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बीइंग द अदर: भारत में मुसलमानोंं के 'परायेपन' की यात्रा

लमट र हसन | Updated on: 22 July 2016, 7:31 IST
QUICK PILL
  • ख्यातिनाम पत्रकार नकवी का जन्म भारत की आजादी के लगभग एक दशक बाद हुआ और उनकी नजर में भारत में मुसलमान उसी तरह पराये हैं, जैसे कि एक फिलीस्तीनी विद्वान ने कहा है- \'पश्चिम के लिए पूर्व\'.
  • कहानियों के जरिये नकवी एक ऐसा अतीत गढ़ते हैं, जिसमें हिन्दू-मुसलमानों के शांति से एक साथ रहने और एक दूसरे के सांस्कृतिक व सामुदायिक आदान-प्रदान के किस्से सुनाए गए हैं.

पिछले छह दशक से सईद नकवी परायेपन का दर्द झेल रहे हैं. वे इस खयाल से इस कदर उक्ता गए कि इस पर एक किताब लिख डाली. किताब में उन्होंने अब तक उनके साथ हुई बेवफाई या यूं कहें कि लोगों द्वारा किए गए दोहरे बर्ताव का खाका खींचा है. 

उनके मुताबिक उनके साथ यह बर्ताव केवल लोगों और सरकार ने ही नहीं किया बल्कि उनके अपनों ने भी उनके साथ यही सब फरेब किया है. उनके घनिष्ठ मित्रों ने उनके साथ वही सब व्यवहार किया है, जैसा बाकी दुनिया ने. इसी सबके चलते उन्हें एहसास हुआ कि हर कोई उन्हें पराया समझता है.

उनकी कहानी- 'बीइंग द अदर: द मुस्लिम्स इन इंडिया' को अलिफ बुक्स ने प्रकाशित किया है. यह कहानी किसी भी मुसलमान की हो सकती है, यह उनकी कहानी है, जिन्हें लगातार पिछड़े होने का एहसास करवाया गया और कभी मुख्य धारा में शामिल नहीं किया गया. 

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अपनाए जाने की उनकी लालसा कभी पूरी हुई ही नहीं हुई. उल्टे उन्हें धमकियां झेलनी पड़ी या फिर अपनेपन का दिखावा करना पड़ा.

नकवी को पराया होना शायद कुछ ज्यादा अखरा क्योंकि उनकी परवरिश अवध में हुई है, जहां शायद ही कभी हिन्दू और मुस्लिम के बीच भेद किया गया हो. यहां आपसी सौहार्द ही जिंदगी जीने का तरीका माना जाता है. 

दूसरा, चूंकि नकवी जाहिर तौर पर आधुनिक मुसलमान हैं, इसलिए उनके अपने समुदाय में ही लोग उन्हें आसानी से 'पराया' मान लेते हैं. वे खुद को इस दुनिया में लापता पाते हैं और अपने व अपने जैसे ही अन्य लोगों के लिए फिर से जमीन तलाश रहे हैं.

मुसलमानों का पराया होना

ख्यातिनाम पत्रकार नकवी का जन्म भारत की आजादी के लगभग एक दशक बाद हुआ और उनकी नजर में पराये का मतलब है, 'विशेष तरह से ही अलग होना या अपने वजूद से ठीक विपरीत.' उनके अनुसार भारत में मुसलमान उसी तरह पराये हैं, जैसे कि एक फिलीस्तीनी विद्वान ने कहा है- 'पश्चिम के लिए पूर्व'.

इस चश्मे से देखें तो लगता है कि हां यहां लोग भारत की जनसंख्या के लगभग 14 प्रतिशत हिस्से (मुस्लिम समुदाय) को पराया, कुछ प्रवासी जैसा, पिछड़ा, असभ्य और यहां तक कि खतरनाक भी मानते है.

नकवी को पहली बार परायेपन का एहसास तब हुआ जब वे 1989 में अयोध्या में विवादित बाबरी मस्जिद स्थल पर शिलान्यास कार्यक्रम देखने गए थे. "हालांकि बाबरी मस्जिद अभी तक खड़ी थी लेकिन मैं जानता था कि एक वक्त आएगा जब यह गिरा दी जाएगी. और जैसे ही यह ढांचा गिरा धर्मनिरपेक्षता और विरोधों का ढकोसला बेनकाब हो गया जो हमारे देश की राजनीति और अल्पसंख्यकों खास कर मुसलमानों के प्रति आम रवैया है.”

उस वक्त एक भारतीय मुसलमान होने के नाते मैंने खुद को ठगा सा महसूस किया, मैंने इस देश को प्यार किया...

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नकवी ने किताब की भूमिका में लिखा है- "उस वक्त एक भारतीय मुसलमान होने के नाते मैंने खुद को ठगा सा महसूस किया. मैंने इस देश को प्यार किया और अपना सब कुछ दिया. मुझे गुस्सा भी आया क्योंकि यह सब कुछ मुझे नागवार गुजरा था.”

विभाजन के बाद हिन्दू और मुसलमानों के बीच बढ़ता वैमनस्य नकवी के दिल में गहरे पैठ गया. वे कहते हैं 1990 तक मुसलमानों के साथ यह परायापन या अलगाव अपने चरम पर था, जो कि खतरनाक स्थिति थी. 6 दिसम्बर 1992 में बाबरी मस्जिद गिराए जाने के बाद हालात बेकाबू हो गए.

वे इसके लिए भाजपा और कांग्रेस दोनों को जिम्मेदार मानते हैं. साथ ही धर्मनिरपेक्ष शब्द का इस्तेमाल अति सावधानी से करते हैं क्योंकि उन्होंने देखा है कि इस शब्द का बेतरह दुरूपयोग हुआ है. वे लिखते हैं- "आजादी के बाद के दशकों में जब कांग्रेस का राज था, तब भी राष्ट्र की आबो-हवा कमोबेश भगवा रंग में ही रंगी थी. याद कीजिए उस वक्त दूर-दूर तक नरेंद्र मोदी का कहीं नामो निशान नहीं था और दिल्ली में कांग्रेस की सरकार थी.”

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9/11 के बाद हिन्दू-मुस्लिमों के बीच हजारों साल से चली आ रही सहिष्णुता और सद्भाव धूमिल होती नजर आने लगी. नकवी लिखते हैं- ''मैं यह नहीं कह रहा कि साम्यवाद कभी था ही नहीं, पर अब इसके पहिये लग गए हैं.”

अतीत में खोए नकवी

कहानियों के जरिये नकवी एक ऐसा अतीत गढ़ते हैं, जिसमें हिन्दू-मुसलमानों के शांति से एक साथ रहने और एक दूसरे के सांस्कृतिक व सामुदायिक आदान-प्रदान के किस्से सुनाए गए हैं.

एक समय था जब ईद का त्यौहार तब तक अधूरा लगता था जब तक काली अचकन और गांधी टोपी पहने बाबू महावीर प्रसाद ईद मनाने नहीं आ जाते और सेवई खाकर एक रूपए की ईदी नहीं दे देते. नकवी की मां अपने पति के करीबी दोस्तों को राखी भेजती थी. मोहसिन ककोरवी ने भगवान कृष्ण की आराधना में दोहे लिखे. 

जब भारत की आजादी के बाद उनकी नानी-अम्मी की मुश्किलें कम हो गईं. अपने इंतकाल के दिन तक नानी अम्मी को यह समझने में काफी मुश्किल थी कि पासपोर्ट क्या होता है. वे सिर्फ यह जानती थीं कि एक जगह से दूसरी जगह जाने के लिए केवल रेलवे टिकट की जरूरत होती है.

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दूसरा किस्सा है- जब नानी अम्मी अपनी दो लड़कियों की शादी लाहौर में करने को तैयार हो जाती हैं क्योंकि यह बॉम्बे और हैदराबाद के पास है और इसलिए भी कि उनका मानना है भारत-पाक के बीच सीमा रेखा किसी अंग्रेज ने खींची है जो कुछ सप्ताह बाद ही हट जाएगी. बस यह थोड़े दिन की परेशानी है.

नकवी कहते हैं, "उन्हें ठीक से याद नहीं है लेकिन उनकी परी कथाओं वाली जिंदगी शुरू होने से पहले ही खत्म हो गई. उन्हें मुसलमान के तौर पर पहचाना जाने लगा. मतलब पराया.”

नकवी को सबसे ज्यादा बुरा तब लगा जब 1990 में उनके एक साथी सम्पादक विनोद मेहता ने एक पत्रिका में 'मुस्लिम नजरिये से' एक कॉलम लिखने के लिए कहा. मेहता उनके साथ लखनऊ में स्कूल में पढ़ चुके थे और अब जबकि वे सम्पादक बन गए तब वे मुझे 'अलग' मान कर काम करवा रहे थे. 

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मुझे लगता है एक प्रकार से वे उसी परम्परा का अनुसरण कर रहे थे, जो आजादी के बाद आम हो चुकी थी. देश में धर्मनिरपेक्षता और समानता का ढकोसला रचने के लिए कोई न कोई 'दूसरा' चाहिए था. हालांकि हम सब जो लोग इस 'दूसरे' की श्रेणी में आते हैं वे अल्पसंख्यक हैं.

साबित करनी पड़ती है देशभक्ति

नकवी कहते हैं एक दिन भी ऐसा नहीं गुजरता जब कोई भारतीय मुस्लिम की देश के प्रति वफादारी पर शक न करता हो. जैसे कि हमें रोज यह कहा जाता हो कि हम अपनी देशभक्ति साबित करने के लिए सुपर देशभक्त बन कर दिखाएं. यहां तक कि बॉलीवुड भी इससे अछूता नहीं है, पिछले साल 2015 में अभिनेता शाहरूख खान और आमिर खान को कड़ी आलोचना का सामना करना पड़ा जब उन्होंने देश में असहिष्णुता के माहौल पर बयान दिया था.

वह कहते हैं- "भारत को अब बिना किसी राजनीति के तुरंत ही इस बात पर दोबारा मुहर लगानी होगी कि वह बहुलवाद, विविधता और धार्मिक सद्भाव के प्रति प्रतिबद्ध है. भले ही शुरूआत कांग्रेस को केंद्र में रख कर बाएं से हो या भाजपा को केंद्र में रख कर.”

नकवी कहते हैं, "भारतीय मुसलमानों को इमामों या धर्मगुरूओं के चंगुल से पीछा छुड़ाने की जरूरत है जैसे कि हिन्दुओं को साम्प्रदायिक राजनीति से दूर रहने की जरूरत है. पर वे कहते हैं पता नहीं उनके जीते जी ऐसा होगा भी कि नहीं.”

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जो लोग भारतीय मुसलमानों की खिन्नता और भारत के मौजूदा दौर के लिए जिम्मेदार ताकतों को समझना चाहते हैं, उन्हें एक बार 'बीइंग द अदर' जरूर पढ़नी चाहिए. बस इस किताब का वह हिस्सा उबाऊ हो जाता है जब नकवी अतीत के अपने निजी किस्से बयां करते हैं. उम्मीद है अगले एडिशन में किताब के वे अंश हटा दिए जाएंगे.

First published: 22 July 2016, 7:31 IST
 
लमट र हसन @LamatAyub

Bats for the four-legged, can't stand most on two. Forced to venture into the world of homo sapiens to manage uninterrupted companionship of 16 cats, 2 dogs and counting... Can read books and paint pots and pay bills by being journalist.

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