Home » दिल्ली » DCW in a mess: is Najeeb Jung appointee to blame or Delhi govt bureaucracy?
 

नजीब जंग की नियुक्ति और दिल्ली सरकार की अफ़सरशाही में पिसता दिल्ली महिला आयोग

श्रिया मोहन | Updated on: 10 February 2017, 1:39 IST
(आर्या शर्मा/कैच न्यूज़)
QUICK PILL
  • चुनाव से ठीक पहले कमोबेश सभी राजनीतिक दल दिल्ली में महिला सुरक्षा के बड़े-बड़े वादे करते हैं. इन वादों के ज़रिए ही दल सत्ता के सिंहासन तक पहुंचते हैं मगर उसके बाद महिलाओं की सुरक्षा फ़ाइलों में दब जाती है. 
  • दिल्ली महिला आयोग को लेकर इसकी मुखिया स्वाति मालीवाल और सदस्य सचिव अलका दीवान के बीच की तनातनी कम से कम यही बताती है. 

दिल्ली महिला आयोग (डीसीडब्ल्यू) ने पिछले तीन महीने से अपने 95 स्टाफ को वेतन नहीं दिया है. इसके लिए आयोग की सदस्य सचिव अलका दीवान को ज़िम्मेदार ठहराया गया है. 

अलका दीवान कौन हैं? डीसीडब्ल्यू की यह सदस्य सचिव दिल्ली महिला आयोग के 95 स्टाफ का वेतन तीन महीने लगातार कैसे रोक सकती हैं? उन्हें नियुक्त करने की ज़रूरत क्यों पड़ी? और सबसे बड़ी बात, उनका तर्क क्या है?

अलका दीवान वैट विभाग में विशेष आयुक्त और आईएएस अधिकारी हैं. उन्हें दिल्ली के लेफ्टिनेंट गवर्नर नजीब जंग ने इस साल 4 अक्टूबर को सीधा नियुक्त कर आयोग के सदस्य सचिव की अतिरिक्त जिम्मेदारी दी थी. आयोग की पूर्व सदस्य सचिव अर्चना अरोड़ा को निजी कारणों से अचानक आयोग छोड़ना पड़ा था. इनकी जगह मुख्यमंत्री के सुझाए नाम को अनदेखा करके लेफ्टिनेंट गवर्नर जंग ने दीवान को नियुक्त कर दिया.

दिल्ली महिला आयोग की अध्यक्ष स्वाति मालीवाल के मुताबिक, ‘सदस्य सचिव की अहम भूमिका होती है क्योंकि उसे नियमों का अनुभव होता है. बाक़ी सदस्यों के पास ज्यादा शक्तियां नहीं होतीं, सिवाय इसके कि वह बता सकती हैं कि आयोग के फैसले नियमानुकूल हैं या नहीं. वह खर्च को मंजूरी देती हैं, जिसमें वेतन का भुगतान भी शामिल है. पर मौजूदा हालात में दीवान ने ऐसा करने से इनकार कर दिया है.’

अलका दीवान की नियुक्ति पर सवाल

मालीवाल के मुताबिक दीवान की नियुक्ति गैरकानूनी है और इसके तीन कारण हैं.

1- वह वैट विभाग में आईएएस अधिकारी के पूर्णकालिक पद पर हैं और डीसीडब्ल्यू में पार्ट टाइम सदस्य सचिव नियुक्त की गई हैं. आयोग को फुल टाइम सदस्य सचिव की आवश्यकता थी. 

2- उन्हें मुख्यमंत्री और महिला एवं बाल विकास मंत्री ने नियुक्त नहीं किया. 

3- जब महिलाओं के मुद्दों की बात आती है, तो उनमें सहानुभूति और समझ कम नजर आती है. जब फील्ड में जाकर सर्वे करने की बात आई, तो दीवान ने दिल्ली के रैन बसेरों में औरतों की स्थिति का जायजा लेने के सर्वे को गैरजरूरी बताया. 

मालीवाल कहती हैं, ‘पूर्व सदस्य सचिव ने 40 का स्टाफ नियुक्त किया था, जो डीसीडब्ल्यू के कामकाज में अब भी मदद कर रहा है. दीवान डीसीडब्ल्यू को सरकारी महकमे के तौर पर ले रही हैं. एक पेन भी खरीदना हो या वेतन देना हो, तो सारी कार्रवाई वित्त विभाग से होनी होती है. हर आवेदन को स्वीकृत होने में 6 महीने तक लग सकते हैं. अगर ऐसा करते हैं, तो आयोग की स्वायत्तता खतरे में पड़ती है.’

मुख्यमंत्री को चिट्ठी

स्वाति लिखती हैं, 'कॉन्ट्रैक्ट पर काम कर रहे सभी स्टाफ का पिछले ढाई महीने से वेतन रोक दिया गया है. तथ्यों की पूरी जानकारी के बावजूद सदस्य सचिव आयोग के आदेशों को नहीं मान रही हैं, जिनमें 95 लोगों का वेतन भी शामिल है. इन लोगों को आयोग के कामकाज में मदद के लिए पार्ट टाइम नियुक्त किया गया था. ये लोग 181 विमन हेल्पलाइन, द मोबाइल हेल्पलाइन प्रोग्राम और रेप क्राइसिस सेल जैसे आयोग के महत्वपूर्ण कामों को निपटा रहे हैं. सदस्य सचिव के इस फैसले से आयोग के कामों में मुश्किलें आ रही हैं. इसका तुरंत निपटारा नहीं किया गया, तो आयोग सच में बंद हो जाएगा. 

खुद का किया धरा

जब पिछले साल जून में आयोग बनाया गया था, तब सांविधिक निकाय को महज 20 स्थाई सदस्य नियुक्त करने की शक्तियां थीं. फिर पुनर्गठन के साथ ही सदस्यों की संख्या 29 कर दी गई. हालांकि मालीवाल की और बड़ी योजनाएं थीं. उन्हें लगा कि यह स्टाफ रेप कैपिटल कही जाने वाली देश की राजधानी दिल्ली की शिकायतों को संभाल लेंगे. मगर एक महीने के भीतर उन्होंने एक अर्ज़ी तैयार की कि डीसीडब्ल्यू में 258 सदस्यों को स्थाई किया जाए. वह इसके अनुमोदन का इंतजार करती रहीं, पर कुछ नहीं हुआ और उनकी फाइल जैसा कि वे कहती हैं, ‘दिल्ली की नौकरशाही में अटक गई.’ 

चिट्ठी में यह भी लिखा

हाल में डीसीडब्ल्यू एक्ट के अधीन होने वाले सभी प्रोग्राम और गतिविधियां आयोग में कॉन्ट्रैक्ट पर काम करने वाले पार्ट टाइम वर्कर्स कर रहे हैं. 223 नए पद बनाने के लिए आयोग ने अक्टूबर 2015 और सितंबर 2016 में दो आवेदन किए थे, जो आज तक सरकार में लंबित पड़े हैं.

पिछले साल के अंत में डीसीडब्ल्यू ने तय किया कि अब वह और इंतजार नहीं करेगा और उसने स्टाफ को ‘आकस्मिक अनुबंध के आधार पर’ रखना शुरू कर दिया. काफी काम अटका पड़ा था. इनमें 181 विमन हेल्पलाइन, द रेप क्राइसिस सेल, फील्ड विजट आदि के काम शामिल थे. मालीवाल ने ऐसे 95 लोगों को रखा, कम से कम 12,000 रुपए का वेतन पर. इनमें से कई अनुभवी एक्टिविस्ट, तेजाब पीडि़ताएं, सेक्सुअल हिंसा की शिकार हैं, जो अपने जैसी पीडि़ताओं तक पहुंचना चाहती हैं. शुरुआत से योजना यह थी कि जैसे ही दिल्ली सरकार स्थाई स्टाफ के विस्तार की योजना को मंजूरी देती है, यह स्टाफ अनुबंधित नहीं रहेगा.

कॉन्ट्रैक्ट वर्कर्स ने क्या किया

इस दौरान डीसीडब्ल्यू ने 2015-2016 में 11,696 मुकदमे हैंडल किए. डीसीडब्ल्यू एक्ट के अधीन 55 से ज्यादा सिफारिशें कीं. तीन बड़े प्रोग्राम किए: सीआईडी वॉच एंड रिहेबिलिटेशन सेल, क्राइम अगेंस्ट विमन रिसर्च सेल और एंटी ह्यूमन ट्रेफिकिंग एवं रिहेबिलिटेशन सेल. 181 हैल्पलाइन में पिछले 6 महीने में 2.16 फोन कॉल्स सुने. रेप क्राइसिस सेल के वकीलों के माध्यम से 5733 यौन उत्पीडऩ के मामले हैंडल किए. 

मगर जैसे ही दीवान सदस्य सचिव बनीं, उन्होंने अनुबंध पर काम कर रहे स्टाफ की नियुक्तियों को गैरकानूनी बताकर उनका वेतन रोक दिया, जबकि उनके सहयोग से काफी काम हो रहा था. मगर सवाल यह है कि मालीवाल ने डीसीडब्ल्यू में स्थाई स्टाफ के विस्तार के लिए केजरीवाल का भरोसा क्यों नहीं जीता? दिल्ली सरकार के एक सबसे प्रभावी निकाय के उचित विस्तार के अनुरोध को क्यों नहीं माना गया?

वाह रे नौकरशाही

मालीवाल अपनी कोशिशों में थक चुकी हैं, कहती हैं, ‘हालात यह है कि यहां नौकरशाही का बड़ा बोलबाला है. दिल्ली सरकार के भीतर कई मुद्दे हैं, जिसकी वजह से हमें स्टाफ के लिए मिन्नतें करनी पड़ रही हैं. मेरी पूरी कोशिशों के बावजूद महिला एवं बाल विकास मंत्रालय में बहुत ही निचले स्तर पर मेरी फाइल अटकी हुई है. यह अभी तक मुख्यमंत्री के पास नहीं पहुंची है. ’ 

इस महीने के अंत में दीवान का कार्यकाल खत्म हो रहा है, वह सेवानिवृत्त हो रही हैं. पर सुना है कि लेफ्टिनेंट जनरल उन्हें फिर से नियुक्त करने की योजना बना रहे हैं, आयोग में सेवानिवृत्त आईएएस ऑफिसर के तौर पर फुल टाइम के लिए.

अगर सदस्य सचिव ‘काम से इनकार करे या कोई कदम उठाने में अक्षम’ हो तो डीसीडब्ल्यू एक्ट के अनुसार दिल्ली सरकार के पास सदस्य सचिव को नियुक्त करने और हटाने का अधिकार है. अगर डीसीडब्ल्यू का विवाद गहराता है, तो 95 स्टाफ, जिन्हें तीन महीने से वेतन नहीं मिला है, वे अपनी आवाज उठा सकते हैं. जब मानव अधिकारों के रक्षक ही भक्षक बन जाएं, तो यह राजनीतिक मतभेदों के दौर में चेताने वाली स्थिति है. 

First published: 30 November 2016, 7:57 IST
 
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