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भारतीय संस्कृति और अबला नारी का संरक्षक बना बॉलीवुड?

देविका शर्मा | Updated on: 9 August 2016, 8:09 IST

सिमरन, मैं एक हिन्दुस्तानी हूं और जानता हूं कि एक हिन्दुस्तानी लड़की की इज्जत क्या होती है, राज (शाहरुख खान) ने जब यह डॉयलाग फिल्म दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे एक दृश्य में बोला था तब उन्होंने अपने इस आइकानिक डॉयलाग से लाखों भारतीयों का मन जीत लिया था.

अपने इस अभिनय में राज ने न केवल डॉयलाग बोले थे बल्कि ऑडियन्स के सामने भारतीयता की मिसाल भी पेश की थी. फिल्म में एक दृश्य आता है जब नशे में चूर सिमरन रात में उठकर रोने लगती है और भयभीत अवस्था में भारी कीमत चुकाने का अनुमान लगाते हुए राज से कहती है कि उसके साथ कुछ गलत हो गया है तो राज उसे याद दिलाता है कि वह एक हिन्दुस्तानी है और एक भारतीय लड़की के सम्मान, उसके गौरव को समझता है. राज उसे सहज करता है और उससे भी ज्यादा फिल्म के दर्शकों को जो उनकी आशा के विपरीत कि दोनों लंदन में बढ़े और पले हैं, भौगोलिक रूप से गिरते हुए नैतिक मूल्यों को लेकर चिन्तित हैं.

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यह पुरुष प्रधान समाज की असहजता, व्यग्रता का सिर्फ अकेला ही उत्कृष्ट मामला नहीं है. फिल्मों ने परम्परागत रूप से राष्ट्र-राज्य की सीमा के भीतर महिला सेक्सुअलिटी को सीमा में रखने के उपाय किए हैं. फिल्मों में महिलाएं प्रभावशाली नैतिक मूल्यों का प्रतिनिधित्व करती नजर आती हैं. वे सिर्फ खुद का ही प्रतिनिधित्व नहीं करतीं बल्कि समुदायों और उनकी सेक्सुअल शुचिता का भी, जिनसे राष्ट्र की पहचान का प्रतिनिधित्व होता है.

बॉलीवुड अपने 100 साल पूरे कर रहा है, इसके बावजूद स्थितियां ज्यादा नहीं बदली हैं

उल्लेखनीय है कि फिल्म दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे ने न सिर्फ प्रेम की परिभाषा बदल डाली थी, बल्कि इसने 20 साल तक एक ही सिनेमाहॉल में लगातार चलते रहकर ऐसा रिकॉर्ड बनाया जो न भूतो ना भविष्यति की तर्ज पर देखा जाता है.

1991 में भारत में आर्थिक उदारीकरण का दौर शुरू हुआ और उसी साल भारत में सैटेलाइट टेलीविजन का मार्ग प्रशस्त हुआ. इन दो कारकों के चलते भारत ने विश्व के लिए अपने दरवाजे खोले. आगे चलकर यह फैलते हुए सूचना प्रौद्योगिकी के नवाचार के रूप में तब्दील हुआ जिसका भारत की संस्कृति पर काफी गहरा असर देखा गया.

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देश का आर्थिक झरोखा खुलने से वैश्विक प्रतिस्पर्धा का खतरा भी महसूस हुआ, साथ ही भारतीय संस्कृति की पहचान के संरक्षण का भी विचार उत्पन्न हुआ. यह प्रतिरक्षा भारत को एक राष्ट्र राज्य के विचार के रूप में संरक्षण से जुड़ी थी. राष्ट्र की शुचिता की पहचान हिन्दू महिला के बेदाग होने से की गई जिनकी विशेषता और आदर्श सीता और सावित्री जैसी महिलाएं हैं. इसलिए फिल्मों में भारतीय हिन्दू महिलाओं की यौन सम्बंधी शुचिता हिन्दू मूल्यों का प्रतीक बनी और बॉलीवुड में महिला लैंगिक राष्ट्रवाद की वाहक बनीं.

करण जौहर द्वारा निर्देशित फिल्म कुछ कुछ होता है में एक कॉलेज छात्रा टीना मिनी-स्कर्ट पहनकर कॉलेज जाती है, जहां उसके साथ पढ़ने वाले छात्र उस पर तंज कसते हैं कि वह उनकी अपेक्षा कम भारतीय है. आखिरकार वह पूरे कॉलेज के सामने ओम जय जगदीश हरे आरती गाती है. जब वह अपनी भारतीयता साबित कर देती है तो छात्र उसे तुरन्त स्वीकार कर लेते हैं.

बॉलीवुड हीरोइनों ने पारिवारिक मूल्यों और परम्पराओं का प्रतिनिधित्व करने में महती भूमिका निभाई है

वह एक डॉयलाग भी बोलती है कि जब वह विदेश में थी तो किस तरह रही थी लेकिन वह अपनी संस्कृति नहीं भूली थी. महिलाओं का यह प्रतिरूप कई तरह के बदलाव लाने में सफल रहा. नब्बे के दशक में दक्षिणपंथी ताकतों का विकास, कड़े हिन्दुत्ववादी स्वभाव के साथ भारतीय जनता पार्टी का उत्कर्ष, इसके समानान्तर भारत के आर्थिक सुधारों ने एनआरआई आबादी में तीव्र इच्छा उत्पन्न की कि वे अपने जन्मस्थान से फिर से जुड़ें.

आज हिन्दुत्व के प्रचारकों ने एनआरआई के बीच अपने लिए कई नए क्षेत्र तलाश लिए हैं. इन फिल्मों ने पहली पीढ़ी के प्रवासियों के बीच घर से दूर रहने की वेदना को जागृत कर दिया है. दूसरी पीढ़ी के भारतीय विदेश में पैदा हुए हैं. वे नीतिकथाओं की कल्पना कर सकते हैं. वे भारतीय जीवन मूल्यों को मानने को मजबूर हैं जिसका उनके लिए कोई मतलब नहीं हैं, वे सामाजिकता से दूर हैं. बनिस्बत पश्चिम के भौतिकवाद और व्यक्तिपरक मूल्यों से.

भारत में सामाजिक-आर्थिक माहौल को बदलने के बाद जो समानान्तर गतिविधि उत्पन्न हुई, वह दक्षिणपंथी राजनीतिक दलों की मजबूती से ही हुई है.

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बॉलीवुड हीरोइनों ने ऐसे में पारिवारिक मूल्यों और परम्पराओं का प्रतिनिधित्व करने में महती भूमिका निभाई है जिसे पश्चिमीकरण और वैश्वीकरण ने नजरअंदाज किया है. परदेस (1997) में उसकी नायिका (महिमा चौधरी) ने विशुद्ध और परम्परागत हिन्दू मूल्यों के रूप में अपनी पहचान बनाई. उन्होंने अपने अभिनय में भारतीयता का सार प्रस्तुत किया है. वह कट्टर धार्मिक महिला हैं जो भोलापन लिए हुए हैं. उन्होंने हिन्दू देवी गंगा के नाम से अपनी भूमिका निभाई है जो पवित्रता, शुचिता का संकेत है.

फिल्म के संवादों में गंगा और भारत का रिश्ता हमेशा ही दिखाई पड़ता है. इसमें एक एनआरआई पिता भारत से अपने संबंध फिर से जोड़ना चाहता है. इसके लिए वह अमेरिका में जन्मे अपने पुत्र का विवाह गंगा से करने की कोशिश करता है क्योंकि उसका मानना है कि गंगा के जो संस्कार है, उसके पुत्र को मिल जाएंगे.

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संवादों में वाद-विवाद होता है. भारतीय मूल्यों पर उस समय कुछ आंच आती दिखती है जब गंगा अमेरिका जाती है, वहां वह लॉस वेगस के नाइट क्लबों के सम्पर्क में आ जाती है. हालांकि परदेस फिल्म में विदेशी स्थलों के मनभावन लोकेशन और अतिविशिष्ट वर्ग की जीवनशैली दिखाई गई है लेकिन भारतीय मूल्यों से समझौता किए जाने का डर भी है.

अमेरिकन जीवनशैली और ग्लैमर से प्रभावित होने के बावजूद गंगा विवाह के पहले अपने होने वाले पति के साथ विवाह-पूर्व सम्बंधों से इनकार कर देती है. वह कभी-कभी अपने होने वाले पति को जवाब भी दे देती है जब वह भारत के पुराने रीति-रिवाजों की आलोचना करता है. अतः फिल्म में भारतीय संस्कृति को जो खतरा दिखाई देता है, वह उसकी यौन शुद्धता से साफ हो जाता है.

फिल्मों में इस तरह के अभिनय से केन्द्रीयकृत गवर्नेंस की अवधारणा में हिन्दू विश्वासों को मजबूती ही मिलती है. ऐसी फिल्में आमतौर पर अधिकृत चरित्रों वाली होती हैं जिनमें समान्यतया पिता या पितामह होते हैं. युवा वर्ग अपने बड़ों के प्रति ज्यादा आक्रोशित रहता है और महिला अपने से बड़ी महिला के अधीनस्थ होने के साथ ही परिवार में पुरुष के भी अधीन होती है जो उसके ऊपर अपनी ताकत का इस्तेमाल करता है.

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इस तरह की फिल्मों में महिलाएं अपनी लाइफ करेक्टर की अपेक्षा बड़ी भूमिका निभाती हैं जो प्रेम, देखभाल, अनुशासन और आज्ञाकारी के रूप में होती है जो भारतीय मूल्यों के मौलिक तत्व हैं.

परदेस फिल्म में दो चैलेंजिंग परिवारों के बीच कबड्डी मैच खेला जाता है. ये परिवार अपने पुत्रों का विवाह गंगा से करना चाहते हैं. गंगा वह मैडल है जो विजेता को मिलेगी. कोई भी यह फिल्म देखकर आश्चर्यचकित रह जाता है.

पश्चिम में बॉलीवुड फिल्मों के सेट अब बीते दशक की बात हो गए हैं. यह अनजाने में नहीं हुआ है. आज की डॉयस्पोरिक फिल्में स्पष्ट रूप से पूर्व और पश्चिम का अंतर नहीं करतीं. इसके अतिरिक्त ऐसी फिल्में विवाहेत्तर सम्बंधों, विवाह पूर्व यौन सम्बंधों, कभी-कभार डेटिंग, ड्रिंकिंग और होमोसेक्सुअलिटी पर जोर दे रही हैं.

आज की नई डॉयस्पोरिक फिल्में जैसे लव आज कल (2009 ) और सलाम नमस्ते (2012) स्त्री-पुरुष सम्बंधों पर ज्यादा संतुलित हैं. इस तरह की फिल्मों में महिला एनआरआई को संभवतः देश में कुछ स्वायत्तता मिल जाती है और वह देश और संस्कृति को समझने वाला विषय नहीं रह जाता.

इस सबका यह मतलब नहीं कि फिल्में लोगों को सशक्त कर रही हैं या वे पितृसत्तात्मक व्यवस्था को पूरी तरह से खत्म कर रही हैं और फिल्म कॉकटेल से इसे साबित भी किया जा सकता है. बॉलीवुड अपने 100 साल पूरे कर रहा है. इस दौरान बॉलीवुड को उत्कृष्ट सफलता मिली है. इसके बावजूद स्थितियां ज्यादा नहीं बदली हैं.

First published: 9 August 2016, 8:09 IST
 
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