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शादी के बाद महिलाएं क्यों लगाती हैं पति का सरनेम?

कैच ब्यूरो | Updated on: 24 April 2016, 11:34 IST

दुनिया भर के अंग्रेजी भाषी मुल्कों में ज्यादातर महिलाएं शादी के बाद अपना पुराना उपनाम (सरनेम) बरकरार नहीं रखती हैं. उनके बच्चों को सामान्यता उनके पिता का सरनेम दिया जाता है.

इस चलन से महिलाओं को असुविधा होती है. यह संभवतः समाज और शादी में लैंगिक भूमिकाओं के साथ ही महिला-पुरुष की असमान स्थिति जाहिर करता है. 

क्यों दशकों के नारीवाद के बावजूद यह जारी हैः

एक नई थियरी

एक अंग्रेजी जर्नल में छपे लेख ने इस व्यवहार को इवोल्यूशनरी थियरी (क्रमविकास परिकल्पना या विकासवादी सिद्धांत) के जरिये विस्तार से समझाया है. अमेरिका स्थित यूनिवर्सिटी ऑफ वेस्टर्न ऑन्टैरियो के मेलैने मैकइकेरॉन का तर्क है कि महिलाएं अपना सरनेम इसलिए बदलती हैं ताकि वो अपने पति के प्रति वफादारी जाहिर कर सकें.

इससे इस बात की संभावना बढ़ जाती है कि पैदा होने वाले बच्चों को पिता और दादा-दादी से संपत्ति मिलेगी. जाहिर है पैतृक संपत्ति बच्चों के वैवाहिक जीवन को बेहतर करने, गृहस्थी बसाने और परिवार बढ़ाने के काम आती है.

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पति और सास-ससुर की यह खुशी संभवतः नाना-नानी की प्रसन्नता से अलग होती है, हालांकि वो भी बच्चों पर खर्च करने या संपत्ति देने के महत्वपूर्ण स्रोत होते हैं. एक महिला को हमेशा इस बात पर भरोसा होता है कि जिस बच्चे को वो जन्म देगी, वो उसी का होगा. इसलिए नानी भी इस बात पर भरोसा कर सकतीं हैं कि नाती-नातिन भी उन्हीं के होंगे.

लेकिन एक आदमी को उसके पितृत्व पर इस कदर भरोसा नहीं होता. नाना भी केवल इस पर भरोसा तब करेंगे कि नाती या नातिन उनका है जब उन्हें इस पर पक्का यकीन हो कि उनकी पत्नी उनके लिए पूरी तरह वफादार रही है.

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इसी तरह दादा-दादी, पोते-पोती को अपना मानने का भरोसा तभी करेंगे जब उनके बेटे को अपने पितृत्व पर भरोसा हो. परिणामस्वरूप नाना-नानी की तुलना में दादा-दादी को इस बात पर सबसे कम भरोसा होता है कि उनके पोते-पोती से उनकी तगड़ी आनुवांशिक संबंद्धता है क्योंकि इनके बीच में दो अनिश्चित संबंध जुड़े होते हैं. 

मतलब वफादारी में जरा सा भी शक होने पर पिता के लिए बीवी-बेटा और माता के लिए पिता-बहू संदिग्ध संबंध होते हैं.

वैवाहिक सरनेम बदलाव को संतानों की फिटनेस बढ़ाने की एक सामान्य प्रक्रिया भी माना जाता है

इस संदेह को देखते हुए, आनुवांशिक संबंद्धता का भरोसा बरकरार रखने के लिए मसलन महिलाओं का सरनेम बदलना, नाती-पोतों को पैतृक संपत्ति मिलने की संभावना बढ़ा देता है.

इवोल्यूशनरी एक्सप्लेनेशन (विस्तार) का यह मतलब नहीं कि अपना सरनेम बदलना जैविक व्यवहार है. बल्कि इस इवोल्यूशन ने पतियों और ससुराल पक्ष से संपत्ति मिलने के स्वतः झुकाव का समर्थन किया है. शादी के बाद अपना सरनेम बदलने के पीछे की यह भी एक वजह है.

इसका मतलब यह भी नहीं है कि माताएं जानबूझकर पति और ससुराल पक्ष से संपत्ति लेने का फैसला लें.

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अमेरिका में अविवाहित छात्रों पर किए गए एक शोध में 31 फीसदी छात्राओं ने वफादारी और पारिवारिक एकता को कारण बताते हुए अपने पति के सरनेम को अपनाने की बात कही. जबकि 28 फीसदी ने सरनेम बदलने की स्वीकृति देते हुए इसके पीछे परंपराओं को वजह बताया.

वैवाहिक सरनेम बदलाव को संतानों की फिटनेस बढ़ाने की एक सामान्य प्रक्रिया भी माना जाता है. इसलिए वैवाहिक सरनेम बदलाव की प्रक्रिया का सार्वभौमिक (यूनीवर्सल) न होना इवोल्यूशनरी ऑर्ग्यूमेंट का खंडन नहीं करता. हालांकि, यह थियरी सुझाव दे सकती है कि विभिन्न संस्कृतियों में पैतृक संपत्ति की उम्मीद (याचना) के सबूत मिलते हैं.

जैसा मैकइकेरॉन की थियरी का तर्क है कि अगर महिला का सरनेम बदलना वफादारी का संकेत है तो हमें इस बात के सबूत मिलने चाहिए कि क्या पुरुष को वाकई ऐसा लगता है.

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स्टडी से पता चला है कि जो महिलाएं शादी के बाद भी पहले का सरनेम इस्तेमाल करती हैं पुरुष उनके प्रति नकारात्मक भावना रखते हैं. ऐसी महिलाओं को कम आकर्षक और खराब मां मानने के साथ ही आपसी रिश्ते में कम वफादार माना जाता है.

अगर पति की पैतृक संपत्ति की उम्मीद रखना ही वैवाहिक सरनेम बदलने का कारण है, तो जो महिलाएं अमीर हैं उनके शादी के बाद सरनेम बदलने की संभावना कम होनी चाहिए. शोध में पता चला है कि जो महिलाएं अमीर हैं और ज्यादा कमा सकती हैं वो शादी के बाद अपने पति के सरनेम लगाने को कम जरूरी समझती हैं.

शादी के बाद सरनेम बदलना पति और ससुराल पक्ष की ओर समर्पण दिखाना हैै

इस तथ्य की एक वैकल्पिक व्याख्या भी हो सकती है. संभव है कि जिन महिलाओं के पास ज्यादा पैसे-संपत्ति है वे ज्यादा मुखर और आजाद होती हैं. इसलिए वे अपने पति और ससुराल पक्ष की इच्छाओं के बारे में उतना नहीं सोचतीं.

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वहीं, शादी के बाद सरनेम बदलने वाली महिलाओं के बीच कम मुखरता और आजादी का मतलब यह होगा कि सरनेम बदलना पति और ससुराल पक्ष की ओर समर्पण दिखाना है. यह समर्पण वह व्यवहार हो सकता है जो इवोल्यूशन के दौरान संपत्ति की चाहत से सामने आया.

क्या यह प्रशंसनीय है?

मैकइकेरॉन की इवोल्यूशन थियरी कितनी सही इसका निर्णय मुश्किल है. 

जिन विशेष संस्कृतियों में ऐसा होता है उनसे जुड़े कारणों के जरिये महिलाओं के सरनेम बदलने को और आसानी से समझा जा सकता है. लेकिन इसे केवल सांस्कृतिक प्रचलन मान लेने से इसे पूरी तरह नहीं समझा जा सकता. क्योंकि इससे ये पता नहीं चलता कि ऐसा प्रचलन शुरू कैसे हुआ.

अगर इवोल्यूशन की यह थियरी सही है तो भी इसका यह मतलब नहीं है कि महिलाएं नैतिक रूप से अपने पति और ससुराल पक्ष से संपत्ति हासिल करने की चाह रखती हैं. 

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अगर कुछ भी है तो इवोल्यूशन का मतलब हमें यह याद दिलाता है कि हमारा व्यवहार अचेतन (अनकॉन्शस) से प्रभावित होता है और यह हमेशा तर्कसंगत सोचविचार का परिणाम नहीं होता.

हममें से तमाम के व्यवहार (बिहैवियर) को प्रभावित करने वाले बायोलॉजिकल और इवोल्यूशन फोर्सेज का इससे कोई मतलब नहीं होता कि क्या सही है और क्या गलत. चूंकि यह फोर्स अक्सर हमारी चेतन जागरुकता (कॉन्शस अवेयरनेस) के बाहर काम करते हैं, इसलिए इनके प्रति जागरूक होना हमें इनके प्रभाव से मुक्त करता है.

कम से कम इवोल्यूशन थियरी यह समझाने में मदद करती है कि हम जैसे हैं वैसे क्यों हैं. 

First published: 24 April 2016, 11:34 IST
 
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