Home » मनोरंजन » Amrish Puri: positive character impact as well as negative act
 

अमरीश पुरी की पुण्यतिथि: मोगैंबो को गुजरे एक दशक हुआ

कैच ब्यूरो | Updated on: 12 January 2016, 14:37 IST
QUICK PILL
  • अमरीश 12 जनवरी 2005 को दुनिया को अलविदा कह गए. उनकी 10वीं पुण्यतिथि पर कैच अपने पाठकों को उनसे जुड़ी कई ऐसी बातों से रूबरू करवाने जा रहा है जिन्हें शायद ही लोग जानते हों.
  • उन्हें टेलिवजन विज्ञापन मिलने लगे और 40 साल की उम्र में वो हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में पहुंचे. उन्होंने हिंदी के अलावा कन्नड़, मराठी, हॉलीवुड, पंजाबी, मलयालम, तेलुगू और तमिल फिल्मों में भी काम किया.

मोगैंबो खुश हुआ और डॉन्ग कभी रॉन्ग नहीं होता. इस डॉयलॉग ने अमरीश पुरी को बॉलीवुड की दुनिया के श्रेष्ठ खलनायकों में शामिल किया. 22 जून 1932 को पंजाब में पैदा हुए अमरीश 12 जनवरी 2005 को दुनिया को अलविदा कह गए. उनकी 10वीं पुण्यतिथि पर कैच अपने पाठकों को उनसे जुड़ी कई ऐसी बातों से रूबरू करवाने जा रहा है जिन्हें शायद ही लोग जानते हों.

हिंदी फिल्म इंडस्ट्री की दमदार शख्सियत अमरीश पुरी को 1987 में रिलीज हुई फिल्म मिस्टर इंडिया में अपने किरदार मोगैंबो के लिए काफी प्रसिद्धि मिली थी. जबकि 1984 में हॉलीवुड फिल्म इंडियाना जोंस एंड द टेंपल ऑफ डूम में उनकी मोला राम की भूमिका ने भी दुनिया भर को उनके सशक्त अभिनय से रूबरू करवाया. 

अमरीश न केवल खलनायक की भूमिका में खूब चर्चा में रहे बल्कि उन्होंने चरित्र अभिनेता के रूप में भी दर्शकों में अपना लोहा मनवाया. उनकी भारी भरकम आवाज, अभिनय के दौरान अपनी बड़ी-बड़ी आंखों को घुमाना और हर बार एक नए अंदाज की अदाकारी उन्हें हर फिल्म में तरोताजा दिखाती थी. शिमला के बीएम कॉलेज से पढ़ाई के बाद उन्होंने अपना कर्मचारी राज्य बीमा निगम में नौकरी से शुरू किया. लेकिन उन्हें यह उतना जमा नहीं और उनके अंदर का अभिनेता उन्हें रंगमंच और नाटकों की ओर ले गया. जहां उन्होंने अपने हाथ आजमाए.

साभार: पीपुल एंड हिस्ट्री

अमरीश पुरी से जुड़ी खास बातें

  1. मदन पुरी के भाई अमरीश ने नौकरी के साथ ही सत्यदेव दुबे द्वारा लिखे नाटकों में अभिनय किया. उन्होंने पृथ्वी थियेटर में काम करना शुरू किया. उनके अंदर का कलाकार इतना सशक्त था कि रंगमंच पर अभिनय के लिए 1979 में उन्हें संगीत नाटक अकादमी अवार्ड मिला.
  2. थियेटर के काम के चलते उन्हें टेलिवजन विज्ञापन मिलने लगे और 40 साल की उम्र में वो हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में पहुंचे. उन्होंने हिंदी के अलावा कन्नड़, मराठी, हॉलीवुड, पंजाबी, मलयालम, तेलुगू और तमिल फिल्मों में भी काम किया. 1967 से लेकर 2005 तक उन्होंने 400 से ज्यादा फिल्मों में अभिनय किया. 
  3. 1970 के दशक में अमरीश सहायक किरदार के रूप में फिल्मों में नजर आने लगे. फिल्मों में नायक के रूप में अभिनय की उनकी ख्वाहिश पूरी नहीं हो सकी और उन्हें खलनायक के किरदार ही ज्यादा मिलने लगे. 1980 की फिल्म हम पांच में प्रमुख खलनायक की भूमिका में उन्हें अच्छी पहचान मिली और उन्हें फिल्मों में प्रमुख किरदार में लिया जाने लगा. 
  4. 1982 में सुभाष घई की सुपरहिट फिल्म विधाता में उन्होंने जगावर चौधरी के खलनायक का अभिनय किया. इसी वर्ष उन्होंने दिलीप कुमार और अमिताभ बच्चन अभिनीत फिल्म शक्ति में जेके का किरदार निभाया. अगले ही साल सुभाई घई ने उन्हें अपनी फिल्म हीरो के मुख्य खलनायक पाशा के रूप में पेश किया. 
  5. उनके खलनायकी के यादगार अभिनय की झलक मिस्टर इंडिया में मोगैंबो, विधाता में जगावर, मेरी जंग में ठकराल, त्रिदेव में भुजंग, घायल में बलवंत राय, दामिनी में बैरिस्टर चड्ढा और करन अर्जुन में ठाकुर दुर्जन सिंह में जमकर दिखी. 
  6. दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे के बाबू जी जो कहते हैं जा सिमरन जी ले अपनी जिंदगी, फूल और कांटे, गर्दिश, परदेस, विरासत, घातक और चाइना गेट जैसी फिल्मों में उन्होंने खलनायकी से अलग अपने चरित्र अभिनेता के किरदार को बखूबी पेश किया. 
  7. 1986 में मेरी जंग फिल्म के लिए सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता का फिल्मफेयर अवार्ड, 1994 में सूरज का सातवां घोड़ा के लिए सिडनी फिल्म महोत्सव और सिंगापुर अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सव में सर्वश्रेष्ठ अभिनेता, 1997 में घातक फिल्म के लिए सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता का फिल्मफेयर, 1998 में विरासत के लिए सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता का फिल्मफेयर भी उन्हें दिया गया.

First published: 12 January 2016, 14:37 IST
 
पिछली कहानी
अगली कहानी