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पेंशन के लिए संघर्षरत DU के टीचर और कर्मचारी

प्रणेता झा | Updated on: 22 January 2017, 8:54 IST
(फ़ाइल फोटो )

दिल्ली विश्वविद्यालय के रिटायर्ड प्राध्यापकों और गैर शैक्षणिक कर्मचारियों ने पेंशन की मांग को लेकर धरना-प्रदर्शन किया है. इनकी मांग है कि सैकड़ों पूर्व कर्मचारियों के लिए पेंशन जारी की जाए. ये रिटायर्ड कर्मचारी अपनी जरूरतों को पूरी करने के लिए जद्दोजहद कर रहे हैं.

उनकी मांग है कि विश्वविद्यालय दिल्ली हाईकोर्ट की डबल पीठ द्वारा गत 24 अगस्त 2016 को दिए उस आदेश को क्रियान्वित करे जिसमें निर्देश दिया गया था कि सभी रिटायर्ड कर्मचारियों को जनरल प्राविडेन्ट फंड (जीपीएफ) योजना के तहत पेंशन दी जाए. चाहे उन्होंने कॉन्ट्रीब्यूटरी प्राविडेन्ट फंड (सीपीएफ) योजना से जीपीएफ में जाने का विकल्प अपनाया हो या नहीं.

लगभग 5०० से ज्यादा पूर्व कर्मचारी विश्वविद्यालय के उत्तरी परिसर स्थित आर्ट संकाय के मुख्य द्वार पर दोपहर 1 बजे से 4 बजे तक धरना-प्रदर्शन के लिए जमा हुए थे. उप कुलपति के आदेश पर भारी पुलिस बल तैनात किया गया था. धरने का आयोजन संयुक्त रूप से दिल्ली यूनीवर्सिटी टीचर्स एसोसिएशन (डूटा), दिल्ली यूनीवर्सिटी कालेज कर्मचारी यूनियन, दिल्ली यूनीवर्सिटी कॉलेज लैब स्टाफ एसोसिएशन, एससी/एसटी इम्लाइज एसोसिएशन और सामाजिक न्याय मोर्चा ने किया था.

बाद में डूटा की अध्यक्ष नन्दिता नारायण की अध्यक्षता में एक प्रतिनिधिमंडल उप कुलपति योगेश त्यागी से मिलने उनके कार्यालय गया, पर वीसी मौजूद नहीं थे. नारायण ने बताया कि उन्हें अपना ज्ञापन वीसी के कार्यालय में दे दिया है. अब उनकी योजना प्रधानमंत्री को भी ज्ञापन देने की है.

सीपीएफ बनाम जीपीएफ

चौथे वेतन आयोग की सिफरिशों के आधार पर केन्द्र सरकार ने 01 मई 1986 को अपने सभी कर्मचारियों के लिए या 01 जनवरी 1986 के बाद नियुक्त कर्मचारियों को जीपीएफ पेंशन योजना के तहत कवर करने का निर्देश दिया था. कर्मचारी जो सेवा में थे, या 01 जनवरी 1986 के पहले नियुक्त हुए थे, उन्हें सीपीएफ के साथ इसका या तो विकल्प जारी रखने या इसे छोड़कर जीपीएफ योजना का लाभ लेने का भी आदेश दिया गया था. 30 सितम्बर 1987 तक उन्हें अपनी इच्छा से अवगत करा देना था.

1998 तक, दिल्ली विश्वविद्यालय ने अपने स्टाफ को  दोनों विकल्पों में से एक चुनने के कुछ और मौके दिए. कुछ कर्मचारियों ने शुरुआत में सीपीएफ का विकल्प अपनाया. इस योजना के तहत रिटायरमेन्ट पर आकर्षक ब्याज राशि के साथ एकमुश्त बड़ी रकम मिलनी थी. भारी संख्या में गैर-शैक्षणिक कर्मचारियों ने इनमें से कोई भी विकल्प नहीं चुना. मानो कि उन्हें इस बारे में साधारण तौर पर कुछ पता ही नहीं है.

1998 मे पांचवां वेतन आयोग आया. इसमें वेतन बहुत ज्यादा बढ़ गया, तब उन्हें जीपीएफ के महत्व और उसके लाभों का पता चला. इसमें महंगाई के हिसाब से पेंशन बढ़नी थी, जबकि सीपीएफ पर ब्याजदर गिरती गई. इस बीच जिन्होंने कोई भी विकल्प नहीं अपनाया था, वे सरकारी आदेशों के प्रतिकूल अपना योगदान सीपीएफ में देना जारी रखे रहे.

2006 में कुछ अध्यापकों ने कोर्ट की शरण ली. इनमें दोनों तरह के लोग शामिल थे. जिन्होंने सीपीएफ का विकल्प अपनाया था और जिन्होंने नहीं भी अपनाया था. 

30 अप्रैल 2014 को, दिल्ली हाईकोर्ट की एकल पीठ ने व्यवस्था दी कि जिन्होंने कोई विकल्प नहीं अपनाया है या जिन्होंने 30 सितम्बर 1987 की तयतिथि के पहले जीपीएफ का विकल्प चुन लिया है, उन्हें पेंशन योजना के तहत कवर किया जाना चाहिए. जिन्होंने इस तारीख के बाद जीपीएफ का विकल्प चुना था, उन्हें इस दायरे में नहीं लिया गया. हालांकि दिल्ली विश्वविद्यालय ने 14 अगस्त 2014 को एकल पीठ के आदेश के खिलाफ अपील कर दी.

किरोड़ीमल कालेज के असिस्टेंट प्रोफेसर और दिल्ली विश्वविद्यालय अकादमिक काउंसिल के सदस्य रुद्राशीष चक्रवर्ती कहते हैं कि तत्कालीन वीसी ने दिनेश सिंह ने अपने ही स्टाफ के खिलाफ प्रतिशोध की भावना से काम किया. यह वही साल था जब दिल्ली विवि के शिक्षकों ने चार वर्षीय अंडर ग्रेजुएट प्रोग्राम को वापस लेने का दबाव बनाया था और इस मुद्दे पर घमासान चल रहा था. अंतिम तौर पर, 24 अगस्त 2016 को कोर्ट ने आदेश दिया कि जीपीएफ का लाभ लेने के लिए सभी पात्र हैं.

बिना पेंशन के ही दिन कट रहे

दिल्ली हाईकोर्ट के आदेश को आए पांच महीने हो चुके हैं. लेकिन कई बार स्मरण पत्र देने और अनुरोध करने के बाद भी दिल्ली विश्वविद्यालय ने अपने तीन हजार प्राध्यापकों और गैर-शैक्षणिक कर्मचारियों के लिए पेंशन जारी नहीं की है. एक रिटायर्ड गैर-शैक्षणिक 63 वर्षीय कर्मचारी ओम प्रकाश शर्मा, जो रामजस कालेज में 1975 से लेकर 2014 तक तकनीकी सहायक रहे हैं, उन लोगों में शामिल हैं, जिन्होंने कोई भी विकल्प नहीं अपनाया था. उन्हें विकल्पों के बारे में बताया नहीं गया था और वे तब इसके होने वाले परिणामों से वाकिफ भी नहीं थे. 

वह और उनकी पत्नी अब पेंशन न मिलने के कारण आर्थिक संकट से जूझ रहे हैं. शर्मा कहते हैं कि मैं जुलाई 2014 में रिटायर्ड हो गया. तब से मुझे छोटी सी भी राशि नहीं मिली है सिवाय ग्रेच्युटी के. ग्रेच्युटी भी बहुत कम मिली है. मैं कुल सचिव से मिलने गया था, पर वहां कुछ नहीं हुआ. 

वह कहते हैं कि मेरी पत्नी आजीवन गृहणी रही हैं. मैं अपने बेटे के साथ रह रहा हूं. बेटा एमसीडी स्कूल में पढ़ाता है. शर्मा राजस्थान के हैं और उनका दिल्ली में कोई मकान नहीं है. जब वह दिल्ली विश्वविद्यालय में कर्मचारी थे, तब वे रामजस कालेज के स्टाफ क्वार्टर में रहते थे.

बड़ी संख्या में अन्य कर्मचारी जो कई साल पहले सेवानिवृत्त हो चुके हैं, उन्हें न तो सीपीएफ के तहत कोई रकम मिल सकी है और न ही जीपीएफ के तहत कोई पेंशन. कानूनी लड़ाई लडऩे की वजह से इसमें पेंच फंसा हुआ है. शर्मा कहते हैं कि मामला न्यायालय में विचाराधीन है. इस कारण से जब तक कोई फैसला नहीं हो जाता, वे हमें कोई भी भुगतान नहीं कर सकते. चक्रवर्ती कहते हैं कि विश्वविद्यालय प्रशासन पेंशन जारी न करने का कोई कारण भी नहीं बता रहा है और वह यूजीसी के निर्देशों के इंतजार में है.

चक्रवर्ती कहते हैं कि विश्वविद्यालय हाईकोर्ट के आदेशों को मानने के लिए बाध्य है. किसी की भी पेंशन रोकना अब गैर-कानूनी है. यूजीसी भी हाईकोर्ट के आदेशों से परे नहीं जा सकता, आदेशों का उल्लंघन नहीं कर सकता. वह कहते हैं कि यह उन लोगों के लिए जीवनयापन का सवाल है जिन्होंने यूनीवर्सिटी के लिए अपने जीवन के चार दशक गुजार दिए. और वे अब अपने जीवनयापन के लिए संघर्ष कर रहे हैं. 

डूटा अध्यक्ष नन्दिता नारायण का कहना है कि हम अपनी पीड़ा को लेकर सभी पार्टियों के सांसदों से मिलने की योजना बना रहे हैं ताकि वे संसद के सत्र में इस मामले को उठा सकें.

First published: 22 January 2017, 8:54 IST
 
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