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आज़ादी के बाद पहली बार टुंडे के यहां नहीं मिले 'बड़े कबाब'

सुधाकर सिंह | Updated on: 24 March 2017, 9:18 IST
(फेसबुक)

लखनऊ में करीब सवा सौ साल पुरानी टुंडे कबाबी की मशहूर दुकान पर भी इन दिनों बूचड़खानों पर कार्रवाई का असर देखा जा रहा है. दरअसल बीजेपी ने अपने चुनावी घोषणापत्र में अवैध बूचड़खानों को बंद करने का वादा किया था. योगी आदित्यनाथ ने 19 मार्च को सूबे की सत्ता संभाली. इसके बाद से अवैध बूचड़खानों पर जगह-जगह गाज गिर रही है. 

अंग्रेज़ी अख़बार इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक लखनऊ में नौ अवैध बूचड़खानों को बंद किया जा चुका है. लखनऊ म्यूनिसिपल कॉरपोरेशन के चीफ वेटनरी ऑफिसर एके राव ने अंग्रेज़ी अख़ाबर को बताया कि सूबे की राजधानी में मांस बेचने वाली तकरीबन 250 अवैध दुकानें हैं. ये दुकानें बिना लाइसेंस के चल रही थीं. ज़ाहिर है ऐसे में मांस की सप्लाई पर बुरा असर पड़ा है.  

इसकी सबसे बड़ी नज़ीर टुंडे कबाबी की दुकान पर देखने को मिल रही है. बुधवार को पूरे दिन चौक के अकबरी गेट इलाके में स्थित टुंडे की दुकान बंद रही. दरअसल इस दुकान पर बड़े (भैंसे) का कबाब मिलता है. बाकायदा इसका लाइसेंस भी है. शहर में स्थित यह टुंडे का इकलौता आउटलेट है, जहां गोश्त के बजाए केवल कबाब-पराठा ही मिलता है. लेकिन शहर में गोश्त की किल्लत के चलते बुधवार को शटर गिरे रहे. हालांकि अमीनाबाद स्थित आउटलेट खुला रहा, क्योंकि यहां चिकन और मटन का गोश्त मिलता है.

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चिकन गलावटी कबाब चखिए

लखनऊ में टुंडे कबाबी का कारोबार संभालने वाले मोहम्मद रिज़वान से कैच ने इस मसले पर बातचीत की. इस दौरान उन्होंने यह माना कि 110 साल में पहली बार चौक स्थित दुकान दिनभर बंद रही. हालांकि रिज़वान ने ये भी कहा कि इससे उनकी बिक्री में कोई दिक्कत नहीं आई है. 

मोहम्मद रिज़वान ने बताया, "पूरे लखनऊ में अभी बूचड़खानों पर कार्रवाई के बाद भैंसे का मीट मुहैया नहीं हो पा रहा है. हालांकि इसकी जगह हमने चिकन गलावटी कबाब का वैकल्पिक इंतज़ाम कर लिया है. लोग शौक से उसे खा रहे हैं. थोड़ा महंगा है, लेकन हमें तो फ़ायदा है." 

बातचीत के दौरान रिज़वान ने कैच को बताया, "हमारे परदादा हाज़ी मुराद अली ने टुंडे कबाबी की नींव रखी थी. इस वक्त मैं अपने परिवार की चौथी पीढ़ी की नुमाइंदगी कर रहा हूं. मटन मिल रहा है, चिकन मिल रहा है. केवल चौक की दुकान पर बुधवार को बड़े (भैंसे का मांस) की वजह से दिक्कत आ रही थी."   

1975 में रोज़ 40 भैंसे कटते थे...

मोहम्मद रिज़वान ने कैच से बातचीत में अपने पुराने दिनों का ज़िक्र करते हुए कहा, "मेरे अब्बाजान हाज़ी रईस के दौर में रोज़ाना 40 भैंसें काटने की परमिशन थी. यह कोई 1975 के आस-पास की बात है. उस वक़्त अच्छी तरीक़े से चेक किया जाता था. काटने वाला जानवर तंदुरुस्त है कि नहीं है. उस पर सील लगती थी." 

लखनऊ शहर में टुंडे कबाबी के कई आउटलेट हैं. मोहम्मद रिज़वान ने कैच को बताया, "चौक के अकबरी गेट और अमीनाबाद के अलावा चुंगी में एक, रहीमनगर में एक, दो ब्रांच आलमबाग में और एक सहारा गंज में भी चल रही है." 

लखनऊ में 1905 में स्थापित टुंडे कबाबी की दुकान गलावटी कबाब के लिए पूरी दुनिया में अलग पहचान बना चुकी है. हाजी मुराद अली ने भोपाल से लखनऊ आकर इस कबाब को बनाना शुरू किया था. वे भोपाल के नवाब के बावर्ची थे. उनका एक हाथ कटा (टुंडे) था, इसलिए बोलचाल में उन्‍हें टुंडा कहा जाने लगा. इसी वजह से उनके कबाब को टुंडे कबाब का अनूठा नाम मिल गया.

कुछ साल पहले टुंडे कबाबी की प्रोपराइटरशिप को लेकर मामला कोर्ट तक पहुंच गया था. कारोबार को संभालने वाले मोहम्मद उस्मान के ख़िलाफ़ उनके ममेरे भाई मोहम्मद मुस्लिम ने मुकदमा भी दर्ज कराया था.

First published: 23 March 2017, 16:38 IST
 
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