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इस 'गुदड़ी के लाल' की उपलब्धि से हर कोई है हैरान, पिता आज भी बीनता है कूड़ा

कैच ब्यूरो | Updated on: 21 July 2018, 17:55 IST

सफलता सुविधाओं की मोहताज नहीं होती इसके लिए तपस्या और निरंतर संघर्ष की जरुरत होती है. भयानक गरीबी के थपेड़ों को झेलता एक प्रतिभाशाली लड़का आशाराम ने अपने कठिन परिश्रम से मेडिकल के लिए देश की सबसे प्रतिष्ठित "एम्स" की प्रवेश परीक्षा पास कर ली है. अब एम्स में MBBS की पढ़ाई कर डॉक्टर बनेंगे. आशाराम के पिता कूड़ा-कचरा, पन्नी, प्लास्टिक बीनकर अपना घर का खर्च चलाते हैं.

एम्स में हुआ सेलेक्शन

इस साल आयोजित ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (AIIMS) के एंट्रेंस एग्जाम में उन्होंने 4.5 लाख उम्मीदवारों के बीच 707वीं रैंक  प्राप्त किया और ओबीसी केटेगरी में 2 लाख परीक्षार्थियों के बीच 141वा पोजीशन हासिल किया है.

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उन्होंने जोधपुर के एम्स मेडिकल कॉलेज में MBBS कोर्स में एडमिशन ले लिया है और उनकी पढ़ाई पूरी होते ही वे डॉक्टर बन जायेंगे. आशाराम का सपना है कि डॉक्टर बन कर देश की सेवा करें और गरीबी के कारण किसी के इलाज में रूकावट न आये. आशाराम को "गुदड़ी का लाल" कहना गलत नहीं होगा.  

झोपड़ी में रहता है परिवार

आशाराम मध्य प्रदेश के देवास से करीब 40 किलोमीटर दूर विजयागंज मंडी के रहने वाले हैं. उनके पिता का नाम रणजीत चौधरी और माता ममता बाई है. उनका एक छोटा भाई भी है जो नवोदय विद्यालय में पढ़ाई कर रहा है. साल 2000 में जन्मे आशाराम ने बचपन से ही गरीबी के झंझावात को झेला है. कई रातें उन्होंने भूखे पेट रहकर गुजारी है. उनके पास सिर्फ एक घास-फूस की झोपडी है. उनके पिता कहते हैं उनके पास कुछ भी धन दौलत नहीं है लेकिन सबसे बड़ी संपत्ति उनका बेटा ही है.

बचपन में किया ऐसा कारनामा

आशाराम बचपन से ही प्रतिभाशाली हैं, छठी क्लास में उनका चयन नवोदय विधालय में हुआ फिर दक्षिणा फाउंडेशन पुणे की परीक्षा पास कर स्कॉलर- शिप हासिल की. इस साल मेडिकल एडमिशन के लिए आयोजित NEET एग्जाम में भी उनका चयन हुआ है. इतना ही नहीं आशाराम, किशोर वैज्ञानिक प्रोत्साहन योजना में रिसर्च साइंटिस्ट भी चुने जा चुके हैं. जर्मनी के सिल्वर जोन फाउंडेशन संस्थान में भी उनका सेलेक्शन हो चुका है, जिसमें 332वीं इंटरनेशनल रैंक उन्हें हासिल हुई थी.

First published: 21 July 2018, 17:54 IST
 
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