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नोटबंदी के 50 दिन: 'फैमिली बजट और बिगड़ चुका है, हम कर्ज़ में धंस चुके हैं'

श्रिया मोहन | Updated on: 29 December 2016, 8:26 IST
(श्रिया मोहन)
QUICK PILL
  • आज से ठीक 50 दिन पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश में नोटबंदी की घोषणा की थी. इसके बाद पूरे देश में एक असमंजस और अनिश्चय का वातावरण बन गया था. प्रधानमंत्री ने उस वक्त 50 दिन की मोहलत मांगी थी. तब कैच न्यूज़ के रिपोर्टरों ने हाट, बजारों, गांवों, लेबर चौराहों से लेकर लोगों के घरों का दौरा किया था. आज 50 दिन बाद उन स्थानों पर क्या परिवर्तन आया यह जानने के लिए बार फिर से हम उन्हीं स्थानोंं का दौरा कर रहे हैं.

नोएडा के सेक्टर 50 के पास बरौला गांव की प्रह्लाद कॉलोनी में कई संकरी गलियों और खुले नालों को पार करने बाद आता है आशा चौताले का घर. आशा पास की सोसाइटी के घरों में खाना बनाने का काम करती है, जबकि उनके पति राजेश एक निजी स्कूल में चपरासी का काम करते हैं. उनके चार बच्चे हैं जो स्कूल और कॉलेज में पढ़ाई करते हैं. 

बीपीएल कॉर्ड धारक आशा की आय नोटबंदी के कारण आधी-अधूरी रह गई है. अपने दो वर्ग फीट के रसोईघर में खड़ी आशा कहती हैं कि प्रधानमंत्री के आश्वासन के अनुसार 50 दिन के बाद भी हालात सामान्य नहीं हुए हैं. उनको प्रत्येक दिन अपना पेट काट-काट कर जीना पड़ रहा है. घर का बजट आधे से कम रह गया है और वे पहले से कहीं कर्ज में डूब चुके हैं. इसके बावजूद आशा को मोदी जी से कोई शिकायत नहीं है. बिना पूछे ही उसे यह जोड़ना जरूरी लगता है कि यह सब देश के व्यापक हित के लिए ही तो किया गया है.

कर्ज... और काम का भी टोटा

8 नवंबर को जब नोटबंदी की घोषणा की गई तब आशा महीनों की बीमारी से उबर रही थी. दो महीने तक लगातार बुखार और पैरों में सूजन के बाद से उसने नोटबंदी के बाद पहले सप्ताह में घरों में काम ढूंढ़ना शुरू किया. जब उन्होंने सेक्टर 50 के घरों में दरवाजा खटखटाया तो उसे निराशा का सामना करना पड़ा. 

गॉर्ड ने बताया कि सेठ के पास अपना खर्च चलाने के लिए ही पैसा नहीं है इसलिए कोई किसी को काम पर नहीं रख रहा. खाना बनवाने के लिए तो अभी भूल ही जाओ. आशा का कहना है कि सामान्यत: उसे एक दिन में ही काम मिल जाता था, लेकिन नोटबंदी के पहले महीने में तो कोई काम देने के लिए तैयार नहीं था.

अगले महीने में 20 दिसंबर को जाकर उसे नोएडा के सेक्टर 78 में जाकर काम मिला. लेकिन इस बीच उनके पति को उनके स्कूल वालों ने नवंबर महीने का वेतन नहीं दिया. और जब दिसंबर के महीना आधा निकल जाने पर वेतन दिया भी तो पुराने नोटों में दिया.

आशा ने बताया कि उनके पास इस समय कुछ नहीं था. विशेषकर इसलिए कि वो बीमार चल रही थी और नोटबंदी ने हमारे इस कर्ज को काफी बढ़ा दिया. हमने अपने ससुराल से पैसे उधार लिए. अपने भाई से पैसे उधार लिए. इस समय हम 10 हजार रुपये के कर्ज में हैं. 

अपने किराने वाले के हमें 6000 रुपये कर्ज चुकाने हैं. इसके अलावा 2000 रुपये बच्चों की स्कूल फीस बकाया है और मकान मालिक के पिछले माह के 3000 देने हैं. आशा का कहना है कि अगला पूरा साल और शायद इससे भी अधिक समय 21 हजार के इस कर्ज को चुकाते-चुकाते निकल जाएगा.

अब घर खर्च को संभालने की कठिन राह

आशा अब आने वाले महीने के खर्च का हिसाब लगा रही है. उसे तीन घरों में खाना बनाने से 7000 रुपये मिलेंगे. उसके पति को स्कूल से 5 हजार रुपये मिलते हैं. इसके अलावा उसकी सबसे बड़ी बेटी करिश्मा भी घर में ही स्कूली बच्चों को पढ़ा कर 2000 रुपये तक कमा लेती है. इसलिए अपनी आय और कर्ज के बीच के फासले को पाटने का उनके पास एक ही तरीका है कि वे अपने परिवार का बजट कम करें.

घर का खर्च का ब्योरा

घर का किराया : 3000 रुपये

भोजन और किराना : 6000 रुपये

तीन बच्चों की स्कूल फीस : 2000 रुपये

बुक्स, स्टेशनरी और 4 बच्चों के लिए कपड़े : 1500 रुपये

दवाईयां और बीमारी : 500 रुपये

विमुद्रीकरण के बाद हमारे भोजन और किराना का खर्चा घटकर लगभग आधा रह गया है. आशा ने बताया कि अब हम इस पर 3500 रुपये से अधिक खर्च नहीं करते हैं.

करिश्मा का कहना है कि अब घर में अधिकतर मसूर की दाल और आलू ही बनते हैं. पहले हम कभी—कभार बर्गर और चाइनीज भी बाहर से मंगा कर खा लेते थे. अब यह सब पूरी तरह से बंद हो गया है.

इस बार हममें से किसी ने ठंड के कोई कपड़े भी नहीं खरीदे हैं. आशा ने बताया कि हम पुराने कपड़ों से ही काम चला रहे हैं या फिर इंतजार कर रहे हैं कि हमें काम पर रखने वाला कोई परिवार अपने पुराने कपड़े हमें दे देगा. 

करिश्मा को भी अब महीने के लिए जो पॉकेट मनी मिलता था वो सब मिलना अब बंद हो गया है. करिश्मा ने बताया कि अब तो मां बस इतना ही देती है जितना कि आने—जाने के खर्च के लिए जरूरी होता है. अब तो कॉलेज दोस्तों के साथ बाहर थोड़ा—बहुत अल्पाहार के लिए बहुत ही कम पैसा होता है.

करिश्मा सरकारी पीजी कॉलेज में पढ़ती हैं. इसलिए उनकी पढ़ाई तो फ्री है. करिश्मा का कहना है कि, मोदी जी ने जो किया है वह बिल्कुल सही है. अब काले धन वाले लोगों की मुश्किल हो जाएगी. हमारी परेशानियां तो कुछ दिन में खत्म हो जाएंगी. 

करिश्मा अपने कॉलेज के एनसीसी में भी भाग लेती हैं. अब इसमें दूसरा साल है. वह पुलिस बनना चाहती हैं. करिश्मा ने बताया कि पहले वह वकील बनना चाहती थी. लेकिन मेरा परिवार उसकी पढ़ाई का खर्च नहीं उठा सकता था. इसलिए अब वह पुलिस बनना चाहती हैं. क्यों पूछने पर वह जोर देकर कहती है कि उसके पास इतनी ताकत तो हो कि वह निर्दोषों को न्याय दिला सकें.

First published: 29 December 2016, 8:26 IST
 
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