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‘दंगल’ ढर्रेबाजी की शिकार फिल्म नहीं है

तत्याना षुर्लेई | Updated on: 27 December 2016, 7:47 IST

‘पीके’ के दो साल बाद, आमिर खान की नयी फ़िल्म ‘दंगल’ से फिर अलग-अलग तरह की बहसें शुरू हो गई हैं, मसलन क्या फ़िल्म को सच में नेशनलिज्म की इतनी ज़रुरत थी? क्या रेसलर बनना लड़कियों के लिए सही कैरियर है? क्या औरतों की ताकत को दिखाने के लिए लड़कों से फाइट करना और उन्हें हराना सही रास्ता है? इत्यादि.

लेकिन इन सारे विवादों में फंस करकर लोग शायद यह भूल जाते हैं कि स्पोर्ट्स फ़िल्म एक खास विधा है जिसमें हमेशा जेंडर के इश्यू, नेशनलिज्म, सेल्फ-सेक्रिफाइस और इस तरह की चीजें जरूरी तत्व होती हैं. हॉरर फिल्में लोगों को डराने के लिए बनायी जाती हैं, मेलोड्रामा रुलाने के लिए और स्पोर्ट्स फिल्मों का काम दर्शकों को यह विश्वास दिलाना है कि ज़िन्दगी में कुछ भी नामुमकिन नहीं है और अपने सपनों को मेहनत से पाया जा सकता है.

महावीर सिंह फोगट (आमिर खान) के खून में कुश्ती है. यह उसका पहला प्यार और सब से बड़ा शौक भी है, लेकिन उसे अपने सपनों को भूलना पड़ता है क्योंकि आदमी का सबसे बड़ा कर्त्तव्य परिवार के लिए पैसा कमाना है. भारतीय समाज के बारे में बहस करनेवाले लोग अक्सर यह भूल जाते हैं कि इस देश की संस्कृति सिर्फ औरतों के लिए ऑप्रेसिव नहीं है, अक्सर आदमियों को भी अपने जुनून को छोड़ना पड़ता है क्योंकि उसकी प्राथमिकता सिर्फ परिवार है.

फ़िल्म की कहानी यह नहीं दिखाती है कि महावीर शादी करना चाहता था भी कि नहीं. महावीर परिवार के लिए कुश्ती को कुर्बान करता है लेकिन उसे उम्मीद है कि एक दिन उसके बेटे की कुश्ती में दिलचस्पी होगी और उसे बिना किसी से समझौता किए अपने सपने को पूरा करने का मौका मिलेगा. खैर, चार बेटियां होने के बावजूद महावीर फिर से असफल महसूस करता है, इसलिए नहीं कि वह लड़कियों को लड़कों से कम समझता है और बेटा पैदा कर मर्दानगी साबित करना चाहता है बल्कि इसलिए कि वह इसके बारे में सोच ही नहीं सकता है कि कुश्ती लड़कियों का स्पोर्ट भी हो सकता है.

कुश्ती कोई जिमनास्टिक या टेनिस नहीं है एक कठिन और एक स्तर पर हिंसक खेल भी है

कुश्ती कोई जिमनास्टिक या टेनिस नहीं है एक कठिन और एक स्तर पर हिंसक खेल भी है. फिर भी, जब महावीर को पता चलता है कि उसकी दो बेटियों में कुश्ती की क्षमता है, तो वह उनको मौका देना चाहता है, अपनी इच्छाओं को नहीं. क्या यह सिर्फ अपने सपने को पूरा करने के लिए बच्चों का इस्तेमाल करना है?

अलग-अलग स्पोर्ट फिल्में अपने दर्शकों को यह दिखाती हैं कि स्पोर्ट एक पैशन है जो बचपन से आदमी के अन्दर पैदा होता है. उन फिल्मों के नायक न सिर्फ शुरू से जानते हैं कि उन्हें भविष्य में स्पोर्ट करना है बल्कि यह भी जानते हैं कि वे किस स्पोर्ट में अच्छे हैं. इसके साथ ही साथ बहुत सारी फिल्में सामाजिक बुराइयों से या अपनी कमजोरियों से लड़ाई के बारे में होती हैं.

‘दंगल’ की कहानी और उसके चरित्र ‘बेंड इट लाइक बेखम’ (2002, गुरिंदर चड्ढा) और ‘मैरी कॉम’ (2014, ओमुंग कुमार) के बीच के हैं. तीनों फिल्में स्त्रियों के बारे में हैं जो पुरुषों के स्पोर्ट्स में चैंपियन बन गईं. ‘बेंड इट लाइक बेखम’ की तरह ‘दंगल’ में भी लड़कियों को पारंपरिक भारतीय समाज से लड़ना चाहिए लेकिन अंतर यह है कि ‘दंगल’ की दोनों लडकियां अपनी मर्ज़ी से कुछ नहीं करती हैं.

शुरुआती समय में कुश्ती का गोल्ड मैडल जीतना लड़कियों का नहीं बल्कि उनके बाप का सपना था. महावीर की बेटियों को शादी और चूल्हा नहीं बल्कि किसी बड़ी जिम्मेदारी को पूरा करने मौका मिलता है. बेटी पर स्पोर्ट के लिए दबाव बनाना क्या सचमुच में शादी के लिए दबाव बनाने से अलग है? महावीर अपनी बेटियों से यह नहीं पूछता है कि उनको कुश्ती पसंद है या नहीं, बस उनको सुबह-सुबह हांक देता. कितना क्रूर और कितना यथार्थ!

फ़िल्म वास्तविक कहानी पर आधारित है शायद इसलिए उसमें बचपन से स्पोर्ट करने की चाह वाले रोमांटिक चित्रण के लिए स्थान नहीं है. ‘दंगल’ न सिर्फ ‘बेंड इट लाइक बेखम’ से बल्कि ‘मैरी कॉम’ से भी कई मायनों में अलग है. यह फ़िल्म भी एक बायोग्राफिकल फ़िल्म है लेकिन इसमें पैशन को रोमांटिसाइज़ बहुत किया गया है और ‘दंगल’ वाली वास्तविकता की कमी है.

‘मैरी कॉम’ की नायिका बचपन से ही जानती है कि वह बॉक्सर बनना चाहती है. और जब उसकी ट्रेनिंग शुरू होती है तो उसका परिवार और पूरा गांव इस बात को बड़ी आसानी से एक्सेप्ट करता है (शुरू-शुरू में बाप को समस्या होती है लेकिन इतनी भी नहीं).

जब मैरी अपने बालों को छिलती है तो किसी को अजीब नहीं लगता, और कोई कुछ नहीं बोलता है. ‘मैरी कॉम’ अपनी कमजोरियों से जंग करने की कहानी है फिर भी इस कहानी पर विश्वास करना बहुत मुश्किल है. यह कैसे संभव हो सकता है कि एक छोटे से गांव की जवान और सुन्दर लड़की अचानक से ऐसा क्रूर खेल खेलना चाहती है?

लेकिन यह प्रश्न शायद ही कोई पूछता है, या कोई दर्शक इस बात से भी अचंभित नहीं था कि ‘काय पो छे!’ (2013, अभिषेक कपूर) का छोटा अली क्रिकेट नहीं बल्कि कंचा खेलना चाहता है. क्रिकेट प्लेयर बनने के लिए उसे फ़ोर्स किया जाता है. लेकिन जब महावीर अपनी बेटियों को ट्रेनिंग के लिए फ़ोर्स करता है तो यहां सारी बहस महिला-अधिकारों के इर्द-गिर्द इकट्ठा हो जाती है जबकि फ़िल्म का यही हिस्सा वास्तविक और यथार्थपूर्ण है.

महावीर की क्रूरता का चित्रण फ़िल्म के दर्शकों को सरप्राइज करने के लिए जानबूझ कर किया गया है. महावीर को विश्वास है कि वह जो भी करता है वह सही है. जब उसकी बड़ी बेटी गीता प्रोफेशनल ट्रेनिंग के लिए स्पोर्ट्स अकादमी जाती है तब उसे और दर्शकों को भी शक होता है कि क्या महावीर सच में कुश्ती के बारे में सबकुछ जानता है या फिर यह कि पुराने जमाने का पहलवान होने के कारण नई तकनीकों से अनजान है.

नया कोच दिखने में बहुत प्रोफेशनल लगता है और उसके साथ ट्रेनिंग के बाद ही गीता अपने पापा से जीतती भी है. लेकिन धीरे-धीरे पता चलता है कि ट्रेनिंग में सब से महत्वपूर्ण चीज़ आत्मविश्वास है जो प्यार और विश्वास से पैदा होता है. गीता का नया कोच डरपोक है और उसको लगता है कि इंडिया दूसरे देशों से कभी जीत नहीं सकता है. वह जीतने की कोशिश नहीं करता है इसलिए गीता को आक्रमण के दांव नहीं बल्कि सुरक्षात्मक होने की सीख देता है.

महावीर को मालूम है कि उसकी बेटी जीत सकती है, न सिर्फ इसलिए कि वह उसकी बेटी है बल्कि इसलिए भी कि वह टैलेंटेड है. उन दोनों का न सिर्फ प्रोफेशनल बल्कि इमोशनल रिश्ता भी है.

फिल्म ने महावीर के मजबूत और प्रभावी व्यक्तित्व के साथ-साथ कई हृदयस्पर्शी क्षणों को भी उजागर किया है जैसे, महावीर और नये कोच की पहली मुलाकात के दृश्य में, गीता के जीतनेवाले दृश्य में, महावीर जब अकादमी के अधिकारियों से भीख मांगता है कि उसकी बेटियां अकादमी में रह सकें, और अंत में एक कमरे में बंद हो जाने के कारण अपनी बेटी को गोल्ड मेडल जीतता हुआ नहीं देख पाता है. इन सारे दृश्यों में दर्शक के लिए महावीर दया का पात्र बन जाता है कि इतने बड़े आदमी को कोई इतनी आसानी से अपमानित कैसे कर सकता है.

स्पोर्ट्स फिल्मों में नेशनलिज्म की आवश्यकता होती है, क्योंकि खेल देशभक्ति की सबसे मुखर अभिव्यक्ति का जरिया हैं

मेटाफर के रूप से आमिर खान का यह नायकत्व हर बूढ़े आदमी का अवतार बन जाता है, जिसे पहले बहुत आदर-सत्कार मिलता था और आजकल उतना ही अपमान, वह भी सिर्फ इसलिए कि जवान या अनप्रोफेशनल लोगों को लगता है कि वे दूसरों से ज्यादा जानते हैं.

‘दंगल’ प्रोफेशनल तरीके से बनी एक मनोरंजन-फ़िल्म है, जिसे देखते समय दर्शकों को बिलकुल भी महसूस नहीं होता है कि फ़िल्म इतनी लम्बी है. कुश्ती के बारे में ही बनी फ़िल्म ‘सुल्तान’ (2016, अली अब्बास ज़फर) के विपरीत ‘दंगल’ अपने दर्शकों के सामने कुश्ती के नियमों को भी स्पष्ट करता है ताकि वे खुद देख सकें कि नायिका कब गलती करती है या कि वह कब खतरे में है.

कुश्ती के दृश्य बहुत ही अच्छे तरीके से फिल्माये गए हैं ताकि दर्शक यह देख सकें कि नायिका को हर जीत के लिए कितनी मेहनत की जरुरत पड़ती है. ‘सुल्तान’ में सलमान खान और अनुष्का शर्मा बिना किसी प्रयास के ही जीत जाते हैं, लेकिन उस फ़िल्म में कुश्ती के आलावा दूसरी चीज़ें ज्यादा महत्वपूर्ण हैं.

‘दंगल’ सिर्फ कुश्ती के बारे में है, और इसमें किसी रोमांस या पॉलिटिक्स के लिए ज्यादा जगह नहीं है. स्पोर्ट के अधिकारियों की छोटी आलोचना है, लेकिन इतनी भी नहीं जितनी ‘मैरी कॉम’ में थी. स्पोर्ट के लिए पैसे की कमी के बारे में छोटी सी बात है लेकिन सब से बड़ा मुद्दा वह भारतीय कोच है जो जीतने में विश्वास नहीं रखता है, जैसे ‘लगान’ (2001, आशुतोष गोवारिकर) में दिखाया गया है कि जीतना हमेशा मुमकिन है.

दिलचस्प बात यह है कि फ़िल्म में कम्पटीशन पर भी ज्यादा ध्यान दिया नहीं गया है जैसे ‘चक दे इंडिया’ (2007, शिमित अमीन) में यह महत्त्वपूर्ण था. स्पोर्ट्स अकादमी की लड़कियां एक दूसरे से ईर्ष्या नहीं करती हैं, महावीर की बेटियों के बीच में भी कोई ईर्ष्या नहीं है.

फ़िल्म में स्त्री-मुक्ति के बारे में दो-दो बार उपदेश देने की ज़रुरत नहीं थी. लेकिन यह भी याद रखना चाहिए कि ‘दंगल’ सिर्फ घरेलू बाजार के लिए नहीं बल्कि विदेश के लिए भी बनी है इसलिए जो दर्शक भारतीय संस्कृति के बारे में ज्यादा नहीं जानते हैं उनके लिए कुछ न कुछ स्पष्ट करने की भी जरुरत थी.

अच्छी बात यह है कि स्पोर्ट फ़िल्म होने के बावजूद ‘दंगल’ में ज्यादा देशभक्ति और ‘धर्म’ वाली विशेषता दिखाई नहीं देती है, फिर भी मुर्गे बेचनेवाले मुस्लिम चरित्र को फ़िल्म में डालना बहुत ही होशियारी भरा कदम था.

यह बात सच है कि स्पोर्ट्स फिल्मों में नेशनलिज्म की आवश्यकता होती है, क्योंकि देश के प्रति प्यार जताने वाली सबसे मुखर अभिव्यक्तियों को स्पोर्ट्स बढ़ावा देता है. लेकिन, ‘दंगल’ इस विधा की बहुत सारी फिल्मों की तरह यांत्रिक और ढर्रेबाजी की शिकार फ़िल्म नहीं है.

(तत्याना षुर्लेई पोलैंड की रहने वाली हैं. वह एक  इंडोलॉजिस्ट (भारतीय उपमहाद्वीपीय भाषा और संस्कृति की जानकार) हैं. फिल्म समीक्षा भी करती रहती हैं. हिंदी की मशहूर पत्रिकाओं और ब्लॉग्स के लिए लिखती रही हैं. पोलैंड के शहर क्राकोव स्थित जेगिलोनियन विश्वविद्यालय से "द कोर्टसान फिगर इन इंडियन पॉपुलर सिनेमा: 'ट्रेडिशन, स्टीरियोटाइप, मैनिपुलेशन" नामक विषय पर पीएचडी हैं. वर्तमान में मनिपाल विश्वविद्यालय, कर्नाटक के यूरोपीय अध्ययन संस्थान में पढ़ाती हैं.)

First published: 27 December 2016, 7:47 IST
 
तत्याना षुर्लेई @catchhindi

तत्याना षुर्लेई पोलैंड की रहने वाली हैं. वह एक इंडोलॉजिस्ट (भारतीय उपमहाद्वीपीय भाषा और संस्कृति की जानकार) हैं. फिल्म समीक्षा बी करती रहती हैं. हिंदी की मशहूर पत्रिकाओं और ब्लॉग्स के लिए लिखती रही हैं. पोलैंड के शहर क्राकोव स्थित जेगिलोनियन विश्वविद्यालय से "द कोर्टसान फिगर इन इंडियन पॉपुलर सिनेमा: 'ट्रेडिशन, स्टीरियोटाइप, मैनिपुलेशन" नामक विषय पर पीएचडी हैं. वर्तमान में मनिपाल विश्वविद्यालय, कर्नाटक के यूरोपीय अध्ययन संस्थान में पढ़ाती हैं.

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