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बुराड़ी मौत: एक आत्मा को खुश करने में गई 11 जान, CCTV में दिखा मौत की रात का 'खौफनाक मंजर'

कैच ब्यूरो | Updated on: 5 July 2018, 9:05 IST

दिल्ली के बुराड़ी परिवार के 11 लोगों की मौत की गुत्थी लगभग सुलझ गई है. दिल्ली पुलिस को ऐसे कई सबूत मिले हैं जिससे पुलिस ने मौत की गुत्थी सुलझाने का दावा किया है. पुलिस ने सीसीटीवी फुटेज, घर में मिले 11 रजिस्टर और कई सबूतों के चलते मौत की गुत्थी सुलझाने की बात कही है. क्राइम ब्रांच को घर से 11 रजिस्टर मिले हैं जिनमें मौत की पूरी स्क्रिप्ट पहले से ही लिखी हुई है. आप भी जानिए क्या हुआ था मौत की रात और क्या है बुराड़ी परिवार की पूरी कहानी..

ये है पूरी कहानी
दिल्ली के बुराड़ी परिवार के 11 सदस्यों की मौत की कहानी 11 साल पहले 2007 में ही शुरू हो गई थी. साल 2007 में परिवार के मुखिया भोपाल सिंह की मौत हुई थी. इसके बाद परिवार के सबसे छोटे बेटे ललित के ललित के अंदर उसके पिता यानि भोपाल सिंह की 'आत्मा' आने लगी थी. 11 साल से ललित पिता की आवाज में परिवार के बाकी सदस्यों से बातें करता था और उन पर हुक्म चलाता था. ललित ही निर्णय लेता था कि क्या करना है क्या नहीं और पूरे परिवार वाले मुखिया की तरह उसकी बात मानते थे.

परिवार के 11 सदस्यों को यकीन था कि ललित के अंदर उसके पिता की आत्मा आती है. पिछले 11 साल में ललित ने जो फैसले लिए उसकी वजह से परिवार की काफी तरक्की हुई. एक दुकान से तीन दुकानें हो गईं. घर भी अब दोबारा बनाया जा रहा था. प्रियंका मांगलिक थी जिसकी वजह से उसकी शादी नहीं हो रही थी. पिता के कहने पर जब एक ख़ास पूजा करने के बाद 17 जून को उसकी शादी एक अच्छे लड़के से तय होने के बाद सगाई भी हो गई तो परिवार काफी खुश था.

 

प्रियंका की सगाई के बाद एक बार फिर ललित के अंदर उसके पिता आए और उन्होंने 24 जून से 7 दिन तक चलने वाली बड़ पूजा यानी बरगद की तपस्या करने को कहा. ललित ने पिता की आवाज में पूरे परिवार इस कार्यक्रम की बात बताई. ललित ने बताया कि सभी 11 लोगों को 24 जून से 7 दिन तक बरगद की तपस्या करनी है. इसके बाद उनके दिन और अच्छे और खुशहाल हो जाएंगे.

परिवार 24 जून से रोज़ रात में पूजा करता था. पूजा के अनुसार, 30 तारीख को रात 12 से एक बजे के बीच में सबको बरगद के पेड़ की शाखाओं की तरह खड़ा होना था. किसको कहां खड़ा होना है, क्या करना है, यह सब रजिस्टर में पहले से ही लिखा था. घर से मिली डायरी के पन्नों में मौत के इस सफ़र का एक-एक ब्योरा है.

 

पुलिस को मिले सीसीटीवी फुटेज में इस मौत का पूरा सफ़र दिख रहा है. पुलिस ने घर के बाहर लगे सीसीटीवी में देखा कि 30 जून की रात 10:00 बजे नीतू और उसकी मां 6 काले रंग के स्टूल लेकर ऊपर गईं. रात 10:40 पर डिलीवरी ब्वाय खाना लेकर आया और वह उसने प्रियंका को दिया. रात 10.57 बजे भूपी कुत्ते को घुमाने के लिए बाहर आया. इसके अलावा सीसीटीवी फुटेज में यह भी दिख रहा है कि रात में 10.20 बजे घर में नीचे की फर्नीचर की दुकान से बच्चे तार लेकर ऊपर गए. बुराड़ी परिवार 6 स्टूल घटना वाले दिन रात में 10 बजे खरीद कर लाया था.

रजिस्टरों में फांसी लगाने के तरीके और इससे जुड़ी हर क्रिया का क्रम से जिक्र है. घर से निकलने वाले 11 पाइपों और 11 एंगल वाले रोशदानों के साथ 11 रजिस्टर भी बरामद हुए हैं, जिनमें 10 साल पहले मरे पिता की आत्मा से संवाद की हर बातचीत दर्ज है. इसी ने इस हंसते खेलते परिवार को फांसी के फंदे पर ढकेला.

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डायरी में अंतिम एंट्री में एक पन्ने पर लिखा है - "घर का रास्ता. 9 लोग जाल में, बेबी (विधवा बहन) मंदिर के पास स्टूल पर, 10 बजे खाने का ऑर्डर, मां रोटी खिलाएगी, एक बजे क्रिया, शनिवार-रविवार रात के बीच होगी, मुंह में ठूंसा होगा गीला कपड़ा, हाथ बंधे होंगे.' इसमें आखिरी पंक्ति है- 'कप में पानी तैयार रखना, इसका रंग बदलेगा, मैं प्रकट होऊंगा और सबको बचाऊंगा." पूरे परिवार को यकीन था कि उनके दिवंगत पिता आकर उन्हें बचा लेंगे.

 

परिवार के 11 सदस्यों के अलावा किसी को यह बात पता नहीं थी. पुलिस ने बताया कि घर में कोई धार्मिक ग्रंथ नहीं मिला है, न ही कोई आध्यात्मिक पुस्तक मिली है. सिर्फ हनुमान चालीसा और गायंत्री मंत्र मिले हैं. खुदकुशी के लिए 9 लोगों ने 5 स्टूलों का इस्तेमाल किया था. छठा स्टूल प्रतिभा को इस्तेमाल करना था. प्रियंका को सेंटर में रखना था.

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पुलिस के मुताबिक सब कुछ एक्सीडेंटल हुआ, क्योंकि रजिस्टर में लिखा था कि इस प्रक्रिया के बाद हाथ खोलने थे. जैसा कि रजिस्टर में लिखा है, उनका विश्वास था कि इस प्रक्रिया से उनकी शक्तियां बढ़ जाएंगी. प्रकिया के बाद सबको एक-दूसरे की हाथ खोलने में मदद करनी थी. लेकिन ऐसा हो नहीं पाया और हंसता-खेलता परिवार एक दिवंगत आत्मा को खुश करने के चक्कर में मौत के मुंह में समा गया.

अगले दिन सुबह 5:56 बजे ट्रक दूध लेकर आया. आम तौर पर दुकान सुबह 6 बजे खुल जाती है, लेकिन जब दुकान नहीं खुली तो ट्रक वाले ने कई बार फोन मिलाया लेकिन किसी ने नहीं उठाया. ट्रक 6:03 बजे चला गया. सुबह 7:14 बजे नौकरों ने पड़ोस के सरदार जी से कहा तो वे ऊपर गए और तुरंत नीचे आ गए और शोर मचा दिया. इस परिवार का सरनेम भाटिया नहीं बल्कि चुंडावत है. दरअसल प्रतिभा की शादी भाटी से हुई थी, जिनकी मौत हो गई थी. प्रतिभा बच्चों को पढ़ाती थी तो बच्चे उन्हें भाटिया मैडम बोलते थे.

First published: 5 July 2018, 9:03 IST
 
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