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विश्व रंगमंच दिवसः जब तक संवेदना है, संघर्ष है, रंगमंच जीवित रहेगा

पाणिनि आनंद | Updated on: 10 February 2017, 1:51 IST

दुनिया में रंगमंच का इतिहास उतना पुराना है जितना कि मानव सभ्यता में संप्रेषण का इतिहास है. यह अपने गठित और संस्थागत रूप में आने से शुरू नहीं होता. यह शुरू होता है वहां से जहां किसी एक समूह या व्यक्ति के सामने किसी दूसरे व्यक्ति ने किसी घटना, भावना या विचार को एक उसके अनुकूल भावों, भंगिमाओं, संवादों और शैली के साथ समझाने-बताने का प्रयास किया होगा.

अभिनय प्रकृति ने केवल मनुष्य को ही नहीं दिया, कितने ही जीवों में इसके बिंब मिलते हैं. और जितना पुराना अभिनय है, उतना ही पुराना रंगमंच भी है. भारत रंगमंच की महान परंपरा की धरती है. यह नाट्यशास्त्र की धरती है, कालीदास से लेकर 21वीं सदी तक के सैकड़ों वर्षों में हमारे पास रंगमंच में देखने बताने को इतना सबकुछ रहा है कि जिसे एक मौके पर बताया नहीं जा सकता. इसलिए फिलहाल बात भारत में आज के रंगमंच और उसके सामाजिक संदर्भों, सरोकारों की.

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दरअसल, यह इसलिए भी जानना आवश्यक है क्योंकि जैसे सामाजिक और सांस्कृतिक स्तर पर हमें बहुत सारे मोर्चे देखने को मिलते हैं, वैसे ही रंगमंच भी पिछले 100 वर्षों के दौरान बहुत सारे माध्यमों के विकास के चलते अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है.

दिल्ली में पिछले कुछ वर्षों के किसी भी आंदोलन या सामाजिक मोर्चे, संघर्ष को देखिए, आपको थिएटर साथ खड़ा दिखाई देगा

रंगमंच, जो मुख्यधारा का मंच था अब अपनी सीमाओं और नए अविष्कारों की सुलभता के बीच खुद को बचाने की लड़ाई लड़ रहा है. और इसीलिए, रंगमंच की लड़ाई, तमाम सांस्कृतिक और सामाजिक लड़ाइयों, मोर्चों का साझा दर्द है. इस दर्द में दोनों एक साथ खड़े हैं. सड़क पर दोनों हैं. रंगमंच भी और शोषित उपेक्षित भी. दोनों अपनी बात कह रहे हैं और आंदोलित हो रहे हैं.

भारत की आज़ादी की लड़ायी के दौर में इप्टा का जन्म हो चुका था. शांतिनिकेतन में रवींद्रनाथ टैगोर एक गुरुकुल में रंगमंच को स्थापित कर चुके थे. रंगमंच के ऐसे कितने ही केंद्र थे. यह सबकुछ तब हो रहा था, जब ढेर सारी नाटक मंडलियां, नौटंकी, थिएटर ग्रुप समाज की मुख्यधारा में रचे बसे थे. भागवत कथाओं से लेकर रामलीलाओं तक, रास से लेकर पारंपरिक कथाओं तक और इसके सापेक्ष प्रेम, हिंसा, सामाजिक कुरीतियों, आडंबरों और जनचेतना से जुड़े विषयों पर नाटक खेले जा रहे थे. लेकिन तकनीक का घटाटोप अबतक रंगमंच के दालान पर छाने लगा था.

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जब देश आज़ाद हुआ तबतक भारत में सिनेमा और रेडियो आ तो चुके थे लेकिन उनकी पहुंच सबके पास नहीं थी. लेकिन देश के विकास के साथ साथ सिनेमा बढ़ा, रेडियो बड़े धनिकों के दालानों से निकलकर आम लोगों की पहुंच का हिस्सा बनने लगा. टीवी ने अपना पर्दा हटाया तो लोगों को रंगमंच अपने कमरे के भीतर चलता बोलता नज़र आया. यह तकनीक थी, जिसने अभिनय को लोगों तक पहुंचाना शुरू कर दिया था. इससे पहले लोग अभिनय तक पहुंचते थे. सिनेमा और टीवी, दोनों ने लोगों को इसतरह एकसाथ आकर देखने-दिखाने से दूर किया. और यहीं से रंगमंच का अपरदन शुरू हो गया.

मुख्यधारा की जगहों पर नाटक मंडलियां अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष करते हुए मरती गईं. नगाड़े और धुंधरू संभाले साजबाज़ों ने दूसरे औज़ारों को थाम लिया. पर्दा उठाने गिराने वाले हाथ कल-कारखानों में सामान ढोने लगे. अभिनय करने वालों ने क्या क्या करके खुद को जीवित रखना शुरू कर दिया. लेकिन भारत का विकास भी एक समानता पर आधारित विकास नहीं था. जितनी देर बिजली दिल्ली को मिली, उतनी देर किसी गांव को भी मिली हो, ऐसा नहीं हुआ. दवा, अस्पताल, शिक्षा, सड़कें, परिवहन जैसी कितनी ही चीज़ें और मानवाधिकारों से लेकर संवैधानिक अधिकारों तक कितनी ही बातें बंदरबांट का शिकार रहीं. और इसीलिए रंगमंच वहां जीवित रहा, जहां संसाधनों की, बिजली की, जागरूकता की और बाज़ार की पहुंच कम थी.

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इस असमानता ने संघर्ष की ज़मीनें तैयार कीं. पूंजीवाद के संकट, स्त्री विमर्श, दलित चेतना, श्रम अधिकार, मानवाधिकार, सामाजिक कुरीतियों, गैर-बराबरी और आडंबरों के ख़िलाफ़ जैसे-जैसे राजनीतिक, सामाजिक चेतना बढ़ती गई और संघर्ष बढ़ते गए, समाज अपनी अभिव्यक्ति के लिए उतना ही व्याकुल होता गया. यही मुद्दे और विषय अब रंगमंच का विषय बनने लगे.

संघर्ष करने वालों को पता था कि केवल केंद्रीय रूप से नियंत्रित अखबारों, सिनेमा, टीवी और रेडियो के ज़रिए अपनी बात रख पाना संभव नहीं था. सत्ता और पूंजी को नियंत्रित करने वाले इन तमाम चीज़ों को भी नियंत्रित करते रहे और इसीलिए इन माध्यमों के ज़रिए ही लड़ पाना संभव नहीं था.

संघर्ष करने वालों को पता था कि केवल अखबारों, सिनेमा, टीवी और रेडियो के ज़रिए अपनी बात रख पाना संभव नहीं था

यही कारण है कि इप्टा से लेकर कबीर कला मंच तक और नया थिएटर के हबीब तनवीर से लेकर जन नाट्य मंच और सफ़दर हाशमी तक के सिलसिले ने नाटक को अभिव्यक्ति और संघर्ष का माध्यम बनाया. यह विकेंद्रीकृत था. इसमें सिनेमा और टीवी चैनल जैसे निवेश की आवश्यकता नहीं थी.

हबीब तनवीर ने तो एक झोले में सारी प्रापर्टी जैसी शैली के साथ नाटकों को विकसित किया ताकि संसाधनों पर निर्भरता न्यूनतम हो. इसे कहीं भी और कभी भी ले जाया जा सकता था. ऐसी जगहों पर भी जहां सरकार की और बाज़ार की चीज़ें कम ही पहुंचती हैं. महानगरों के चौराहों से लेकर आरा और पुरुलिया के सुदूर गावों तक रंगमंच संघर्ष और सामाजिक जागरण का माध्यम बना.

आप देश और दिल्ली में पिछले कुछ वर्षों के किसी भी आंदोलन या सामाजिक मोर्चे, संघर्ष को देखिए, आपको थिएटर साथ खड़ा दिखाई देगा. वो काले कुर्ते पहने और ढपली लिए आपके कानों में वो कह जाएगा, जो बाकी माध्यम कहने की कूवत नहीं रखते. वो अपनी मुद्राओं, संवादों और छवियों से आपको वो दिखा जाएगा, जो सत्ता या शोषक वर्ग आपको नहीं देखने देना चाहता है. आपको जहां संघर्ष मिलेगा, थिएटर वहीं खड़ा मिल जाएगा. संघर्ष से सुर मिलाते हुए.

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यह ठीक है कि देश में थिएटर बस इतना भर नहीं है. उसका एक विशाल दायरा है. राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से शुरू होकर यह सिलसिला उन तमाम समूहों तक जाता है जो इसे संस्थागत तौर पर दिखा रहे हैं. यह आश्चर्य नहीं है कि पिछले कुछ वर्षों में नाट्य समूहों और नाटकों की तादाद तेज़ी से बढ़ी है और इसमें कई आधुनिक प्रयोग देखने को मिल रहे हैं.

एक किस्म की अभिजात्यता भी इसने हासिल की है. दिल्ली और मुंबई में ऐसे नाटकों की तादाद अच्छी है जो अंग्रेज़ी में हैं, प्रयोगधर्मी हैं और अभिजात्य, प्रबुद्ध समाज को अपने पर्दे तक खींचकर लाते हैं. व्यवसायिकता में रचा-बसा यह थिएटर अपनी कमाई को सफलता की कुंजी मानता है, कलापक्षीय थिएटर इनपर सस्तेपन और शॉर्टकट का आरोप लगाता है.

लेकिन सरोकारों के साथ खड़ा थिएटर इनसे भिन्न है. उसके पास पैसे नहीं हैं लेकिन उसे पैसे पर आधारित होना भी नहीं है. उसके पास प्रसार की संभावनाएं सीमित हैं लेकिन उसे दूर तक नहीं, भीतर तक प्रसारित होना है. अपने आसपास झुग्गियों से लेकर छोटे गांवों तक उसे अपनी बात कहनी है. उसके पास सत्ता का वरदहस्त नहीं हैं लेकिन ऐसा होना भी नहीं चाहिए वरना संघर्ष की भाषा भ्रष्ट हो जाएगा.

रंगमंच लोगों के बीच अभिव्यक्ति के लिए जीवित है. और लोगों में जबतक संघर्ष ज़िंदा है, जबतक संचार को विकेंद्रित करके अपनी बात कहने की बेकली बाकी है, और इससे भी बढ़कर जबतक अभिनय बाकी है, रंगमंच ज़िंदा रहेगा.

First published: 27 March 2016, 8:53 IST
 
पाणिनि आनंद @paninianand

सीनियर असिस्टेंट एडिटर, कैच न्यूज़. बीबीसी हिन्दी, आउटलुक, राज्य सभा टीवी, सहारा समय इत्यादि संस्थानों में एक दशक से अधिक समय तक काम कर चुके हैं.

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