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हिंदी दिवस पर आधुनिक हिंदी के पिता (भारतेंदु हरिश्चंद्र) का संदेश

स्वामी गोकुलदास | Updated on: 14 September 2016, 7:55 IST
(कैच न्यूज)

इसे संयोग कहें या विडम्‍बना कि आज जब देश भर में हिंदी दिवस का उत्‍सव मनाया जा रहा है, तब ठीक साल भर पहले 'असहिष्‍णुता ' के खिलाफ़ हिंदी साहित्‍य जगत की ओर से पुरस्‍कार वापसी के रूप में उठा सैलाब न केवल ठंडा पड़ चुका है, बल्कि कुछ दूसरे और बेहद गर्हित कारणों से हिंदी जगत के कुएं में दूसरे ही किस्‍म की सरगर्मी देखी जा रही है. सबसे निराशा की बात ये है कि जिन लेखकों ने पिछले साल राजनीतिक विरोध की कार्रवाई में अपने पुस्‍कार लौटाए थे, खुद हिंदी का समाज सोशल मीडिया पर ऐसे लेखकों की घेरेबंदी कर रहा है. इसके अलावा चरित्र हनन के अध्‍यायों से भी इन दिनों आधुनिक हिंदी विमर्श लबालब है.

इस समूचे परिदृश्‍य पर 166 बरस बाद बनारस से एक दर्द भरी पुकार आई है- यह आवाज़ आधुनिक हिंदी के पिता कहे जाने वाले भारतेंदु हरिश्‍चंद्र की है जिनका जन्‍मदिवस पांच दिन पहले नौ सितंबर को बिना किसी हो-हल्ले के बीत चुका हैऔर जिन्‍हें माला पहनाने की सुध भी ली तो अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के कार्यकर्ताओं ने. भारतेंदु ने बरसों बाद हिंदी साहित्‍य के इस चारित्रिक पतन पर अपनी ज़बान खोली है. इसे लिपिबद्ध करने वाले और कोई नहीं, बल्कि खड़ी हिंदी के आदिग्रंथ 'चौरासी वैष्‍णवन की वार्ता' के रचयिता स्‍वामी गोकुलदास हैं. हिंदी दिवस के मौके पर हिंदी लिखने-पढ़ने वालों के लिए उनके आधुनिक पिता का एक अहम संदेश.

अहा... बहुत दिनों बाद जाके प्राण आए हैं इस प्रतिमा में. कुछ तो हवा लगी ज़माने की. सवेरे कुछ विद्यार्थी आए रहे फूल चढ़ाने, माला पहिनाने. मैंने पूछा क्‍या हुआ भाई? कैसे मेरी याद आई? फिर किसी भक्‍त पत्रकार को मोदी पर लिखी किताब पर मेरे नाम का सरकारी पत्रकारिता पुरस्‍कार मिल गया क्‍या? एक नौजवान बोला, 'गुरुजी, आपका जनमदिन है, एक सौ छाछठवां.'

मन तो किया कि एक पड़ाका जड़ दूं, फिर याद आया कि मैं तो ठहरा आधुनिक हिंदी का पिता और वैसे भी, ये लौंडे एबीवीपी के हैं- दिमाग सनका तो साले बनारस के मैदागिन चौराहे पर लगी मेरी इकलौती जर्जर मूर्ति को तोड़-फोड़ देंगे. टोन बदलकर मैंने उनके बीच उपस्थित एक बाला को तड़ते हुए प्‍यार से पूछा, 'और बताओ, हिंदी के क्‍या हाल हैं आजकल? साहित्‍य-फाहित्‍य में क्‍या कुछ चल रहा है? बहुत दिन से कुछ पता नहीं चला. पूरे बनारस को ऐसा क्‍योटो बना दिए हैं सब कि आंख में धूल के सिवा कुछ नहीं टिकता.'

इतिहास खुद को दुहरा रहा है- प्रहसन की तरह

बाला बोलिस, 'गुरुजी, कहां आप हिंदी को आधुनिक बनाने के चक्‍कर में पड़े थे, इधर पूरा साहित्‍य 'चौरासी वैष्‍णवन की वार्ता' बनके रह गया है.'

'क्‍या गोकुलदास का पुनर्जन्‍म हो गया है?'- मैंने जिज्ञासा जतायी. 'वही समझिए, हिंदी में वैष्‍णव भक्‍तों की वर्चुअल वार्ताओं ने कविता का तोता-मैना बना कर रख दिया है. इतिहास खुद को दुहरा रहा है- प्रहसन की तरह.' ऐसा कहते ही उसने मुझे एक आयताकार उपकरण लंबवत पकड़ाया जो दिन के संपूर्ण प्रकाश में भी स्‍वयंप्रकाशित था और उससे रह-रह कर टन-टन की आवाज़ निकल रही थी.

मैंने पूछा ये क्‍या है? समवेत स्‍वर में भक्‍त किशोरों की आवाज़ आई, 'जियो गुरु, जियो. नोटिफिकेशन पढ़ते जाइए, एक पैसा नहीं लगने का.' मेरे लिए तो ये जीने-मरने का ही सवाल बन चुका था. मैंने नीचे से ऊपर उंगलियां फिरानी शुरू कीं.

अब सुबह से शाम होने को है. अनामिका को छोड़ सारी उंगलियां दर्द कर रही हैं लेकिन वार्ता है कि खत्‍म होने का नाम ही नहीं लेती. अरे हां! उंगली से याद आया. लेखक के नाम में किशोर नहीं होना चाहिए, वरना वह आजीवन किशोर ही रह जाता है. दस साल पहले जब उन्‍होंने 'पाप के दिन' नाम से अपना कविता संग्रह निकाला था, तब भी उन्‍हें उम्र के मामले में रियायत दी जा सकती थी. बेदर्द ने जनसत्‍ता की समीक्षा में प्‍यार से उन्‍हें हिंदी साहित्‍य का कनफ्यूशियस तक कह डाला था... लेकिन 2016 में भी 'पाप' जारी है?

इस उम्र में भी, वो भी मैना पांडे के नाम से? और बाद इ वे... ओह, अंग्रेज़ी के लिए माफ़ कीजिएगा- ये तोता ठाकुर कौन है? और एक ठीकठाक प्रतिभाशाली ब्राह्मणकुल बालक ने अपना नाम कौवा कलियुगी क्‍यों रख लिया भला? मुझे तो इस उपकरण पर चमक रहे सारे नाम कनफ्यूशियस ही लग रहे हैं!

दिलीप कुमार टाइप नाम रखने का भी तो शौक होता था लोगों को, कि किसी तरह नाम से ही हिट हो जाएं

कविताएं छद्म नाम से हमारे दौर में भी लिखी जाती थीं. हमेशा लिखी गई हैं, लेकिन तब छद्म नाम पर शंका नहीं होती थी. लोगों को पता होता था कि कौन लिख रहा है. सरकारी नौकरी की मजबूरी हो सकती थी, या कुछ भी. दिलीप कुमार टाइप नाम रखने का भी तो शौक होता था लोगों को, कि किसी तरह नाम से ही हिट हो जाएं. जैसे सपने में एक स्‍त्री से बातचीत करने वाले चोर पुराण के रचयिता. दफ्तर में कुछ कुमार, बाहर कुछ और.

उनके साथ तो और जटिल विडंबना है. हिंदी में वार्ता-साहित्‍य का पुनर्जन्‍म तो अब हुआ है, उनका साहित्‍य तो बरसों से वार्ता के सहारे ही चलता रहा है. उन्‍हीं के यहां चली वार्ता में पता चला कि दोपदी और तोता दोनों कोई वर्मा है. कौवा कहता है कि नहीं, वह कोई पांडे है. अब लाला हो चाहे बिरहमन, अधपके प्रेम की टीस तो सबके मन में है ही. हिंदीवाले देवदास न हुए, बस यही गनीमत है वरना शरतचंद्र के सबसे लिजलिजे पात्र देखने हों तो दिल्‍ली में जमनापार चले जाइए. सब एक जगह अंटे मिल जाएंगे.

वो बाला जो उपकरण पकड़ा कर गई है, उसे फेंका भी नहीं जा रहा और रखा भी नहीं जा रहा. रह-रह कर नए नोटिफिकेशन पर नजर चली जा रही है. मतलब, हद होती है लवंडई की... बताइए, आप प्रेम के प्‍यासे हैं तो क्‍या दूसरे के कुएं में जबरन घुस जाएंगे?

गणपतराव, टोपी संभालो, हवा तेज चलता है

हिंदी में यही हो रहा है. जिसे देखिए, वही गली चलते दूसरे की खिड़की में झांकी मार ले रहा है. अच्‍छा-भला प्रवासी आदमी पार्क में बैठकर युवकों को पुराने किस्‍से सुना रहा था, कि कबीर ने सात बजे के बाद सोमरस के प्रभाव में उसे लिपिबद्ध कर डाला. फिर जो गगनभेदी गंध मची और दे चिट्ठी पर चिट्ठी आना शुरू हुई, कि अस्‍सी के दशक के देल्हियाइट शोहदों की नींद ही उड़ गई. आपसै में मार मच गई. अब एक शराबी को अपनी छवि की चिंता काहे हो, तो वार्ता के वैष्‍णव ने अपनी छवि बचाने के लिए रूसी और वोद्का प्रेमी दोनों को वार्तास्‍थल पर ब्‍लॉक कर दिया.

गड़े मुरदे उखड़ने यहीं बंद हो जाते तो चलता, लेकिन बेरोजगारों की भरी-पूरी फौज से युक्‍त हिंदी की राजधानी हमेशा चुल्‍ल में रहती है. इलाहाबाद में बेरोजगारी के खिलाफ़ आंदोलन चलाते-चलाते अचानक एक युवा की निगाह एक बुजुर्ग की कविता पर पड़ी. उसने वैष्‍णवों के वार्ता-स्‍थल पर उसे चुराया हुआ लिख दिया.

पाटलिपुत्र में शराबबंदी के कारण समय से पहले आ गए शिशिर को मौका हाथ लगा. उसने बंबई के विजय दीनानाथ चौहान का पुराना डायलॉग चुराकर एलान कर डाला, 'गणपतराव, टोपी संभालो, हवा तेज चलता है.' उसके बाद साल भर से ताक में बैठे तमाम मिश्रजाति के वैष्‍णवों ने बेचारे गणपतराव की 'विच-हंटिंग' कर दी.

उसकी ख़ता बस इतनी थी कि उसने पाटलिपुत्र के सम्राट से एक मुलाकात भर की थी. सारे बेवड़ों को लगा कि बिहार को गुजरात बनाने में उसी का हाथ है. पोलैंड की एक कवयित्री के कंधे पर बंदूक रखकर गणपतराव की टोपी सरेराह उछाल दी गई. उसे पुरस्‍कार लौटाए तो अभी साल भर भी नहीं बीता और सब कह रहे हैं कि यह 'प्रतीकात्‍मक' था.

यह दृश्‍य देखकर उसे प्रतिशोध में 'काफलपानी' का भूत याद आ रहा है, 'बुरी आदतों वाले इस भूत को सब जानते हैं/ यहां से गुज़रने वाले जब थककर यहां बैठते हैं/ तो इसके लिए बीड़ी सिगरेट/ और अगर हो तो शराब की कुछ बूंदें भी छोड़ देते हैं/ अगर नहीं छोड़े तो यह नुकसान कर सकता है...'

हो सकता है इस भूत का थोड़ा शाप विरोधियों को कालांतर में लग भी जाए, लेकिन मैं उसके बारे में सोच रहा हूं जिसने पिछले साल चार सितंबर को सबसे पहले पुरस्‍कार लौटाया था. उसका क्‍या हाल हो रहा होगा. एक भी बूंद बची होगी कि नहीं? उसने मुझसे उस दिन कहा था कि देखिएगा, 'वाम हो या दक्षिण या केंद्र, तीनों से इतर जातिवादी लोग इसका फायदा ले उड़ेंगे और हमारे कृत्‍य को स्‍टंट करार देंगे.'

मैं तो सब देख ही रहा हूं, लेकिन तुम क्‍या मछली मार रहे हो अपने गांव के तालाब में, जो दिनदहाड़े घर में सेंध लग गई और तुम्‍हें पता तक नहीं चला? टीवी, प्रोजेक्‍टर, सब लखटकिया सामान चोर ले उड़े, लेकिन कार्ल मार्क्‍स की वाइन भी? जजों के मुहल्ले में ऐसी चोरी? घोर कलियुग. गरीब आदमी के यहां झुग्‍गी-झोंपड़ी में चोरी हो तो समझ में भी आता है. मज़ाक बना रखा है कानून व्‍यवस्‍था का? समाजवाद मुर्दाबाद!

सहारनपुर वाले आचार्य रामपलट दास मौज ले रहे हैं कि 'फेसबुक पर हिन्दी कविता उम्मीद से है, कुछ-न-कुछ ज़रूर होगा

जन्‍मदिवस पर सवेरे जो लड़के फूल चढ़ाने आए थे, बता रहे थे कि चार दिन बाद हिंदी दिवस है. मैंने उन्‍हें चेताया कि ख़बरदार, इस बार जो बैनर बनाया और उस पर लिखा, 'निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल.' सत्‍तर साल से यही नाटक देख रहा हूं. मेरे लिखे का मज़ाक बना दिया है हिंदीवालों ने.

उधर सहारनपुर वाले आचार्य रामपलट दास मौज ले रहे हैं कि 'फेसबुक पर हिन्दी कविता उम्मीद से है, कुछ-न-कुछ ज़रूर होकर रहेगा.' होगा क्‍या? झांट? काफ्का को याद कर के गणपतराव क्‍या गलत कहता है, कि 'उम्मीद तो है, लेकिन वह हमारे लिए नहीं है.' हिंदी के गर्भ से कुछ भी नहीं निकलने वाला, झांट भी नहीं, चाहे दर्द कितना ही गगनभेदी क्‍यों न हो.

अब दिन ढल रहा है. मैंने जादुई उपकरण बंद कर दिया है. लगता है आधुनिकता के नाम पर दो-चार मन धूल आंख में और डाल दी गई है. चढ़ते अंधेरे में इस उपकरण की बेहया रोशनी भांग सा असर देती है. बाइ द वे- ओह सॉरी- इसे लेने वो बाला अब तक नहीं आई? सोच रहा हूं बीच चौराहे किसे दूं? ए भाsssय... कोई है?

(लेख में आए कुछ वर्जित शब्द संदर्भश: आए हैं. यह लेखक के लेखकीय स्वतंत्रता के मद्देनजर छोड़ी गई हैं. संस्थान का इनसे सहमत होना जरूरी नहीं है.)

First published: 14 September 2016, 7:55 IST
 
स्वामी गोकुलदास @catchhindi

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