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निर्भया दिवस: महिलाआें की सुरक्षा और अधिकार सुनिश्चित करने वाले 8 कानून

ऋचा मिश्रा | Updated on: 16 December 2016, 7:43 IST

16 दिसंबर की तारीख सामयिक दौर में बहुत मायने रखती है. आज से चार साल पहले एक लड़की के साथ कुछ लोगों द्वारा किए गए अमानवीय व्यवहार के खिलाफ एक अभूतपूर्व गु्स्सा और विद्रोह दिल्ली सड़कों पर उमड़ पड़ा था. इस एक घटना ने भारतीय सत्ता तंत्र और न्यायिक व्यवस्था को भीतर से हिला कर रख दिया था. लोगों केे गुस्से और कानून के सीमित प्रावधानों को देखते हुए देश में कानूनी बदलाव की मुहिम शुरू हो गई. इसके नतीजे में देश को महिलाओं के खिलाफ होने वाले यौन शोषण से निपटने के लिए एक नया और कड़ा कानून मिला.

हालांकि इस नए कानून के लागू होने के बाद भी हालात में कोई चमत्कारिक बदलाव के लक्षण नहीं दिखे हैं. दिल्ली, मुंबई, कोलकाता समेत उन तमाम शहरों में जहां महिलाएं कामकाजी भूमिका में है, उनके खिलाफ सड़क से लेकर दफ्तर तक आए दिन यौन शोषण की वारदातें देखने-सुनने को मिलती हैं.

महिलाआें के खिलाफ होने वाले अपराधों की तादात में लगातार हो रही बढ़ोत्तरी को देखते हुए यह बेहद जरूरी है कि महिलाओं और साथ ही बाकी लोगों को भी भारतीय कानून द्वारा दिए गए अधिकारों की समुचित जानकारी हो, महिलाएं अपने कानूनी अधिकारों के प्रति जागरुक हों. यहां हम ऐसे ही कानूनों की बात कर रहें हैं जिन्हें बनाने का मकसद महिलाआें की सुरक्षा के साथ उनके अधिकारों को सुनिश्चित करना था.

1. घरेलू हिंसा कानून

पति-पत्नी साथ नहीं रहना चाहें तो पत्नी सीआरपीसी की धारा 125 के तहत अपने और बच्चों के लिए गुजारा भत्ता मांग सकती है. घरेलू हिंसा कानून के तहत भी एक महिला गुजारा भत्ता की मांग कर सकती है. अगर नौबत तलाक तक पहुंच जाए तब हिंदू मैरिज ऐक्ट की धारा 24 के तहत मुआवजा राशि तय होती है, जो कि पति के वेतन और उसकी अर्जित संपत्ति के आधार पर तय की जाती है.

लेखिका नूर जहीर कहती हैं, 'महिलाआेंं के लिए बने कानून के फायदे हैं लेकिन जरूरी है कि इन्हें सही तरीके से लागू किया जाए. आज भी महिलाआें को इन कानून जानकारी नहीं है. सबसे जरूरी है महिलाआें का कानून के प्रति जागरुक होना. निर्भया कांड को समाज ने बेहद गंभीरता से लिया, उसके बाद कर्इ सकारात्मक बदलाव भी हुए. एेसे हादसे हमें नर्इ सीख देकर जाते हैं.'

जहीर मानती हैं कि इन अधिकारों की राह में सबसे बड़ा रोड़ा समाज की पितृसत्तात्मक सोच है जो हमेशा इसके खिलाफ जोर लगाती है. समय के साथ पैतृक सत्ता की सोच बढ़ रही है. आज के दौर में अमेरिका के राष्ट्रपति डानाॅल्ड ट्रंप इसका जीता जागता उदाहरण है.

2. अपनी संपत्ति से जुड़े निर्णय

कोई भी महिला अपने हिस्से में आई पैतृक संपत्ति और खुद अर्जित की गई संपत्ति का जैसे चाहे इस्तेमाल कर सकती है. अगर महिला उसे बेचना चाहे या उसे किसी और के नाम करना चाहे तो इसमें कोई इसमें दखल नहीं दे सकता. महिला चाहे तो उस संपत्ति से अपने बच्चो को बेदखल भी कर सकती है. 

नारीवादी कार्यकर्ता कविता कृष्णन का कहना है कि कानून में बदलाव हुए हैं लेकिन जरूरी है कि ये कानून पूरी तरह से प्रभाव में काम कर सकें. आज भी पुलिस कर्इ मामलों में एक्शन लेने की बजाए समझौता कराने की कोशिश करती है. निर्भाया मामले की प्रक्रिया पूरी हुर्इ लेकिन आज भी देश में अनगिनत मामले एेसे हैं जिनमें सुनवार्इ तक शुरू नहीं हुर्इ. ऐसे तमाम मामले हैं जहां तेजी से सुनवार्इ होती नहीं दिख रही है. इस बात को याद रखा जाए की जब निर्भया कांड हुआ तब लड़कियों ने कानून में बदलाव के साथ आजादी की बात की थी. वह आजादी आज भी दूर की कौड़ी प्रतीत होती है.

3. आॅफिस में काम करने के दौरान

अगर कोई महिला ऑफिस में काम करती है और अगर वो पुरुषों के बराबर ही समय ऑफिस में देती है, तो उसकी सैलरी भी पुरुषों के बराबर होनी चाहिए. इसके साथ ही किसी भी ऑफिस में महिलाओं को 7 बजे के बाद रुकने के लिए ज़बरदस्ती नहीं की जा सकती है. अगर किसी भी महिला को ऑफिस में मानसिक या शारीरिक शोषण झेलना पड़ रहा है तो वो खुद जाकर इस उत्पीड़न के खिलाफ शिकायत दर्ज़ करा सकती है.

4. महिला अपराधी की गिरफ्तार के नियम

महिला अपराधी को सूर्यास्‍त के बाद या सूर्योदय से पहले गिरफ्तार नहीं किया जा सकता. इसके अलावा एक महिला की तलाशी केवल एक महिला पुलिसकर्मी ही ले सकती है.

5. संपत्ति में अधिकार

एक लड़की का ये भी अधिकार है कि पिता की संपत्ति पर उसका भी उतना ही हक़ होता है जितना एक लड़के है. और शादी के बाद भी उनका ये हक़ कोई छीन नहीं सकता है. 

6. गर्भवती महिला के अधिकार

ऑफिस में काम करने वाली गर्भवती महिला को 12 हफ्ते की मेटरनिटी लीव बिना सैलरी कटे हुए मिलनी चाहिए. छुट्टी के दौरान महिला को नौकरी से नहीं निकाला जा सकता और अगर उसका बॉस उसे इस अधिकार से वंचित करता है तो, वह उसकी शिकायत महिला कोर्ट में कर सकती है. इसके बावजूद तमाम निजी कंपनियां महिलाओं के इन अधिकारों का खुलेआम उल्लंघन करती है.

7. पहचान छिपाने का अधिकार

अगर कोई महिला किसी अपराध में शामिल है या उसका रेप हुआ है, तो उसको पूरा अधिकार है कि वो अपनी पहचान छुपा सके. चाहे वह पुलिस हो या फिर मीडिया, अगर वह महिला की पहचान सार्वजनिक करता है तो वह कानूनी अपराध होगा.

सामाजिक कार्यकर्ता जुलेखा जबीन का मानना है कि महिलाआें के अधिकारों को लेकर कानून तो कर्इ बन गए हैं मगर अक्सर उन्हें इंसाफ नहीं मिल पाता. निर्भया कांड की बरस पर कल हम कैंडल तो जलाएगें लेकिन यह सारा कैंडल कल्चर मीडिया फोकस पाने के लिए होता है. आैरतों की की लड़ार्इ के नाम पर महज ढकोसला हो रहा है. जरूरी है लड़कियों के सिलेबस में डिफेंस कोर्स शामिल हो. इंसाफ के नाम पर बरसी और कैंडल मार्च का नाटक बंद होना चाहिए. सच तो यह है कि आैरतों को पिछले दस सालों से कोर्इ इंसाफ नहीं मिल है.

8. मुफ्त कानूनी मदद लेने का हक

अगर कोई महिला किसी केस में आरोपी है तो महिलाओं के लिए कानूनी मदद निःशुल्क है. वह अदालत से सरकारी खर्चे पर वकील करने का अनुरोध कर सकती है. यह कानून केवल गरीब ही नहीं बल्कि किसी भी आर्थिक स्थिति की महिला के लिए है. पुलिस महिला की गिरफ्तारी के बाद कानूनी सहायता समिति से संपर्क करती है, जो कि महिला को मुफ्त कानूनी सलाह देने की व्यवस्था करती है.

First published: 16 December 2016, 7:43 IST
 
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