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सत्यजीत रे भारतीय सिनेमा के कालजयी फिल्म निर्देशक थे

कैच ब्यूरो | Updated on: 2 May 2017, 17:10 IST
Satyajit ray

सत्यजित रे बीसवीं शताब्दी के विश्व की महानतम फिल्मी हस्तियों में से एक थे, जिन्होंने भारत की यथार्थवादी फिल्मों को नई दिशा देने के काम किया. सत्यजित रे भारत के महान फिल्म निर्देशकों में से एक थे.

सत्यजित रे अपनी फिल्मों में डायरेक्शन के अलावा कैमरा, स्क्रिप्ट, म्यूजिक, ऑर्ट डायरेक्शन और एडिटिंग भी किया करते थे. रे फिल्मकार होने के अलावा कहानीकार, चित्रकार और फिल्म आलोचक भी थे. सत्यजित रे ने अपने जीवन में 37 फिल्मों का डायरेक्शन किया, जिनमें फ़ीचर फिल्में, डाक्यूमेंट्री और शार्ट फिल्में भी शामिल हैं.

इनकी पहली फिल्म 'पाथेर पांचाली' को कॉन फ़िल्मोत्सव में मिले “बेस्ट ह्यूमन डाक्यूमेंट्री” सहित कुल ग्यारह अन्तर्राष्ट्रीय पुरस्कार मिले. विश्व में भारतीय फिल्मों को नई पहचान दिलाने वाले सत्यजित रे को भारत सरकार ने साल 1992 में भारत रत्न से सम्मानित किया.

इसके अलावा उन्हें साल 1958 में पद्म श्री , साल 1965 में पद्म भूषण, साल 1976 में पद्म विभूषण मिल चुका था. रे को साल 1967 में रेमन मैग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित किया गया था. इसके साथ ही विश्व सिनेमा में अभूतपूर्व योगदान के लिए सत्यजित रे को मानद 'ऑस्कर अवॉर्ड' से भी सम्मानित किया गया था.

सत्यजीत रे को उनकी फिल्मों के लिए कुल 32 राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार प्राप्त किये. साल 1985 में सत्यजीत रे को हिंदी फिल्म उद्योग के सर्वोच्च सम्मान दादा साहब फाल्के पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया था.

सत्यजीत रे का जन्म कलकत्ता(अब कोलकाता) में 02 मई 1921 को एक उच्च घराने में हुआ था. अपने माता-पिता की इकलौती संतान सत्यजीत रे के पिता 'सुकुमार रे' की मृत्यु साल 1923 में हुई जब सत्यजीत रे मुश्किल से दो साल के थे. उनका पालन-पोषण उनकी मां 'सुप्रभा रे' ने अपने भाई के घर में ममेरे भाई-बहनों, मामा-मामियों वाले एक भरे-पूरे और फैले हुए कुनबे के बीच किया.

सत्यजित रे के दादाजी 'उपेन्द्रकिशोर रे' एक लेखक और चित्रकार थे और इनके पिताजी भी बांग्ला में बच्चों के लिए रोचक कविताएं लिखते थे और वह एक चित्रकार भी थे. यह परिवार टैगोर घराने के नजदीक था.

प्रेसीडेंसी कॉलेज कलकत्ता से स्नातक होने के बाद रे पेंटिंग के अध्ययन के लिए रवीन्द्रनाथ टैगोर के शांतिनिकेतन चले गए. शांतिनिकेतन में सत्यजित रे ने नंदलाल बोस और विनोद बिहारी मुखोपाध्याय जैसे कलाकारों से शिक्षा प्राप्त की, जिन पर बाद में उन्होंने ‘इनर आई’ फिल्म भी बनाई.

सन 1942 में मध्य भारत के कला स्मारकों के भ्रमण के बाद रे ने शांतिनिकेतन छोड़ दिया. उसके बाद उन्होंने एक ब्रिटिश विज्ञापन एजेंसी 'डी .जे. केमर एंड कंपनी' में कमर्शियल आर्टिस्ट के रूप में रोज़गार मिल गया जहां काम करते हुए उन्होंने पुस्तकों के कवर पेज की डिजाइनिंग का किया.

यह काम उन्होंने भारतीय पुस्तक प्रकाशन के क्षेत्र में नए मानक स्थापित करने वाले अग्रणी प्रकाशन संस्थान 'साइनेट प्रेस' के लिए किया. जिन पुस्तकों का कवर डिजाइन किया, उनमें से एक 'विभूति भूषण बंद्योपाध्याय' की 'पाथेर पांचाली' भी थी.

इस समय तक फ़िल्मों से रे का गहरा लगाव हो चुका था. सन 1950 में वो विश्व सिनेमा को समझने के लिए लंदन गये. यह उनकी लिंड्से एंडर्सन और गाविन लम्बर्ट से दोस्ती हुई और उन्होंने अपने साढ़े चार माह के प्रवास के दौरान लगभग सौ फ़िल्में देखीं जिनमें बाइसिकिल थीव्स जैसी कई फिल्में शामिल थीं. इन फिल्मों ने सत्यजित रे के ऊपर गहरा प्रभाव पड़ा.

पानी के जहाज से वापसी के दौरान ही रे ने 'पाथेर पांचाली' की स्क्रिप्ट लिखनी शुरू कर दी. साल 1952 में भारत के पहले अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव के आयोजन में उन्होंने इटली और जापान की कई नव-यथार्थवादी फिल्मों को देखा.

'पाथेर पांचाली' की सफलता के बाद सत्यजित रे ने डी.जे. केमर एंड कंपनी की अपनी नौकरी छोड़ दी. इसके बावजूद विज्ञापन में उनकी रुचि कभी समाप्त नहीं हुई, अपनी फfल्मों के लिए प्रचार सामग्री खुद ही तैयार करने के अलावा वो कई सालों तक क्लेरियन एडवरटाइजिंग सर्विसेज (डी.जे. केमर के उत्तराधिकारी, और कर्मचारियों के स्वामित्व वाली) के एक निदेशक के रूप में कार्य करते रहे.

वैसे तो 'पाथेर पांचाली' को साल 1956 में कॉन्स में एक पुरस्कार दिया गया था, पर वास्तव में साल 1957 में 'वेनिस महोत्सव' में 'अपराजितो' को मिला ग्रांड प्राइस पुरस्कार ही था, जिसने 'पाथेर पांचाली' को दुनिया के सामने रखा.

सत्यजित राय ने साल 1966 में फिल्म 'नायक' का निर्माण किया, इसकी कहानी स्वयं उन्होंने लिखी थी और इसमें मशहूर हीरो उत्तम कुमार को लिया था. इस फिल्म में शर्मिला टैगोर ने एक पत्रकार की भूमिका में निभाई थी और फ़िल्म अभिनेता उत्तम कुमार का साक्षात्कार लेती है.

सत्यजीत रे ने साल 1959 में बनारस को लेकर एक बहुत ही सफल फिल्म बनाई और नाम दिया 'अपुर संसार'.

सत्यजित रे अपनी स्क्रिप्ट हमेशा स्वयं लिखते थे, कभी-कभी अपनी कहानिया भी वो खुद ही तैयार करते थे. फिल्म 'पाथेर पांचाली' के दिनों में भी वो खुद फिल्म एडिटर के साथ एडिटिंग मशीन पर बैठते थे. सत्यजित रे शूटिंग से पहले डायलॉग का रिहर्सल नहीं करवाते थे. इसके बाद भी उनकी फिल्म में डायलॉग बहुत ही सटीक और अर्थपूर्ण होते थे.

First published: 2 May 2017, 15:25 IST
 
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