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रंगों का त्योहार होली क्यों है लठमार और हुड़दंग मचाने वाला उत्सव, जानें इससे जुड़ी कुछ रोचक कहानियां

कैच ब्यूरो | Updated on: 20 March 2019, 12:11 IST

पूरे देश में 21 मार्च को होली का मनाया जाता है. होली का त्योहार काफी जोश और उमंगों से भरा होता है. ज्यादातर त्योहार में लोग पूजा-पाठ करते हैं, लेकिन होली एक ऐसा त्योहार है जब लोग बहुत ही ज्यादा हुड़दंग बचाते हैं. होली के त्योहार से जुड़ी काफी पौराणिक कथाएं हैं. होली का त्योहार ना सिर्फ होलिका-प्रह्लाद से जुड़ी है, बल्कि भगवान शिव-पार्वती और राधा-कृष्‍ण से भी जुड़ी है. चलिए जानते हैं कुछ कथाएं-

 

 

राधा-कृष्‍ण की कथा

भारत में म‍थुरा, वृंदावन, बरसाना, गोकुल और नंदगांव में भगवान श्रीकृष्ण और राधा की पूजा की जाती है. यहां होली का त्योहार राधा कृष्ण की प्रेम कहानियों से जोड़कर देखा जाता है. भगवान श्रीकृष्ण अपनी लीला की वजह से काफी मशहूर थे. बसंत ऋतु में रंग खेलना भी श्रीकृष्‍ण की लीलाओं में से एक माना जाता है.

भक्‍त प्रह्लाद और होलिका की कथा

भक्‍त प्रह्लाद और होलिका की कथा होली की सबसे प्रचलित कथाओं में से एक है. पौराणिक कथाओं के मुताबिक, भगवान विष्‍णु के प्रति भक्‍त प्रह्लाद की भक्ति को देखकर प्रह्लाद के पिता हिरणकश्‍यप ने उसे अपनी बहन होलिका के हाथों मरवाना चाहा, लेकिन ऐसा हो नहीं सका. उल्टा हिरणकश्यप की बहन जलकर राख हो गई. भक्त प्रह्लाद का कोई भी बाल बांका नहीं कर सका. बुराई पर अच्‍छाई की जीत हुई.

शिव-पार्वती और कामदेव की कथा

पौराणिक कथाओं में इस बात का वर्णन किया गया है कि भगवान शिव से देवी पार्वती विवाह करना चाहती थी, लेकिन शिव इस बात से अंजान होकर अपनी तपस्‍या में लीन थे. ऐसी स्थिति में भगवान शिव की तपस्या को भंग करने के लिए मां पार्वती ने कामदेव की मदद ली. कामदेव की मदद से शिव की तपस्या तोड़ने में मां पार्वती सफल रहीं, लेकिन तपस्या भंग होने की वजह से शिव जी ने क्रोध में आकर कामदेव को भस्‍म कर दिया. बाद में जब शिव ने पार्वती को देखा तो उन्‍हें अपनी पत्‍नी के रूप में स्‍वीकार कर लिया. वहीं, कामदेव की पत्‍नी रति के काफी दुखी थी. इसे देख शिव ने कामदेव को जीवित कर दिया, तब से रंगों का त्‍योहार होली मनाया जाने लगा.

होली पर शोर मचाने की परंपरा

होली के दिन हल्ला मचाने की परंपरा है. इसकी भी एक पौराणिक कथा है. पौराणिक कथाओं के अनुसार, एक ढुंढी नाम की राक्षसी थी, जो बच्चों की हत्या कर उसे खा जाती थी. राक्षसी ढुंढी को वरदान मिला था कि उसे कोई भी देवता, अस्त्र-शस्त्र, मानव, ना सदी, ना गर्मी और ना बरसात मार सकता है. राक्षसी ढुंडी के बढ़ते अत्याचार को देखते हुए राजा पृथु के राज पुरोहित ने उसे मारने के लिए उपाय सुझाया.

उन्‍होंने कहा कि फाल्‍गुन मास की पूर्णिमा पर जब न अधिक सर्दी हो और न अधिक गर्मी हो, सब बच्‍चे अपने घर से लकड़ियां लाकर जलाएं. ऐसा करने से ऊंचे स्‍वर में देवताओं के मंत्र पढ़ें और खूब हल्‍ला मचाएं और शोर करें. ऐसा करने पर तेज आवाज से राक्षसी ढुंटी मर सकती है. पुरोहित के बताए उपाय के बाद बच्‍चों ने ऐसा ही किया. और खूब शोर मचाया. हल्‍ला-गुल्‍ला सुनकर जब राक्षसी वहां पहुंची तो बच्‍चों ने उस पर धूल-कीचड़ उछालकर और गंदगी फेंककर उसे नगर से बाहर खदेड़ दिया. तब से होली का पर्व मनाया जाता है.

रंग-गुलाल से ही नहीं इन तरीकों से भी मनाया जाता है होली का त्योहार, जानकर रह जाएंगे दंग

 

First published: 18 March 2019, 13:11 IST
 
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