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प्रखर गांधीवादी और पर्यावरणविद अनुपम मिश्र नहीं रहे

कैच ब्यूरो | Updated on: 7 February 2017, 8:13 IST
(फाइल फोटो)

मशहूर गांधीवादी और पर्यावरणविद अनुपम मिश्र का दिल्ली में निधन हो गया है. सोमवार सुबह दिल्ली के एम्स अस्पताल में उनका निधन हो गया. वो लंबे समय से प्रोस्टेट कैंसर से पीड़ित थे.

अनुपम मिश्र का जन्म महाराष्ट्र के वर्धा में प्रसिद्ध हिंदी कवि भवानी प्रसाद मिश्र और सरला मिश्रा के यहां सन 1948 में हुआ था. पर्यावरण-संरक्षण के प्रति जनचेतना जगाने और सरकारों का ध्यान आकर्षित करने की दिशा में वह काफी वक्त से सक्रिय थे.

दिल्ली के निगमबोध घाट पर उनका अंतिम संस्कार किया गया. इससे पहले दिवंगत अनुपम मिश्र का पार्थिव शरीर गांधी शांति प्रतिष्ठान में रखा गया, जहां पहुंचकर लोगों ने उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि दी. गांधी शांति प्रतिष्ठान से ही उनकी अंतिम यात्रा निगमबोध घाट के लिए रवाना हुई.

'आज भी खरे हैं तालाब'

पर्यावरण और जल संरक्षण पर उनकी कई रचनाएं खासी चर्चित रहीं. आज भी खरे हैं तालाब, राजस्थान की रजत बूंदें, साफ माथे का समाज जैसी उनकी किताबें दुनिया भर में मशहूर हुईं. गांधी शांति प्रतिष्ठान के अध्यक्ष रहे अनुपम मिश्र गांधी मार्ग पत्रिका के संपादक भी थे.

दिल्ली के गांधी शांति प्रतिष्ठान में उन्होंने पर्यावरण कक्ष की स्थापना की थी. उन्होंने बाढ़ के पानी के प्रबंधन और तालाबों द्वारा उसके संरक्षण की तकनीक के विकास पर महत्वपूर्ण काम किया. उत्तराखंड के चिपको आंदोलन से भी अनुपम मिश्र जुड़े रहे थे.

उनकी किताब ‘आज भी खरे हैं तालाब’ शुरू से ही कॉपीराइट से मुक्त रही है और इस किताब का 30 से ज्यादा देसी-विदेशी भाषाओं में अनुवाद हो चुका है.

यह पुस्तक ब्रेल लिपि में भी उपलब्ध है. कुछ देशों में जल संरक्षण के लिये यह किताब आधार सामग्री के तौर पर इस्तेमाल की जा रही है. उनकी दूसरी किताबें राजस्थान की रजत बूंदें और साफ माथे का समाज भी पर्यावरण संरक्षण की दिशा में उल्लेखनीय हैं.

'चिपको आंदोलन' का भी हिस्सा रहे

अनुपम मिश्र ने दिल्ली यूनिवर्सिटी से 1968 में संस्कृत में पोस्ट ग्रेजुएशन किया. वे साल 2001 में दिल्ली में स्थापित सेंटर फॉर एनवायरमेंट एंड फूड सिक्योरिटी के संस्थापक सदस्यों में से एक हैं.

चंडी प्रसाद भट्ट के साथ काम करते हुए उन्होंने उत्तराखंड के चिपको आंदोलन में जंगलों को बचाने के लिए सहयोग किया था. वह जल-संरक्षक राजेन्द्र सिंह की संस्था तरुण भारत संघ के भी लंबे समय तक अध्यक्ष रहे.

पुस्तक 'आज भी खरे हैं तालाब' के लिए साल 2011 में उन्हें देश के प्रतिष्ठित जमनालाल बजाज पुरस्कार से सम्मानित किया गया था.

'आज भी खरे हैं तालाब' के लिए 2011 में अनुपम मिश्र को प्रतिष्ठित जमनालाल बजाज पुरस्कार से सम्मानित किया गया था.

परंपराग जल स्रोतों के 'अनुपम' संरक्षक

1996 में उन्हें देश के सर्वोच्च पर्यावरण पुरस्कार इंदिरा गांधी पर्यावरण पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया. 2007-2008 में उन्हें मध्य प्रदेश सरकार के चंद्रशेखर आज़ाद राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया.

इसके अलावा कृष्ण बलदेव वैद पुरस्कार से भी उन्हें नवाजा जा चुका है. बिना किसी सरकारी मदद के उन्होंने देश-दुनिया के पर्यावरण पर जिस तरह काम किया, वह अविस्मरणीय है. 

यह उन्हीं की कोशिशों का नतीजा था कि राजस्थान के सूखाग्रस्त जिले अलवर में जल संरक्षण का काम शुरू हुआ. देशभर में इसकी सराहना हुई. सूख चुकी अरवरी नदी के पुनर्जीवन में उनकी कोशिश काबिले-तारीफ रही.

उत्तराखण्ड और राजस्थान के लापोडिय़ा में परंपरागत जल स्रोतों के पुनर्जीवन की दिशा में अनुपम मिश्र के योगदान को कभी नहीं भुलाया जा सकेगा.

First published: 19 December 2016, 10:03 IST
 
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