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ये दलीलें देकर SC में केजरीवाल के इन वकीलों ने लड़ी 'पॉवर' की लड़ाई

कैच ब्यूरो | Updated on: 4 July 2018, 12:18 IST

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को कहा कि दिल्ली के लेफ्टिनेंट-गवर्नर के पास कोई स्वतंत्र निर्णय लेने की शक्ति नहीं है और उन्हें मंत्रियों की परिषद की सलाह सुननी चाहिए. अदालत ने एक फैसले में कहा कि एल-जी का कार्यालय एक अवरोधक के रूप में कार्य नहीं कर सकता है, जिसका दावा राष्ट्रीय राजधानी की सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी को लंबे समय से कर रही है.

मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल पहले से एलजी पर सरकार के निर्णयों पर बाधा डालने के आरोप लगाते रहे हैं. नौकरशाहों के ट्रांसफर पर भी उन्होंने कई बार सवाल उठाये हैं. मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता में पांच न्यायाधीशीय संविधान बेंच ने पिछले साल 2 नवंबर को इस मामले में सुनवाई शुरू की थी. इस बेंच में जस्टिस ए के सिकरी, एएम खानविलकर, डीवाई चंद्रचूड , और अशोक भूषण शामिल थे.

जस्टिस डी.वाई. चंद्रचूड़ ने अपना फैसला सुनाते हुए कहा कि मंत्रिमंडल जनता के लिए जिम्मेदार है. उपराज्यपाल को मंत्रिमंडल की सलाह से ही काम करना चाहिए.चंद्रचूड़ ने कहा दिल्ली के चुने हुए प्रतिनिधि के कामों को रोज-रोज दखल नहीं दिया जा सकता है. केंद्र के प्रतिनिधि के जरिए फैसला नहीं लिया जा सकता है. उन्होंने कहा उपराज्यपाल को दिल्ली की चुनी हुई सरकार के फैसले को मानना होगा. लोकतांत्रिक देश में एलजी मंत्रिमंडल के संवैधानिक शक्तियों को नजरअंदाज नहीं कर सकते हैं.

 

आप सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में क्या कहा

1) आप ने सर्वोच्च न्यायालय बेंच के समक्ष तर्क दिया था कि सरकार के पास विधायी और कार्यकारी शक्तियां हैं.

2) यह कहा गया था कि मुख्यमंत्री और मंत्रिपरिषद के पास कानून बनाने के लिए कार्यकारी कानूनों को लागू करने के लिए विधायी शक्ति है.

3) AAP सरकार का ये भी तर्क था कि उपराज्यपाल कई प्रशासनिक फैसले ले रहे हैं और ऐसी स्थिति में लोकतांत्रिक तरीके से निर्वाचित सरकार के जनादेश को पूरा करने के लिये संविधान के अनुच्छेद 239 एए की व्याख्या जरूरी है.

4) दिल्ली सरकार ने एलजी पर "लोकतंत्र का मजाक" बनाने का आरोप लगाया था और कहा था कि वह या तो निर्वाचित सरकार के फैसले ले रहे थे या बिना किसी शक्ति के उन्हें प्रतिस्थापित कर रहे हैं.

सुप्रीम कोर्ट में केंद्र की दलील

1) केंद्र ने बेंच के सामने दलील दी थी कि दिल्ली सरकार के पास "विशेष" कार्यकारी शक्तियां नहीं हो सकतीं क्योंकि यह राष्ट्रीय हितों के खिलाफ होगी. केंद्र ने 1989 बालकृष्णन समिति की रिपोर्ट का हवाला दिया था, जिसमे दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा नहीं देने के कारणों का उल्लेख किया गया था.

2) केंद्र ने तर्क दिया था कि दिल्ली सरकार द्वारा कई अवैध सूचनाएं जारी की गई थीं और उन्हें उच्च न्यायालय में चुनौती दी गई थी.

3) केंद्र ने संविधान के 1991 राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली अधिनियम और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली सरकार के कामकाज के नियमों का हवाला देते हुए कहा था कि राष्ट्रपति केंद्र सरकार और उपराज्यपाल को राष्ट्रीय राजधानी के प्रशासनिक मामले में प्राथमिकता हासिल है.

मामले में शामिल बड़े वकील

इस मामले में जो वकील बहस कर रहे थे उनमे पी चिदंबरम, गोपाल सुब्रमण्यम, राजीव धवन और इंदिरा जयसिंग ने अरविंद केजरीवाल सरकार के लिए तर्क दिया था. केंद्र की एनडीए सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल (एएसजी) मनिंदर सिंह ने तर्क रखे थे.

ये भी पढ़ें : केजरीवाल vs LG: सुप्रीम कोर्ट का फैसला, चुनी सरकार के फैसले में LG बाधा नहीं डाल सकते

First published: 4 July 2018, 12:16 IST
 
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