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औरतों के लिए ख़ुदा का क्या हुक्म है, कभी खुदा की बंदियों से भी पूछ लो

फहद सैयद | Updated on: 22 May 2016, 13:20 IST
(फाइल फोटो)
QUICK PILL
  • आमतौर पर बुर्के पर बहस में एक ख़ास ट्रेंड देखने को मिलता है कि इस मसले पर साउथ एशिया के मर्द बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं या यूं कहें कि कमान संभाल लेते हैं. सवाल यहीं से शुरू होता है कि जब ख़ुदा पूरे आलम का है तो फिर उसकी तर्जुमानी का जिम्मा हमेशा से मर्दों के हाथ में क्यों हैं?
  • इस्लामिक अकीदे की बात की जाये तो कुरान एक ईश्वरीय ग्रन्थ है. कुरआन की सूरह अन-नूर की इकतीसवीं आयत औरतों को सिर ढंकने की ताकिद करती है. कुरआन के सूरत अल-अहजाब में भी औरतों के ड्रेसकोड का जिक्र आता है.

मेरी पैदाइश एक ऐसे मुस्लिम परिवार में हुई, जहां बुर्का पहनने का रिवाज तो नहीं था लेकिन पर्दा ज़रूर था. आस-पास की महिलाओं को नकाब में देखना अजीब नहीं लगता था मगर अब एक पेच फंसा-फंसा सा लगता है. गाहे-बगाहे देश-दुनिया में चल रही बहस ने मुझे भी सोचने पर मजबूर किया है कि 14 सौ साल पहले शुरू हुई यह प्रथा सही है या ग़लत?

आमतौर पर बुर्के पर बहस में एक ख़ास ट्रेंड देखने को मिलता है कि इस मसले पर साउथ एशिया के मर्द बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं या यूं कहें कि कमान संभाल लेते हैं. सवाल यहीं से शुरू होता है कि जब ख़ुदा पूरे आलम का है तो फिर उसकी तर्जुमानी का जिम्मा हमेशा से मर्दों के हाथ में क्यों हैं?

क्या मर्द स्त्रियों से जुड़े मुद्दों पर न्याय कर सकते हैं? यह उन्हें सोचना चाहिए क्योंकि न्याय और बराबरी इस्लाम धर्म की आत्मा है और स्त्रियों के अधिकार और उनकी आज़ादी पर बुलडोज़र चलाकर वो सीधे-सीधे इस्लाम की आत्मा पर चोट करते हैं.

फेमिनिस्ट और मजहबी लोगों के बीच बुर्के की बहस

धर्म पर कुंडली मारकर बैठने वाली मज़हबी जमात पर्दे के पक्ष में कुरआन की आयतों और हदीसों की दलील देती है. वो पूछते हैं कि कुरआन की सूरह अल-अहजाब और अल-नूर में साफ-साफ दर्ज है कि पर्दे के बारे में आप खुदा के अल्फाज की फरमाबरदारी कर रही हैं?

वहीं महिला अधिकारों के लिए लड़ने वाली कार्यकर्ताओं का तर्क होता है कि हमारा ऐतराज खुदा के हुक्म से नहीं बल्कि इस्लामी ठेकेदारों के हुक्म से है. हमें ऐसे ठेकेदारों से इन्कार है जो मर्दो की नजर से बचाने के लिए औरतों को बुर्के में रखने का फरमान दे. हमें उस खुदा पर यकीन है जो मुस्लिम, गैर मुस्लिम, मर्द, गैर मर्द सबको बराबरी की नजर से देखता है.

मर्दों का एक सवाल यह भी है कि मर्द एक औरत को मुख्तार और महफूज़ क्यों नहीं देख सकते? वो औरत को मर्द के बराबर की हैसियत क्यों नहीं तस्लीम करता?

दूसरा पहलू एक धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक देश का संविधान है जो मुल्क के सभी नागरिकों को बराबरी की गारंटी देता है. इसके जवाब में मज़हबी उलेमा कहते हैं कि क्या धर्मनिरपेक्ष होने के मायने खुदा से मुंह मोड़ लेना है?

जब हमारा संविधान सभी धर्मों की पूजा पद्धति और उनके धर्म के हिसाब से इबादत की आजादी देता है तो फिर महिलावादियों को इससे क्या दिक्कत है?

फेमिनिस्टों का यह भी आरोप है कि धर्म का सहारा सिर्फ औरतों के अधिकार कुचलने के लिए लिया जाता है. वो पूछती हैं कि शरियत के मुताबिक चोरी के बदले हाथ काट देने की व्यवस्था है लेकिन क्या ये एक धर्मनिरपेक्ष मुल्क में स्वीकार है?

धार्मिक आज़ादी और किसी देश के कानून के बीच टकराव नया नहीं है. ये एक अंतहीन बहस है जो अक्सर किसी नतीजे पर पहुंचे बिना ख़त्म हो जाती है.

इस्लामिक बुनियाद पर बुर्के की हकीकत

पर्दा के पक्ष में एक तर्क ये दिया जाता है कि ये महिलाओं की गरिमा और शालीनता का प्रतीक है. एक हिजाब पहनी महिला दरअसल आदर्श इस्लाम की नुमाइंदगी करती नज़र आती है.

इस्लामिक अकीदे की बात की जाये तो कुरान एक ईश्वरीय ग्रन्थ है. कुरआन की सूरह अन-नूर की इकतीसवीं आयत औरतों को सिर ढंकने की ताकिद करती है. कुरआन के सूरत अल-अहजाब में भी औरतों के ड्रेसकोड का जिक्र आता है.

यहां कुरआन के सूरह 24 की आयत 30 का जिक्र ज़रूरी है जिसमें मर्दो को अपनी नजरें बचाकर रखने की हिदायत दी गई है. उसी सूरह की आयत 31 में कुछ ऐसी ही ताकिद औरतों के लिए की गई है.

इस्लामिक विचारक मौलाना मौदूदी अपनी किताब “पर्दा” में लिखते हैं- इंसान की प्रकृति में हया व लज्जा का जज्बा नेचुरल होता है. उसके जिस्म के कुछ हिस्से ऐसे हैं जिन्हें छिपाने की ख्वाहिश अल्लाह ने उसके स्वभाव में पैदा की है. यही स्वाभाविक ख्वाहिश है जिसने शुरु ही से इंसान को किसी न किसी तरह का लिबास पहनने पर मजबूर किया है.

इस बारे में कुरआन पक्के तौर के साथ आधुनिक विचारधारा का खंडन करता है. वह कहता है कि इंसानी जिस्म के जिन हिस्सों में मर्द और औरत के लिए यौनाकर्षण है, उनको जाहिर करने में शर्म करना और छिपाने की कोशिश करना इंसानी प्रकृति का तकाज़ा है.

कुरआन में पर्दे का जिक्र है फिर ये शालीनता बुर्के और निकाब के इंतहा में कैसे बदल गई? यही सबसे बड़ा सवाल है

फिर सवाल यह है कि आखिर ये लिबास औरतों के लिए बुर्के में कैसे बदल गया?

कुरआन के सूरह 7 आयत 26 में लिबास के बारे में साफ तौर पर कहा गया है कि बंदो हमने तुमपर लिबास उतारा है कि तुम्हारे जिस्म की हिफाजत और सजावट का जरिया भी हो, और बेहतरीन लिबास वो परहेजगारी का लिबास है. ये अल्लाह की निशानियों में से एक निशानी है शायद कि लोग इससे सबक लें.

अरबी शब्दाकोश में हिजाब शब्द का अर्थ पर्दा अथवा एक बैरियर के लिए किया जाता है, बैरियर सिर्फ मर्द और औरत के बीच नहीं बल्कि मर्द और मर्द के बीच में भी, कुरआन में हिजाब का जिक्र सूरह 33 आयत 53 में है. 

पैगंबर मोहम्मद (सल्ल.) मदीना हिजरत के पांचवे साल जब लोग उनके घर में आ जाया करते थे तब कुरआन में यह कहा गया कि ‘बिना इजाजत नबी के घर में ना घुस जाया करो, जब उनकी बीवियों से कुछ मांगना हो या कहना हो तो पर्दे के पीछे से मांगा करो, यही तुम्हारे और उनके दिलों की पाकीजगी के लिए ज्यादा मुनासिब तरीका है.’

इस आयत के मायने निकालें तो यहां खुदा पर्दे का तरीका समझा रहा है जो किसी औरत को बुर्का पहनाना या हिजाब में मुब्तिला करना नहीं है. कुरआन में पर्दे का जिक्र है फिर ये शालीनता बुर्के और निकाब के इंतहा में कैसे बदल गई? यही सबसे बड़ा सवाल है.

पर्दे के सवाल पर इतनी पर्दादारी क्यों?

आखिर पर्दे के सवाल पर ही इतनी पर्दादारी क्यों है. पर्दे से जुड़े अल्फाज़ में एक लफ्ज आता है सतर. सतर यानी जिस्म का वह हिस्सा जिसको कुरआन में लिबास के जरिये ढंकने को कहा गया है. एक मर्द का सतर का दायरा और औरत का सतर का दायरा अलग अलग है.

मुस्लिम उलेमाओं में औरतों के सतर जिस्म का कौन-कौन सा हिस्सा है, इसमें मतभेद है. कोई औरत के जिस्म के हर हिस्से को सतर का हिस्सा मानता है. और किसी के मुताबिक औरतों का वह हिस्सा जिससे मर्दो की नीयत पर असर पड़े.

झगड़ा यहीं से शुरू होता है कि आख़िर शालीनता का पैमाना क्या है और इसे कौन तय करेगा. मर्दों का हुक्म माना जाए या औरतों की राय ली जाए. बुनियादी सवाल यही है कि मुस्लिम समाज में औरतों के सतर तय करने की बागडोर मर्दों के हाथ में क्यों है, ये इख्तेयार औरतों के पास क्यों नहीं?

कुरआन में हिजाब शब्द का जितनी बार भी इस्तेमाल हुआ उसका अर्थ हेड स्कार्फ नहीं निकलता है. हिजाब शब्द कुरआन में 8 बार आता है. "बाधा" या "जुदाई की दीवार" (7:46), "पर्दा" (33:53), "छिपा" (38:32) "जुदाई की दीवार" (41: 5, 42:52, 17:45), "छिपा" (19:14) और "रोका" या " खुदा के लिए वहां जाने की मनाही है (83:15).

लेकिन आम चलन में हिजाब के मायने हेड स्कार्फ है. और ये हेड स्कार्फ से ना जाने कब मर्दों के मन मुताबिक बनाये हुए मजहब के रास्ते से चलते हुए बुर्के और अबाया में बदल जाता है? और इसे इस्लाम की पांच बुनियादों के बाद छठीं बुनियाद की तरह प्रमोट किये जाने लगता है.

आखिर में इस्लाम के आखिरी नबी प्रोफेट मोहम्मद के विचारों और उनकी जिंदगी की गहराई से समझना पड़ेगा कि इस्लाम में औरतों का मुकाम क्या है. नबी फरमाते हैं कि हममे से बेहतर ईमान वाला इंसान वो है जो औरतों के साथ बेहतर सुलूक करें. वह घर खुशकिस्मत है जिसके घर बेटियां पैदा होती है. नबी के ऐसे बहुत से बयान हैं जो ये साबित करते हैं कुरआन और नबी औरतों को अलग नहीं खड़ा करते. 

साथ ही इस्लाम आपको आपकी कमजोरियों से जद्दोजहद करने को कहता है. एक ऐसी दुनिया की उम्मीद देता है जहां बराबरी और अमन हो. ऐसी दुनिया तभी हम बना पाएंगे जब हम खुद को एक बार क्रॉस चेक कर लें. मुस्लिम समाज को ये जायजा लेने की दरकार है कि पर्दे के उसूल में मर्दो की झंडाबरदारी और सोच औरतों पर थोपना कितना सही है?

First published: 22 May 2016, 13:20 IST
 
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