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बाजीराव मस्तानी रिव्यूः कहानी कम, शो-पानी ज्यादा

रंगनाथ सिंह | Updated on: 10 February 2017, 1:47 IST
इस शुक्रवार को रिलीज हुई संजय लीला भंसाली की बाजीराव मस्तानी को फिल्म समीक्षकों ने मिलाजुला रिव्यू दिया है.

भंसाली ने हिंदी सिनेमा में अपनी एक स्टाइल विकसित कर ली है. इंडियन एक्सप्रेस की फिल्म क्रिटिक शुभ्रा गुप्ता लिखती हैं, "पहले फ्रेम से आप जान जाते हैं कि ये संजय लीला भंसाली की फिल्म है. हर चीज़ बढ़ी-चढ़ी है, आलीशान से भी बढ़कर, चौंधिया देने वाली."

फिल्म पेशवा बाजीराव प्रथम और मस्तानी की किंवदंति पर आधारित है. स्क्रॉल की क्रिटिक नंदिनी रामनाथ के अनुसार, "प्रकाश कपाड़िया का स्क्रिनप्ले मराठी लेखक नागनाथ एस इनामदार के मराठी नॉवेल 'राऊ' और दूसरे ऐतिहासिक दस्तावेजों पर आधारित है."

फिल्म के कलाकारों ने अपने किरदार के संग न्याय किया है लेकिन वो भारी-भरकम पोशाक और जुमलेबाजी में दब कर रह जाते हैं

हिंदी सिनेमा में पीरियड फिल्में कॉस्टयूम और भव्य सेट का ड्रामा बनकर रह जाती हैं. उनमें इतिहास कम होता है और ड्रामा ज़्यादा.

नंदिनी रामनाथ लिखती हैं, "भंसाली को ऐतिहासिक सच्चाई में कम और हिंदी सिनेमा में अपनी जगह पाने में ज्यादा रुचि है."

मस्तानी की तस्वीर(राजाकेलकर म्यूज़ियम से साभार)

राजाकेलकर म्यूज़ियम

बाजीराव और मस्तानी के मिथकीय इतिहास में कम और प्यार-मुहब्बत पर ज्यादा फ़ोकस करने के कारण ही शायद ये फिल्म कुछ समीक्षकों को बोझिल लगी.

शुभ्रा गुप्ता ने लिखा है, "जल्द ही आप सारे दिखावे से ऊब जाते हैं. सारी भव्यता चुक जाती है. आप एक सचमुच बांधने वाली स्टोरी के लिए तरसने लगते हैं. फिल्म में बहुत खूबसूरत कलाकार हैं. सभी ने अपने किरदार के संग न्याय किया है लेकिन वो भारी-भरकम पोशाक और जुमलेबाजी में दब कर रह जाते हैं. बाजीराव में शानदार ऐतिहासिक फिल्म होने की संभावना थी. लेकिन ये कॉस्ट्यूम ड्रामा बनकर रह जाती है, जिसमें ढेर सारी पोशाकें, बहुत सारी उत्तेजना, खोखला ड्रामा और मामूली कहानी है."

भंसाली की मुग़ल-ए-आज़म परफेक्ट नहीं है लेकिन ये यादगार, मुग्ध कर देने वाले सिनेमाई विज़न का जगमगाता नगीना है

हिंदुस्तान टाइम्स की फिल्म क्रिटिक श्वेता कौशल ने भी फिल्म के डॉयलॉग के बनावटीपन पर ध्यान दिलाया है.

श्वेता लिखती हैं, "भंसाली के पास एक शानदार प्रेम कहानी का विस्तृत दायरा था, लेकिन उन्होंने इस थकाऊ बना दिया. जो आत्मरति की शिकार नाटकीय 'डॉयलॉगबाज़ी' से दबी हुई है. फिल्म अपने ही वजन से झुकी और सुस्त हो गयी लगती है."

बाजीराव मस्तानी जिन समीक्षकों को औसत से अच्छी लगी है उन्हें फिल्म का लुक्स और सभी कलाकारों की एक्टिंग पसंद आयी है.

फर्स्टपोस्ट की गायत्री गौरी ने लिखा है, "भंसाली की मुग़ल-ए-आज़म परफेक्ट नहीं है लेकिन ये यादगार, मुग्ध कर देने वाले सिनेमाई विज़न का जगमगाता नगीना है."

एनडीटीवी के सैबल चटर्जी लिखते हैं, "इस फिल्म में भंसाली अपने सर्वश्रेष्ठ रूप में नहीं फिर भी वो आमफ़हम से ऊपर बने रहने में सफल रहे हैं."

जहां कुछ क्रिटिक ने फिल्म को सुस्त माना है वहीं सैबल लिखते हैं कि इस इंद्रधनुषी और नाटकीय फिल्म में कोई भी उबाऊ लम्हा नहीं आता.

फिल्म की कहानी में काफी गुंजाइश थी लेकिन 'बाजीराव मस्तानी' के कथानक में कसाव कम विज़ुअल पॉप अप ज्यादा हैं

भारतीय समीक्षकों के इतर फिल्म को आउटसाइडर के नज़रिए से देखने के लिए न्यूयॉर्क टाइम्स की फिल्म क्रिटिक रैशेल साल्टज़ की समीक्षा थोड़ी तीखी है.

रैशेल लिखती हैं, "फिल्म की कहानी में काफी गुंजाइश थी लेकिन 'बाजीराव मस्तानी' के कथानक में कसाव कम विज़ुअल पॉप अप ज्यादा हैं. फिल्म के मुख्य किरदार शायद ही कहीं विश्वसनीय नज़र आते हैं. वो कहीं भी बधी-बधाई धारणाओं को तोड़ते नहीं नज़र आते. न वो उनके महल और पोशाक जितने प्रभावशाली नज़र आते हैं.

पेशवा बाजीराव प्रथम (राजाकेलकर म्यूज़ियम)

राजाकेलकर म्यूज़ियम

कुछ क्रिटिक ने फिल्म के बारे में लिखा है कि बाजीराव मस्तानी की कहानी पहली बार सिनेमाई पर्दे पर उतारी गयी है. लेकिन तथ्यात्मक तौर पर ये ग़लत है.

1920 और 1930 के दशक के स्थापित फ़िल्मकार भालजी पेंढारकर (1897-1994) ने 1925 में 'बाजीराव मस्तानी' नाम से साइलेंट फ़िल्म बनायी थी. मशहूर फिल्मकार बाबूराव पेंढारकर भालजी के बड़े भाई थे. मशहूर निर्माता-निर्देशक वी शांताराम भी भालजी के रिश्तेदार थे.

भालजी पेंढारकर (1897-1994) ने 1925 में 'बाजीराव मस्तानी' नाम से साइलेंट फ़िल्म बनायी थी

मस्तानी के बारे में कई क्रिटिक ने खासकर रैशेल ने 'हिंदू राजा' और 'मुस्लिम राजकुमारी' की प्रेमकथा के रूप में देखा है.

बाजीराव और मस्तानी की प्रेमकथा में कितना सच है और कितना मिथक यह भी विवाद का विषय है. ये माना जाता है कि मस्तानी बुंदेलखंड इलाके के राजा छत्रसाल और उनकी ईरानी पत्नी की बेटी थीं. जाहिर है ऐसे में मस्तानी का हिंदू या मुसलमान होना एक बहसतलब विषय है.

First published: 20 December 2015, 7:54 IST
 
रंगनाथ सिंह @singhrangnath

पेशा लिखना, शौक़ पढ़ना, ख़्वाब सिनेमा, सुख-संपत्ति यार-दोस्त.

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