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अकबर कि क्या बिसात, भारत आर्यावर्त भी हो सकता है जनरल साब!

रंजन क्रास्टा | Updated on: 21 May 2016, 16:13 IST

भारत भीषण गर्मी की चपेट में है. देश में सैकड़ों लोग अब तक गर्मी से अपनी जान गंवा चुके हैं. अकेले तेलंगाना में 300 से अधिक मौतें हुई हैं. देश के 10 राज्यों और 254 जिलों में रह रही भारत की लगभग एक चौथाई जनसंख्या यानि लगभग 33 करोड़ लोग सूखे की चपेट में हैं.

लेकिन अगर विदेश राज्य मंत्री वीके सिंह को गंभीरता से लिया जाये, तो देश इस समय जिस गंभीर समस्या से गुजर रहा है, वह है कि इतिहास का इस्तेमाल दिल्ली की सड़कों पर कैसे किया जाय. अपनी इस सड़कछाप चिंता से त्रस्त वीके सिंह ने शहरी विकास मंत्री एम वेंकैया नायडू को पत्र लिखकर अपनी समस्या से अवगत कराया है. चिंता यह कि अकबर रोड का नाम बदल कर महाराणा प्रताप मार्ग किया जाना चाहिए क्योंकि महाराणा प्रताप को वह ख्याति नहीं मिली, जो उनको मिलनी चाहिए था.

शायद दिल्ली की भीषण गर्मी जनरल के सिर में चढ़ गयी है, फिर भी वे डटे हुए हैं. सिंह की ओर से नायडू को लिखे गये पत्र से इस धारणा को ही बल मिलता है कि गर्मी में उनका दिमाग गड़बड़ा गया है, क्योंकि सड़क का नाम बदलने का मसला नायडू के मंत्रालय के तहत नहीं, बल्कि नई दिल्ली महानगर पालिका (एनडीएमसी) के अधीन आता है.

एक साल पहले अविश्वसनीय रूप से औरंगजेब का नाम एपीजे अब्दुल कलाम के नाम से मामूली अंतर से पिछड़ गया था

अनगिनत चाटुकारों से घिरे रहने वाले मंत्रीजी को ही पता होगा कि उन्होंने ऐसा क्यों किया. क्योंकि न केवल वेंकैया नायडू ने इस बयान से केंद्र सरकार को अलग कर लिया है, बल्कि एनडीएमसी को भी मुगल शासकों के नाम वाली सड़कों में बदलाव करने से परहेज किया. एक साल पहले अविश्वसनीय रूप से औरंगजेब रोड का नाम बदल कर एपीजे अब्दुल कलाम रोड कर दिया था.

इससे रातोंरात दिल्ली की बिजली और पानी की दिक्कतें खत्म हो गईं, प्रदूषण खत्म हो गया, ट्रैफिक जाम की स्थिति में सुधार हो गया और गरीबों की संख्या घट गयी, पता नहीं! काश ऐसा होता. लेकिन सच यह है कि इनमें से कुछ भी नहीं हुआ, क्योंकि वास्तविक प्रशासन के मामलों को देखने के बजाय एनडीएमसी ने अपना वक्त बाकी सड़कों के नाम पर माथापच्ची में बरबाद करने का फैसला कर लिया.

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गुरुग्राम की ही तरह, भले ही आप इसका नाम स्विटजरलैंड रख दीजिए, लेकिन क्या इससे उस शहर की अव्यवस्था दूर हो जायेगी? बिल्कुल नहीं. बेहतर प्रशासन से ऐसा संभव होगा, नाम बदल देने भर से नहीं. मैंने खुद के साथ एक प्रयोग किया है, जिससे यह बात साबित होती है. दो साल पहले, संत रामपाल की गिरफ्तारी के बाद मैंने फेसबुक पर अपना नाम बदल कर संत रंजन कर लिया. लेकिन मेरे अंदर कई बदलाव नहीं हुआ. जो लोग मुझे नहीं जानते थे, उन्होंने कुछ बार मुझे संत कह कर पुकारा, लेकिन कमोबेश मुझे रंजन ही कहा जाता रहा.

मैं कल्पना कर रहा हूं कि 50 सालों में शायद कुछ और लोग मुझे संत के रूप में जानने लगें लेकिन क्या इससे मेरे जीवन की गुणवत्ता पर असर पड़ेगा? शायद नहीं. लेकिन लगता है कि वीके सिंह चीजों को इस तरीके से नहीं देखते. उनके विचार से महाराणा प्रताप को अधिक ख्याति मिलनी चाहिए और अकबर को कम.

आपको पता है कि किसको इस पूरे बवाल से कोई मतलब नहीं है? यही दोनों. यानी अकबर औऱ राणा प्रताप. क्योंकि ये दोनों लगभग 500 साल पहले ही दुनिया से विदा हो चुके हैं.

एक सड़क के नाम के माध्यम से याद किए जाने से चीजें कैसे बेहतर हो जायेंगी?

हां, शायद महाराणा प्रताप को अधिक ख्याति मिलनी चाहिए, क्योंकि वह मुगलों के प्रभुत्व को रोकने में कामयाब रहे थे. लेकिन एक सड़क के नाम के माध्यम से याद किए जाने से चीजें कैसे बेहतर हो जायेंगी? और इससे भी अहम सवाल यह है कि इससे किस तरह की जागरुकता उत्पन्न होगी? मैं हर रोज बाबा गंगनाथ मार्ग से गुजरता हूं. क्या मुझे पता है कि बाबा गंगनाथ कौन थे? या हमारे ऑफिस से कुछ किलोममीटर की दूरी पर चौधरी झंडू सिंह मार्ग है. किसी को नहीं पता वो कौन हैं. बिल्कुल नहीं.

दरअसल इस लेख को लिखने के लिए मैंने कोशिश कर कुछ सवालों के जवाब तलाशने की कोशिश की. आपको पता है मुझे क्या मिला? कुछ नहीं. अगर वीके सिंह, महाराणा प्रताप की विरासत के बारे में वाकई चिंतित हैं, तो उन्हें इस बात के लिए लॉबीइंग करनी चाहिए कि स्कूलों के पाठ्यक्रम बच्चों को बेहतर शिक्षा दें. अगर यह कदम बच्चों को हमारे अतीत के बारे में जोश और उत्साह नहीं भर सकता तो कम से राणा प्रताप के बारे में फैलायी गयी मनगढ़ंत बातों को कुछ तथाकथित प्रतिष्ठित मीडिया हाउस द्वारा तथ्य के तौर पर पेश करने से तो बचाएगा.

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अब जरा इंडिया टुडे की ‘सामान्य ज्ञान’ श्रेणी के तहत पेश की गई इस कहानी पर नजर डालें- “महाराणा प्रताप भारत के अब तक के सबसे महान योद्धाओं में से एक थे. उनकी लंबाई सात फीट पांच इंच थी. वह 80 किलोग्राम का भाला लेकर चलते थे, उनकी दो तलवारों का कुल वजन लगभग 20 किलोग्राम था. इसके अलावा वह 72 किलोग्राम का कवच भी धारण करते थे.”

यह वास्तविक व्यक्ति नहीं हो सकता. यह तो गेम ऑफ थ्रोन्स के सर ग्रेगर द माउंटेन हैं. लेकिन यह एक अलग मसला है जिस पर असल में विचार करने की जरूरत है. क्यों न किसी नई चीज का नाम राणा प्रताप के नाम पर रखा जाये? यह काम अकबर की कीमत पर ही क्यों किया जाये?

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जब औरंगजेब रोड का नाम पूर्व राष्ट्रपति कलाम के नाम पर रखा गया, तो दो वजहों से इस पर बड़ा बखेड़ा खड़ा नहीं हुआ. पहली बात, कलाम को समाज के सभी तबकों का प्यार और सम्मान मिलता था. दूसरी बात, यहां एक मुस्लिम की जगह दूसरे मुस्लिम ने ली थी (हो सकता है कि यह तर्क अजीब हो). तीसरी बात, हाल ही में उनका देहान्त हुआ था और ऐसे में इस बात पर आपत्ति जताने से शायद भारतीय परंपरा में मृतक के प्रति असम्मान दिखाना भी माना जाता.

इस कदम से ऐसा लगता है जैसे मुगलों के साथ भारत के समृद्ध और निर्विवाद संबंध को जबरदस्ती खत्म करने की कोशिश की जा रही है. देश में नई सड़कें भी बनायी गयी हैं जिनको मनचाहा नाम दिया जा सकता है. लेकिन अगर उनके (प्रताप के) नाम पर सड़क का नाम ही रखना है और दिल्ली में ही रखना है, तो मैं आपसे एक सवाल पूछना चाहता हूं जरनैल साब, कॉपरनिकस ने इस देश के लिए क्या किया था?

First published: 21 May 2016, 16:13 IST
 
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