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तीन तलाक़: सरकार के शपथपत्र से सरगर्म हुई मुस्लिम राजनीति

फ़ैसल फ़रीद | Updated on: 9 October 2016, 7:44 IST
QUICK PILL
  • केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में हलफ़नामा देकर तीन तलाक़ का जिन्न बोतल से दोबारा निकाल दिया है. हलफ़नामे में कहा गया है कि भारतीय मुस्लिम समाज में चल रही तीन तलाक़ की व्यवस्था महिला अधिकारों के खिलाफ है लिहाजा इसे ख़त्म किया जाना चाहिए.
  • इस्लामिक क़ानून की भारत में सर्वोच्च संस्था ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने सरकार के शपथपत्र का पुरज़ोर विरोध करते हुए इसे मुसलमानों के निजी मसाइल पर हमला बताया है.

केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में हलफ़नामा देकर तीन तलाक़ का जिन्न बोतल से दोबारा निकाल दिया है. हलफ़नामे में कहा गया है कि भारतीय मुस्लिम समाज में चल रही तीन तलाक़ की व्यवस्था महिला अधिकारों के खिलाफ है लिहाजा इसे ख़त्म किया जाना चाहिए. वहीं उलेमाओं और इस्लाम के विद्वानों ने इसे मज़हबी मामलों में दख़लअंदाज़ी मानते हुए अपनी भौंहे चढ़ा ली हैं.

इस्लामिक क़ानून की भारत में सर्वोच्च संस्था ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने सरकार के शपथपत्र का पुरज़ोर विरोध करते हुए इसे मुसलमानों के निजी मसाइल पर हमला बताया है.

बोर्ड की कार्यकारी समिति के सदस्य और एशबाग़ ईदगाह के इमाम मौलाना रशीद फिरंगी महली कहते हैं, 'यह मुसलमानों पर सीधा हमला है और हम संविधान के दायरे में रहते हुए इसकी पुरज़ोर मुख़ालिफ़त करेंगे. जब कुछ राज्यों में जन जातियों के लिए संविधान में संशोधन हो सकता है तो मुसलमानों का अपना पर्सनल लॉ क्यों नहीं हो सकता?'

फिरंगी महली के मुताबिक़ सरकार ने यह हलफ़नामा वोट बैंक की राजनीति को ध्यान में रखते हुए दाख़िल किया है. उन्होंने कहा, 'इस्लाम में औरतों की बराबरी पर गलत तस्वीर पेश की जा रही है. हमारा मज़हब मर्द और औरत, दोनों को बराबर का हक़ देता है. अगर सरकार समान नागरिक संहिता का मुद्दा उठाना चाहती है, तो साफ़-साफ़ बोले. और फिर उन हिंदू औरतों का क्या होगा जो पिछले 10 साल से अदालत में तलाक़ का अधिकार हासिल करने के लिए संघर्ष कर रही हैं?'

फिरंगी महली के मुताबिक़ सरकार ने यह हलफ़नामा वोट बैंक की राजनीति को ध्यान में रखते हुए दाख़िल किया है

जिन शायरा बानो के केस को ध्यान में रखते हुए यह हलफ़नामा दाख़िल किया गया है, उनके पति उनसे दहेज की मांग करते थे. उनकी पिटाई होती थी और गर्भपात के लिए मजबूर किया गया था. फिर इन सारे अपराधों के लिए उनके पति पर मुक़दमा क्यों नहीं चल रहा है. सिर्फ ट्रिपल तलाक़ का मुद्दा क्यों?

बोर्ड के कानूनी विशेषज्ञ और कार्यकारी सदस्य ज़फ़रयाब जिलानी का भी यही मानना है कि ट्रिपल तलाक़ के बहाने बीजेपी अपने चिर-परिचित अंदाज़ में राजनीति कर रही है. उन्होंने कहा, 'ट्रिपल तलाक़ बीजेपी के मैनिफेस्टो में है और इस मुद्दे पर पार्टी के स्टैंड से मुझे ज़रा भी हैरानी नहीं हुई क्योंकि इससे उनका असली चेहरा उजागर भर हुआ है. उनका असली मक़सद हमारे पर्सनल लॉ में धीरे-धीरे घुसपैठ कर लेना है.'

बहरहाल जहां मुस्लिम समाज के मर्दों को इस हलफ़नामे में साजिश नज़र आ रही है, वहीं मुसलमान औरतों ने दिल खोलकर इसका स्वागत किया है. कोलकाता में रहने वाली सामाजिक कार्यकर्ता और लेखिका सायरा शाह हलीम कहती हैं, 'हम सरकार की इस पहल का स्वागत करते हैं. पाकिस्तान समेत बहुत सारे मुल्क़ों में इस प्रथा पर पाबंदी है. ऐसे में हिन्दुस्तान में इसके बने रहने का कोई मतलब नहीं है. यह प्रथा मुस्लिम महिलाओं के बराबरी के अधिकार को कुंद करती है.'

हलीम पर पलटवार करते हुए फिरंगी महली कहते हैं कि तीन तलाक़ पर अन्य मुल्क़ों में पाबंदी की जानकारी कोरी बकवास और प्रोपगैंडा है. एक बात यह भी साफ है कि इस बार केंद्र में एनडीए की सरकार है जो इसके खिलाफ है.

वहीं भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन की संस्थापक ज़किया सोमन सीधे क़ुरआन और हदीसे हवाले अपनी बात कहती हैं. कैच न्यूज़ से उन्होंने कहा, 'क़ुरआन में कहीं भी ट्रिपल तलाक़ का ज़िक्र नहीं है, फ़िर यह व्यवस्था कहां से और कैसे चल रही है? इसके जवाब में फिरंगी महली कहते हैं कि हमारा इस्लामिक क़ानून क़ुरआन और हदीस पर आधारित है. क़ुरआन हमें नमाज़ पढ़ने के लिए कहती है और हदीस बताती है कि नमाज़ कब और कैसे पढ़ी जानी है'.

मुसलमान औरतों ने दिल खोलकर इसका स्वागत किया है, वे पूछ रही हैं यह ट्रिपल तलाक़ कहां से आया?

1985 में सुप्रीम कोर्ट ने इसी तरह के मामले में फ़ैसला शाहबानो के हक़ में किया था लेकिन बाद में उसे पलट दिया गया था. इशारे-इशारे में फिरंगी महली साफ़ करते हैं कि मुसलमान इसके ख़िलाफ़ किसी भी सीमा तक जा सकते हैं.

अलीगढ़ में एक प्रकाशन हाउस चला रहीं निख़त परवीन भी केंद्र सरकार के हलफ़नामे से ख़ुश हैं. वह कहती हैं, 'हम सरकार के इस फैसले का स्वागत करते हैं. कोई भी व्यक्ति महज़ तीन बार तलाक़ बोलकर शादी की तमाम जवाबदेहियों से मुक्त नहीं हो सकता है.'

तीन तलाक़ की इस व्यवस्था के ख़िलाफ़ महिलाओं के साथ शिया मुसलमान भी खड़े हो गए हैं. ऑल इंडिया शिया पर्सनल लॉ बोर्ड ने अभी बीते सितंबर में लखनऊ में कार्यकारी सदस्यों के साथ एक मीटिंग की थी. यहां ध्वनिमत से तीन तलाक़ के विरुद्ध प्रस्ताव पास किया गया. बोर्ड के महासचिव मौलाना यासूब अब्बास कहते हैं, 'हम भी इस मामले में सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाएंगे ताकि हमारा पक्ष भी सुना जाए.'

इस हलफ़नामे ने तीन तलाक़ का मुद्दा एक बार फिर गर्म कर दिया है, साथ ही मुसलमानों की राजनीति भी. आने वाले दिनों में कोई हैरानी नहीं होनी चाहिए अगर मुसलमानों की राजनीति में सरगर्मी बढ़ जाए क्योंकि पर्सनल लॉ बोर्ड इस मुद्दे को मुसलमानों के बीच ले जाने का फैसला कर चुका है.

First published: 9 October 2016, 7:44 IST
 
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