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जब फांसी के फंदे और भगत सिंह के बीच तीन घंटे का फ़ासला था...

पत्रिका ब्यूरो | Updated on: 23 March 2017, 11:27 IST
Bhagat Singh

आज पूरे देश में शहीद दिवस मनाया जा रहा है. 23 मार्च के दिन देश के शूरवीर, निडर सपूत भगत सिंह को अंग्रेजों ने फांसी दे दी थी. क्रांतिकारी भगत सिंह की शहादत दिवस को देश शहीद दिवस के रूप में मनाता है. 23 मार्च 1931 शाम के 7:30 बजे अंग्रेजी हुकूमत ने छल से भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी दे दी थी. अंग्रेजों ने भगत सिंह को तो मार दिया लेकिन आजादी की अलख करोड़ों हिन्दुस्तानियों के दिलों में जगा गए.

मौत को सामने होने के बावजूद चेहरे पर न कोई शिकन न कोई डर. फांसी के दो घंटे पहले भगत सिंह के वकील मेहता को उनसे मिलने की इजाज़त मिल गई. उन्होंने अपने मुवक्किल की आखिरी इच्छा जानने की दरखास्त की थी और उसे मान लिया गया. भगत सिंह अपनी कोठरी में ऐसे आगे-पीछे घूम रहे थे जैसे कि पिंजरे में कोई शेर घूम रहा हो.

उन्होंने मेहता का मुस्कुराहट के साथ स्वागत किया और उनसे पूछा कि क्या वे उनके लिए 'दि रेवोल्यूशनरी लेनिन' नाम की किताब लाए हैं. भगत सिंह ने मेहता से इस किताब को लाने का अनुरोध किया था. जब मेहता ने उन्हें किताब दी, वे बहुत खुश हुए और तुरंत पढ़ना शुरू कर दिया, जैसा कि उन्हें मालूम था कि उनके पास वक्त ज्यादा नहीं है. मेहता ने उनसे पूछा कि क्या वे देश को कोई संदेश देना चाहेंगे, अपनी निगाहें किताब से बिना हटाए भगत सिंह ने कहा, "मेरे दो नारे उन तक पहुंचाएं...इंकलाब जिंदाबाद, साम्राज्यवाद मुर्दाबाद." मेहता ने भगत सिंह से पूछा, "आज तुम कैसे हो?" उन्होंने कहा, "हमेशा की तरह खुश हूं." मेहता ने फिर पूछा, "तुम्हें किसी चीज की इच्छा है?" भगत सिंह ने कहा, "हां मैं दुबारा इस देश में पैदा होना चाहता हूं ताकि इसकी सेवा कर सकूं." भगत ने कहा, "पंडित नेहरू और सुभाष चंद्र बोस ने जो रुचि उनके मुकदमे में दिखाई उसके लिए दोनों का धन्यवाद करें."

मेहता के जाने के तुरंत बाद अधिकारियों ने भगत सिंह और उनके साथियों को बताया कि उनके फांसी का समय 11 घंटा घटाकर कल सुबह छह बजे की बजाए आज शाम सात बजे कर दिया गया है. भगत सिंह ने मुश्किल से किताब के कुछ पन्ने ही पढ़े थे. उन्होंने कहा, "क्या आप मुझे एक अध्याय पढ़ने का भी वक्त नहीं देंगे?" बदले में अधिकारी ने उनसे फांसी के तख्ते की तरफ चलने को कहा. एक-एक करके तीनों का वजन किया गया. फिर वे नहाए और कपड़े पहने.

वार्डन चतर सिंह ने भगत सिंह के कान में कहा, "वाहे गुरु से प्रार्थना कर लें." वे हंसे और कहा, "मैंने पूरी जिंदगी में भगवान को कभी याद नहीं किया, बल्कि दुखों और गरीबों की वजह से कोसता जरूर हूं. अगर अब मैं उनसे माफी मांगूगा तो वे कहेंगे कि यह डरपोक है जो माफी चाहता है क्योंकि इसका अंत करीब आ गया है." तीनों के हाथ बंधे थे और वे संतरियों के पीछे एक-दूसरे से ठिठोली करते हुए सूली की तरफ बढ़ रहे थे. उन्होंने फिर गाना शुरू कर दिया-

"कभी वो दिन भी आएगा कि जब आजाद हम होंगे, ये अपनी ही जमीं होगी ये अपना आसमां होगा.

शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले, वतन पर मिटने वालों का बाकी यही नाम-ओ-निशां होगा."

जेल की घड़ी में साढ़े छह बज रहे थे. कैदियों ने थोड़ी दूरी पर, भारी जूतों की आवाज और जाने-पहचाने गीत, 'सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है' की आवाज सुनी. उन्होंने एक और गीत गाना शुरू कर दिया, 'माई रंग दे मेरा बसंती चोला' और इसके बाद वहां 'इंकलाब जिंदाबाद' और 'हिंदुस्तान आजाद हो' के नारे लगने लगे.

सभी कैदी भी जोर-जोर से नारे लगाने लगे. तीनों को फांसी के तख्ते तक ले जाया गया, भगत सिंह बीच में थे. तीनों से आखिरी इच्छा पूछी गई तो भगत सिंह ने कहा वे आखिरी बार दोनों साथियों से गले लगना चाहते हैं और ऐसा ही हुआ.  फिर तीनों ने रस्सी को चूमा और अपने गले में खुद फांसी का फंदा पहन लिया. 

First published: 23 March 2017, 11:27 IST
 
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