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शशि थरूर की बेबाक़ी, हिन्दुस्तान में ब्रितानी राज 'बर्बर' था

लमत आर हसन | Updated on: 10 February 2017, 1:45 IST
QUICK PILL
  • विश्व प्रसिद्ध संस्था ऑक्सफोर्ड यूनियन ने कांग्रेसी नेता और भारतीय सांसद शशि थरूर को मई 2015 के अंत में अपने विचार साझा करने के लिए बुलाया था. बहस का विषय था \'ब्रिटेन की पूर्व कॉलोनियों को मुआवजा देने की वचनबद्धता.\'
  • सभी तथ्य भली-भांति जानते हुए भी इसमें उन्होंने ज्यादा बातें नहीं कही. पंद्रह मिनट के मामूली से वक़्त में उन्होंने सभी प्रमुख बिन्दुओं को छूते हुए जो बातें कही, वह इस मुद्दे को जानने के लिए काफी हैं.
  • थरूर का भाषण तीन लाख से अधिक लोगों ने देखा और हजार से अधिक लोगों ने इसे शेयर किया. अब इस मुद्दे पर उन्होंने विस्तार से लिखते हुए इसे एक किताब की शक़्ल दे दिया है. 

'ब्रिटेन की पूर्व कॉलोनियों को मुआवजा देने की वचनबद्धता' विषय पर बोलते हुए थरूर ने अपने भाषण में ऐसा कुछ नहीं कहा था जिसमें कोई नई बात हो या जो आत्तिजनक हो. मगर उन्होंने अपनी पंद्रहवीं किताब 'अंधकार का युग: भारत में ब्रिटिश शासन' में अपने उस भाषण का विस्तार से ज़िक्र किया है. इसे युवा भारत को पढ़ने की सख़्त जरूरत है.

कैच के साथ साक्षात्कार में थरूर ने ब्रिटिश भारत के 'बर्बर' शासन पर कटाक्ष करते हुए खुलासा किया कि किस तरह उन्होंने हिन्दुओं और मुसलमानों को बांटने की सोची समझी चाल चली. साथ ही यह भी सोच लिया कि ब्रिटिश साम्राज्य को किस तरह की कुटिल चाल चलनी है. 

थरूर स्वीकार करते हैं कि 12 दिन में रोजाना 18 घंटे किस तरह उन्होंने दुनिया से अलग-थलग रहकर भूटान में अपनी पुस्तक को यह आकार दिया. उन्होंने अपनी प्राय: अनसुलझी जिंदगी के पहलुओं को छूते हुए विश्व के अहम फैसलों, कार्रवाई और उसके असर पर भी प्रकाश डाला. 

इंटरव्यू

भारत में ब्रिटिश शासन को 'ब्रूटिश' (बर्बर) लिखने की आपकी शब्दावली को किस रूप में लिया जाए? इसका क्या मतलब है? 

यह स्व परिभाषित विचार ब्रिटिश शासन व्यवस्था की शुरुआती उन कारगुजारियों पर आधारित है जो उसने यहां अपनी सुविधा के अनुसार अपनाई. मिसाल के तौर पर इसकी तुलना कांगो में बेल्जियनों की क्रूरता से करना गलत नहीं होगा. यह मामला एक दूसरे से जुड़ा हुआ है. 

जब आप सोचते हैं कि अन्य विद्रोहों की तरह 1857-58 की बगावत में हुए नरसंहार की कोई अलग वजह रही होगी. जब आप जलियांवाला बाग में हुए नरसंहार के बारे में सोचेंगे और अकाल के दौरान 35 लाख लोग भूख से क्यों बेमौत मारे गए. क्योंकि ब्रिटिश सरकार की नीति अकाल के दौरान कोई मदद नहीं करने की थी. 

जब आप जानेंगे कि प्रधानमंत्री विन्सटन चर्चिल ने दूसरे विश्व युद्ध के अंतिम दौर में भुखमरी के शिकार पश्चिम बंगाल से अनाज यूरोप के लिए सप्लार्इ् करने का फैसला किया. यह सब जानने के बाद आप इसे 'बर्बर' (ब्रूटिश) कहने से असहमत नहीं होंगे. 

आपने यह भी कहा है कि हममें से ही उच्च वर्ग के कुछ भारतीय अंग्रेजों के शुभचिंतक व हिमायती थे. 

हां जरूर. यह हकीकत है कि उस समय कुछ भारतीय दोमुंहा रवैया अपना रहे थे. वे क्या कर रहे थे और उन्हें क्या करना चाहिए था, इसमें फर्क नहीं समझ पाए.

अब भी कई लोग उस समय की चकाचौंध से अभिभूत हैं. इस संदर्भ में आपने नीरज सी चौधरी का उल्लेख किया है.

आप देखेंगे कि हर औपनिवेशिक शासन व्यवस्था में दासता को स्वीकार करने वाले लोग भी आसानी से मिल जाएंगे. मैं नहीं सोचता कि इसमें कोई अपवाद हैं. प्रत्येक शासनकाल में तथाकथित वर्ग विशेष के कुछ लोग अपने निहित स्वार्थ के लिए ऐसा रवैया अपनाते रहे हैं. 

जहां तक नीरज सी चौधरी का सवाल है, इसमें स्पष्ट तौर पर ऑक्सफोर्ड में जीवन के 25-30 साल बिताने तक कोई निहित लाभ नजर नहीं आता. जब तक वह भारत में थे नितांत मध्यम वर्गीय जीवन जिए. इसमें कोई शक नहीं कि उनके विचार प्रशंसा और निर्विवाद प्रशंसा पर आधारित थे.

आप हर्जाने, माफी और पश्चाताप की बात कर रहे हैं. लेकिन आपने दूसरी ओर विन्सटन चर्चिल और जवाहर लाल नेहरू के बीच हुई बातचीत का उल्लेख भी किया है जिसमें चर्चिल नेहरू से पूछते हैं कि वे उन अत्याचारियों के लिए इतना कम विद्वेष क्यों रखते हैं? तब नेहरू का जवाब था, 'मुझे एक महान व्यक्ति (महात्मा गांधी) ने यही सिखाया है कि भूल जाओ और माफ करो और चलते रहो.'

निश्चित रूप से यह महत्वपूर्ण है कि मैं लोगों से यह अपेक्षा करता हूं कि वे यह कहें 'भगवान के लिए जो सबकी चिंता करता है, ब्रिटिशों के जाने के 70 साल बाद उन्हें भूल जाएं.' इसलिए मेरा पहला जवाब यह है कि जब आप यह नहीं जानते आप कहां से आए हैं और यह नहीं पता कि कहां जाना है, तो जहां जा रहे हैं उसके लिए ईश्वर का शुक्रिया अदा क्यों नहीं करते? 

दिवंगत शिमौन पेरेस का एक रोचक तर्क मुझे याद आता है जिसमें वे कहते हैं कि इतिहास से उन्हें घृणा है और वे नहीं चाहते कि उनके नाती पोते इतिहास सीखें क्योंकि इतिहास घृणा सिखाता है, सभी बुराइयों को ताजा करता है. इसलिए वे चाहते हैं कि वे केवल भविष्य पर ध्यान दें. 

शांति और सह-अस्तित्व की भावना से पुरानी बातों को भुलाना संभव है. इसलिए यह बहुत महत्वपूर्ण विचार है और अपनी पुस्तक में तीन-चार जगह इस बात पर जोर दिया है कि मैं वर्तमान को दोषमुक्त ठहराने के लिए या वर्तमान में मार्गदर्शक के तौर पर इतिहास का इस्तेमाल नहीं करता.

मेरा अगला प्रश्न निजी है. मैं यह जानना चाहती हूं कि आपके इतना खूबसूरत दिखने का राज क्या है?

(हंसते हुए) अपने अभिभावकों का चयन बुद्धिमत्ता से करें. ईमानदारी से हम लोगों को अच्छा दिखने पर कोई श्रेय नहीं दें. यह उसके भाग्य पर निर्भर है कि वह किस जीन से आया है. ईमानदारी से मैं समय बर्बाद नहीं करता. मैं कोई चमत्कारिक अभिनेता भी नहीं हूं जो आईने के आगे घंटो बिता दे. 

अक्सर पहनावे के प्रति मैं सावधान रहता हूं. हाईस्कूल से ही पैंट के उपर कुर्ता पहनने की आदत है. स्टीफेंस कॉलेज से यह मेरी पोशाक बन गई. संयुक्त राष्ट्र में जाने पर मुझे सूट और टाई पहनने के लिए बाध्य किया गया.

इसीलिए खुशहाल जिंदगी जी रहे हैं. 

मुझे नहीं मालूम ( हंसते हुए) यह रोचक जिंदगी है.

First published: 6 November 2016, 7:28 IST
 
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