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स्वामी विवेकानंद: जब पवित्रता नहीं रहती, तब आध्यात्मिकता विदा हो जाती है

सुधाकर सिंह | Updated on: 4 July 2017, 11:13 IST

महान विचारक स्वामी विवेकानंद का जन्म 12 जनवरी 1863 को कोलकाता में हुआ था. उनके बचपन का नाम नरेंद्रनाथ दत्त था. युवावस्था में स्वामी विवेकानंद को पाश्चात्य दार्शनिकों के निरीश्वर भौतिकवाद और ईश्वर के अस्तित्व में दृढ़ भारतीय विश्वास के कारण गहरे द्वंद्व से गुज़रना पड़ा. स्वामी रामकृष्ण परमहंस जी जैसे जौहरी ने रत्न को परखा. 

उन दिव्य महापुरुष के स्पर्श ने नरेन्द्र को बदल दिया. परमहंस ने सबसे पहले उन्हें विश्वास दिलाया कि ईश्वर वास्तव में है और मनुष्य ईश्वर को पा सकता है. रामकृष्ण परमहंस ने सर्वव्यापी परमसत्य के रूप में ईश्वर की सर्वोच्च अनुभूति पाने में नरेंद्र का मार्गदर्शन किया और उन्हें शिक्षा दी कि सेवा कभी दान नहीं, बल्कि सारी मानवता में निहित ईश्वर की सचेतन आराधना होनी चाहिए. यह उपदेश विवेकानंद के जीवन का प्रमुख दर्शन बन गया. 

कहा जाता है कि उस शक्तिपात के कारण कुछ दिनों तक नरेन्द्र उन्मत्त-से रहे. उन्हें गुरु ने आत्मदर्शन करा दिया था. पच्चीस साल की अवस्था में नरेन्द्रदत्त ने गेरुआ वस्त्र धारण किया. अपने गुरु से प्रेरित होकर नरेंद्रनाथ ने संन्यासी जीवन बिताने की दीक्षा ली और स्वामी विवेकानंद के रूप में जाने गए.

पूरे भारत की पद यात्रा

जीवन के आलोक को जगत के अन्धकार में भटकते प्राणियों के समक्ष उन्हें उपस्थित करना था. स्वामी विवेकानंद ने पैदल ही पूरे भारत की यात्रा की. स्वामी विवेकानंद पहले ऐसे धर्मगुरु थे, जिन्होंने कहा कि भारत के पिछड़ने की मुख्य वजह जनता की अनदेखी है.

विवेकानंद ने रामकृष्ण मठ, बारानगर मठ, रामकृष्ण मिशन और वेदांत सोसाइटी की स्थापना की. इसके अलावा उन्होंने हिंदू वेदांत के दर्शन के बारे में बताने के साथ ही इस विचार का दुनिया में प्रसार किया. 

शिकागो का ऐतिहासिक संबोधन

इसके साथ ही शिकागो का उनका संबोधन काफी प्रसिद्ध है. अमेरिका के शहर में आयोजित इस धर्मसंसद में 11 सितंबर 1893 को उन्होंने भारत का प्रतिनिधित्व करते हुए सम्मोहित करने वाला भाषण दिया. भारत के पुनर्निर्माण के प्रति उनके लगाव ने ही उन्हें आखिरकार 1893 में शिकागो धर्म संसद में जाने के लिए प्रेरित किया, जहां वह बिना आमंत्रण के गए थे, परिषद में उनके प्रवेश की अनुमति मिलनी ही कठिन हो गई थी. 

उनको समय न मिले, इसका भरपूर प्रयास किया गया. पराधीन भारत क्या सन्देश देगा- यूरोपीय वर्ग को तो भारत के नाम से ही घृणा थी.  एक अमेरिकन प्रोफेसर की कोशिशों से किसी प्रकार समय मिला और 11 सितंबर सन् 1893 के उस दिन उनके अलौकिक तत्वज्ञान ने पाश्चात्य जगत को चौंका दिया. 

तीन साल तक अमेरिका प्रवास

अमेरिका ने स्वीकार कर लिया कि वस्तुत: भारत ही जगद्गुरु था और रहेगा. स्वामी विवेकानन्द ने वहां भारत और हिन्दू धर्म की भव्यता स्थापित करके ज़बरदस्त प्रभाव छोड़ा. 'सिस्टर्स एंड ब्रदर्स ऑफ़ अमेरिका' (अमेरिकी बहनों और भाइयों) के संबोधन के साथ अपने भाषण की शुरुआत करते ही 7000 प्रतिनिधियों ने तालियों के साथ उनका स्वागत किया. 

विवेकानंद ने वहां एकत्र लोगों को सभी मानवों की अनिवार्य दिव्यता के प्राचीन वेदांतिक संदेश और सभी धर्मों में निहित एकता से परिचित कराया. सन् 1896 तक वे अमेरिका रहे. उन्हीं का व्यक्तित्व था, जिसने भारत एवं हिन्दू-धर्म के गौरव को पहली बार विदेशों में जाग्रत किया. 

39 साल में ब्रह्मलीन युवा संन्यासी

धर्म एवं तत्वज्ञान के समान भारतीय स्वतन्त्रता की प्रेरणा का भी उन्होंने नेतृत्व किया. स्वामी विवेकानन्द कहा करते थे, "मैं कोई तत्ववेत्ता नहीं हूं. न तो संत या दार्शनिक ही हूं. मैं तो ग़रीब हूं और ग़रीबों का अनन्य भक्त हूं. मैं तो सच्चा महात्मा उसे ही कहूंगा, जिसका हृदय ग़रीबों के लिये तड़पता हो."

4 जुलाई 1902 को 39 साल की अवस्था में बेलूर मठ में यह युवा संन्यासी और दार्शनिक ब्रह्मलीन हो गया, लेकिन उनके विचारों का खजाना अब भी बहुत से लोगों को प्रेरित करता है.

स्वामी विवेकानंद के विचार 

  1. उठो जागो और तब तक नहीं रुको जब तक लक्ष्य की प्राप्ति न हो जाए.
  2. संभव की सीमा जानने का केवल एक ही तरीका है असंभव से भी आगे निकल जाना.
  3. विश्व एक व्यायामशाला है, जहां हम ख़ुद को मजबूत बनाने के लिए आते हैं. 
  4. जीवन में ज़्यादा रिश्ते होना ज़रूरी नहीं है पर जो रिश्ते हैं उनमें जीवन होना ज़रूरी है. 
  5. जो हमेशा कहे मेरे पास समय नहीं, असल में वह व्यस्त नहीं बल्कि अस्त-व्यस्त है. 
  6. एक किताब के साथ उसके पृष्ठों का जो संबंध है वही हमारे साथ हमारे जन्मों का भी है.
  7. सफलता हमेशा अच्छे विचारों से आती है और अच्छे विचार, अच्छे लोगों के संपर्क से आते हैं. 
  8. जब तक आप ख़ुद पर विश्वास नहीं करते, तब तक आप भगवान पर विश्वास नहीं कर सकते. 
  9. पहले हर अच्छी बात का मज़ाक बनता है, फिर उसका विरोध होता है और फिर उसे स्वीकार कर लिया जाता है. 
  10. विश्व में अधिकांश लोग इसलिये असफल हो जाते हैं, क्योंकि उनमें समय पर साहस का संचार नहीं हो पाता, वे भयभीत हो उठते हैं. 
  11. वस्तुएं बल से छीनी या धन से खरीदी जा सकती हैं, किंतु ज्ञान केवल अध्ययन से ही प्राप्त हो सकता है. 
  12. जब पवित्रता नहीं रहती, तब आध्यात्मिकता विदा हो जाती है.
  13. सब से पहले युवाओं का मज़बूत होना ज़रूरी है, धर्म बाद में आता है.
  14. अपना दिल, दिमाग़ और आत्मा छोटे से छोटे काम में लगा देना यही सफलता का रहस्य है.
  15. धर्म वह वस्तु है, जिससे पशु मनुष्य तक और मनुष्य परमात्मा तक उठ सकता है.
First published: 4 July 2017, 11:13 IST
 
सुधाकर सिंह @sudhakarsingh10

कैच हिंदी टीम, वो अमीर हैं निज़ाम-ए-जहां बनाते हैं, मैं फ़क़ीर हूं मिज़ाज-ए-जहां बदलता हूं...

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