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ICHR: मोहेंजो दारो 'डांसिंग गर्ल' देवी पार्वती हैं

कैच ब्यूरो | Updated on: 26 December 2016, 11:56 IST
(विकीपीडिया)

मोहेंजो दारो की मशहूर डांसिंग गर्ल की प्रतिमा के बारे में दावा किया गया है कि यह देवी पार्वती की है. इंडियन काउंसिल ऑफ हिस्टॉरिकल रिसर्च (आईसीएचआर) के प्रकाशित जर्नल में यह दावा सामने आया है. 

आईसीएचआर की हिंदी पत्रिका इतिहास में प्रकाशित एक शोधपत्र में कहा गया है कि सिंधु घाटी सभ्यता के लोग शिव की पूजा करते थे, इस बात के सबूत मिले हैं. 'वैदिक सभ्यता का पुरातत्व' टाइटल से शोधपत्र प्रकाशित किया गया है, जिसके लेखक ठाकुर प्रसाद वर्मा हैं.  

बीएचयू के रिटायर्ड प्रोफेसर का शोधपत्र

बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी के रिटायर्ड प्रोफेसर ठाकुर प्रसाद वर्मा ने इस रिसर्च पेपर में सिंधु घाटी की वैदिक सभ्यता की पहचान को लेकर केस स्टडी की है. 

दक्षिणपंथी इतिहासकारों के दावे की तरह ठाकुर प्रसाद वर्मा ने दोहराया है कि सिंधु घाटी सभ्यता के लोग शिव की उपासना करते थे. 

2500 ईसा पूर्व की प्रतिकृति!

शोधपत्र के मुताबिक डांसिंग गर्ल की प्रतिमा 2500 बीसी (ईसा पूर्व) की है. यह सिंधु सभ्यता से जुड़ा अपनी तरह का पहला दावा है. 

रिसर्च पेपर के मुताबिक मोहेंजो दारो में खुदाई से मिली कई कलाकृतियां उस जमाने में शिव पूजा की ओर इशारा करती हैं. वर्मा के मुताबिक जानवरों से घिरे योगमुद्रा वाली 'मुहर 420' शिव पूजा का सबसे मजबूत प्रमाण है. मुहर की इस खास बात और पहचान पर लंबे अरसे से बहस हो रही है. 

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पुरातत्व विशेषज्ञ जॉन मार्शल ने 1931 में इसे शिव की प्रतिकृति बताया, लेकिन इतिहासकारों ने इससे अलग अपनी राय जाहिर की. कुछ ने इसे एक महिला की प्रतिकृति कहा. 

सिंधु सभ्यता के बारे में पहली बार ऐसा दावा

ठाकुर प्रसाद वर्मा के मुताबिक खुदाई से मिली एक चर्चित प्रतिकृृति में राजपुरोहित के कपड़े पर तीन पत्तियों वाला पैटर्न इस बात का सबूत है कि सिंधु घाटी सभ्यता के दौर में राजा हिंदू देवता की पूजा करते थे. उनके मुताबिक तीन पत्तियों वाला बिल्वपत्र (बेल का पत्ता) आज भी शिव को पूजा के दौरान चढ़ाया जाता है. 

लेखक डांसिंग गर्ल को पार्वती बतााते हुए दावा करते हैं कि जहां शिव हैं, वहां शक्ति निश्चित होनी चाहिए. हालांकि अब तक हड़प्पा सभ्यता में किसी भी प्रतिकृति या मूर्ति की पहचान पार्वती के तौर पर नहीं हुई है. 

जेएनयू प्रोफेसर ने दावा किया खारिज

अंग्रेजी अखबार इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक दिल्ली की जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर सुप्रिया वर्मा इस दावे को खारिज करती हैं.  अखबार को भेजे गए ईमेल में उन्होंने कहा, "आज तक किसी भी पुरातत्व विशेषज्ञ ने डांसिंग गर्ल की पार्वती या किसी भी देवी से जोड़कर व्याख्या नहीं की है. इसको एक युवती की प्रतिकृति के रूप में हमेशा देखा गया है." 

प्रोफेसर सुप्रिया वर्मा का कहना है, "पुरातत्व विशेषज्ञ जॉान मार्शल ने इसकी मातृदेवी के तौर पर व्याख्या की थी. हालांकि खुदाई में मिली महिलाओं की कुछ और कृतियों को उन्होंने या तो खिलौना या जादू से जोड़कर देखा था. " 

पिछले महीने ही आईसीएचआर के जर्नल इतिहास का ताजा संस्करण प्रकाशित हुआ है. संस्थान के चेयरमैन वाईएस राव के कार्यकाल में जर्नल पहली बार छापा गया है. इतिहासकार सच्चिदानंद सहाय इस जर्नल के मुख्य संपादक हैं.   

First published: 26 December 2016, 11:56 IST
 
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