ही वह इसे त्यागकर भारत की कारुणिक निर्धनता से साक्षात्कार करने और देश के पुनर्निर्माण के लिए समूचे भारत में भ्रमण पर निकल पड़े. 

इस दौरान उन्हें कई दिनों तक भूखे भी रहना पड़ा. छह साल के भ्रमण काल में वह राजाओं और दलितों, दोनों के अतिथि रहे. उनकी यह महान यात्रा कन्याकुमारी में समाप्त हुई, जहां ध्यानमग्न विवेकानंद को यह ज्ञान प्राप्त हुआ कि राष्ट्रीय पुनर्निर्माण की ओर रुझान वाले नए भारतीय वैरागियों और सभी आत्माओं, विशेषकर जनसाधारण की सुप्त दिव्यता के जागरण से ही इस मृतप्राय देश में प्राणों का संचार किया जा सकता है. 

11 सितंबर 1893 का ऐतिहासिक भाषण

भारत के पुनर्निर्माण के प्रति उनके लगाव ने ही उन्हें अंततः 1893 में शिकागो धर्म संसद में जाने के लिए प्रेरित किया, जहां वह बिना आमंत्रण के गए थे, परिषद में उनके प्रवेश की अनुमति मिलनी ही कठिन हो गयी. 

उनको समय न मिले, इसका भरपूर प्रयास किया गया. पराधीन भारत क्या सन्देश देगा- यूरोपीय वर्ग को तो भारत के नाम से ही घृणा थी.  एक अमेरिकन प्रोफेसर की कोशिशों से किसी प्रकार समय मिला और 11 सितंबर सन् 1893 के उस दिन उनके अलौकिक तत्वज्ञान ने पाश्चात्य जगत को चौंका दिया. 

अमेरिका ने स्वीकार कर लिया कि वस्तुत: भारत ही जगद्गुरु था और रहेगा. स्वामी विवेकानन्द ने वहां भारत और हिन्दू धर्म की भव्यता स्थापित करके ज़बरदस्त प्रभाव छोड़ा. 'सिस्टर्स ऐंड ब्रदर्स ऑफ़ अमेरिका' (अमेरिकी बहनों और भाइयों) के संबोधन के साथ अपने भाषण की शुरुआत करते ही 7000 प्रतिनिधियों ने तालियों के साथ उनका स्वागत किया. 

4 जुलाई 1902 को बेलूर में ब्रह्मलीन

विवेकानंद ने वहां एकत्र लोगों को सभी मानवों की अनिवार्य दिव्यता के प्राचीन वेदांतिक संदेश और सभी धर्मों में निहित एकता से परिचित कराया. सन् 1896 तक वे अमेरिका रहे. उन्हीं का व्यक्तित्व था, जिसने भारत एवं हिन्दू-धर्म के गौरव को पहली बार विदेशों में जाग्रत किया. 

धर्म एवं तत्वज्ञान के समान भारतीय स्वतन्त्रता की प्रेरणा का भी उन्होंने नेतृत्व किया. स्वामी विवेकानन्द कहा करते थे, "मैं कोई तत्ववेत्ता नहीं हूं. न तो संत या दार्शनिक ही हूं. मैं तो ग़रीब हूं और ग़रीबों का अनन्य भक्त हूं. मैं तो सच्चा महात्मा उसे ही कहूंगा, जिसका हृदय ग़रीबों के लिये तड़पता हो." 4 जुलाई 1902 को 39 साल की अवस्था में बेलूर मठ में यह युवा संन्यासी और दार्शनिक ब्रह्मलीन हो गया, लेकिन उनके विचारों का खजाना अब भी बहुत से लोगों को प्रेरित करता है.

First published: 12 January 2017, 12:05 IST
 
अगली कहानी