Home » मनोरंजन » Catch Hindi: alia bhatta, kareena kapoor, shahid kapoor and Diljit Dosanjh starer udta punjab film reveiw
 

उड़ता पंजाब से पंजाब का कम, हिंदी सिनेमा का सच ज्यादा उजागर होता है

रंगनाथ सिंह | Updated on: 10 February 2017, 1:49 IST
(पोस्टर)

कहते हैं कि एक जमाने में फिल्म प्रोड्यूसर लेखकों को किसी विदेशी फिल्म की सीडी पकड़ा दिया करते थे और कहते थे इस पर हिन्दी फिल्म लिख दो. इंटरनेट क्रांति के बाद जमाना तेजी से बदला, और हिन्दी फिल्म लेखक और निर्देशक अपनी-अपनी विदेशी फिल्मों की सीडी (या सीडियां) खुद साथ लिए चलते हैं. 'उड़ता पंजाब' कई विदेशी फिल्मों की सीडियों से प्रेरित हिन्दी फिल्मों की कड़ी में नया नाम है. 

'उड़ता पंजाब' देखने के बाद सबसे पहला सवाल ज़हन में ये आता है कि आखिर केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड के चेयरमैन पहलाज निहलानी को इस फिल्म पर इतनी आपत्ति क्यों थी? गाली-गलौज को छोड़ दिया जाए तो इस फिल्म में ऐसा कुछ नहीं है जो पंजाबी दर्शकों को सत्ताधारी दल के खिलाफ भड़का सके या उन्हें पंजाब की नशाखोरी की समस्या के बारे में कोई नई जानकारी दे सके. 

उड़ता पंजाब: तीन साल में बरामद हुआ 3.8 करोड़ किलो ड्रग्स

2016 में तो माँ-बहन की गालियाँ भी हिन्दी सिनेमा के लिए बहुत नई नहीं रहीं. करीब 22 साल पहले 1994 में एक 11 साल की बच्ची फूलन देवी(बैंडिट क्वीन) ने 70 एमएम के पर्दे पर भारतीय दर्शकों के सामने शायद पहली बार कहा, "मरदन तो होत ही मादर... हैं." उसके बाद बीप के साथ भी, बीप के बिना भी न जाने कितनी गालियाँ रुपहले पर्दे पर दी जा चुकी हैं. 

कुल मिलाकर 'उड़ता पंजाब' एक वनटाइम वाच फिल्म है, बशर्ते आपको गालियों से परहेज न हो. ये फिल्म जिस कथित 'यथार्थचित्रण' कारण से विवाद में आई उससे इसका ज्यादा लेना-देना नहीं है. फिल्म देखकर साफ पता चलता है कि निर्देशकों को इस थीम पर फिल्म बनानी थी और पंजाब उसके लिए सुविधाजनक बैकग्राउंड भर था.

ऐसा लगता है कि ये फिल्म इसके लीड कैरेक्टर टॉमी सिंह (जो सीधे सीधे हनी सिंह की नकल लगता है) के लिए बनाई गई है. जिसके लिए निर्देशक-लेखक हिंदी सिनेमा के सभी प्रचलित क्लीशे का इस्तेमाल करते नजर आते हैं. इस फिल्म ने एक बार फिर साबित कर दिया कि रिसर्च के मामले में बॉलीवुड के वर्तमान लेखक काफी कच्चे हैं. क्या ये महज संयोग है कि पिछले कुछ सालों में यथार्थवादी चित्रण के लिए सराही गई हिंदी फिल्में किसी न किसी किताब पर आधारित थीं. (बैंडिट क्वीन पत्रकार माला सेन की, ब्लैक फ्राइडे पत्रकार एस हुसैन जैदी और हैदर बशारत पीर की किताब पर आधारित थी).

'उड़ता पंजाब से उड़ता मजाक तक...'

'उड़ता पंजाब' इस कदर क्लीशेड है कि गाली-गलौज करने वाले टॉमी सिंह को छोड़ दिया जाए तो फिल्म की लीड कैरेक्टर में शायद ही कुछ नयापन बचे (जनार्दन जाखड़ रॉकस्टार था, लेकिन माँ-बहन नहीं करता था). किसी हिन्दी फिल्म का पॉप, रॉक और रैप सिंगर पंजाबी न हो तो हैरत होगी और ड्रग्स पाकिस्तान के रास्ते न आए तो और भी हैरत होगी. जाहिर है इन मामलों में निर्देशक ने दर्शकों के कॉमन सेंस के संग कोई छेड़छाड़ नहीं की है.

फिल्म के निर्देशकों को इस बात से शायद कोई वास्ता नहीं कि देश में सबसे ज्यादा ड्रग्स के लती (2011 से 2014 के आंकड़ों के अनुसार) मणिपुर में हैं. इस मामले में पंजाब दूसरे नंबर पर है. वहीं नशे के शिकार शीर्ष पांच राज्यों में तीन (मणिपुर, मिजोरम और असम) पूर्वोत्तर भारत में स्थित हैं. लेकिन हिंदी सिनेमा के नक्शे में पूर्वोत्तर भारत न पहले कभी था, न आज है. सबसे बड़ी बात पंजाब या पंजाबियों के सिवा इस देश में कोई और गबरू हो, कम से कम हिंदी सिनेमा ये संभव नहीं दिखता. 

उड़ता पंजाब पर सेंसर से खत्म नहीं होगी पंजाब की ड्रग्स समस्या

फिल्म के निर्देशक को इस बात से भी कोई वास्ता नहीं लगता कि भारत में ड्रग्स की तस्करी सबसे ज्यादा भारत-बांग्लादेश सीमा के रास्ते होती है. उसके बाद भारत-नेपाल, फिर भारत-म्यांमार और उसके बाद भारत-पाकिस्तान बॉर्डर के रास्ते.

फिल्म पंजाब की ड्रग्स की समस्या, उसके पीछे का कारण और उसके असर सभी को अति-सरलीकरण के साथ पेश करती है. फिल्म के निर्देशक के अलावा शायद ही किसी को इसपर यकीन हो कि ड्रग्स की लोकप्रियता के पीछे सबसे बड़ा कारण पॉप स्टार टॉमी सिंह है! या नशे के कारोबार का असल जिम्मेदार एक 'लालची' नेता और घूसखोर पुलिसवाले हैं.

'उड़ता पंजाब' का स्तर देखते हुए निर्देशक से इस तरह के सवाल पूछना बेकार है कि भारत के 'अशांत' रहे इलाकों (पंजाब, पूर्वोत्तर और कश्मीर इत्यादि) में सिंथेटिक नशे का कारोबार क्यों ज्यादा फला-फूला? क्या इन इलाकों में नशे के प्रसार में भारत या पाकिस्तान की सरकारी मशीनरी भी शामिल रही है? क्या सरकारी तंत्र ने नशे का इस्तेमाल नौजवानों को काबू में करने के लिए किया?

फिल्म कहानी के स्तर पर जितनी साधारण है उतनी ही क्राफ्ट के स्तर पर भी. हिंदी सिनेमा के नए निर्देशकों की फिल्में  टैरेनटीनो-इनियारितु-सोडेरबर्ग का पाइरेटेड संस्करण नजर आती हैं. वरना हर दूसरा भारतीय इंडी फिल्म निर्देशक तीन समानांतर कहानियों को क्लाइमेक्स में मिलाने के लिए बेताब नज़र नहीं आता. 

अनुराग कश्यप: ‘उड़ता पंजाब’ पर कैंची कलात्मकता का कत्ल

'उड़ता पंजाब' में भी निर्देशक लगभग जबरन तीनों प्लॉट को क्लाइमेक्स में एक ही जगह ले आता है. जाहिर है उसके पास कोई ऑर्गेनिक क्लामेक्स नहीं था. शर्मनाक है लेकिन सच है कि हिंदी फिल्मों के ज्यादातर नए निर्देशक अपना मौलिक फिल्म एस्थेटिक या सिग्नेचर विकसित नहीं कर सके हैं.

'उड़ता पंजाब' में लगाई गई 'यथार्थवाद' की छौंक के कारण, जो दर्शक पंजाब और उसकी ज़मीनी हक़ीकत से जितना दूर होगा उसे ये फिल्म उतनी 'यथार्थवादी' लगेगी. जो करीब होंगे वो खुद को छला हुआ महसूस करेंगे.

ऐसे में 'उड़ता पंजाब' से पंजाब का सच कम और हिंदी सिनेमा का सच ज्यादा पता चलता है.

First published: 17 June 2016, 6:09 IST
 
रंगनाथ सिंह @singhrangnath

पेशा लिखना, शौक़ पढ़ना, ख़्वाब सिनेमा, सुख-संपत्ति यार-दोस्त.

पिछली कहानी
अगली कहानी