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गृह मंत्रालय और सेंसर बोर्ड नहीं चाहता जनता देखे 'इन दिनों मुजफ्फरनगर'

सौरभ दत्ता | Updated on: 10 February 2017, 1:49 IST

सांप्रदायिक हिंसा की बात करें तो दक्षिणपंथी सरकारों द्वारा उन्हें सेंसर किए जाने का लम्बा इतिहास रहा है. आनंद पटवर्धन की डाक्यूमेंट्री 'राम के नाम' को 1991 में सेंसर किया गया. ये डाक्यमेंट्री बाबरी मस्जिद-राम मंदिर आंदोलन के शुरुआती अभियान के ऊपर थी.

इसी तरह 2009 में राकेश शर्मा की 2009 की डाक्यूमेंट्री 'फाइनल सल्यूशन' को सेंसर  किया गया. इस डाक्यूमेंट्री में गुजरात में 2002 में हुए दंगों में तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की भूमिका पर सवाल खड़ा किया गया था.

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अब नरेंद्र मोदी सरकार सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेशन (सीबीएससी) 2013 में यूपी के मुजफ्फरनगर में हुए दंगों पर बनी एक डाक्यूमेंट्री को सेंसर करने का सुझाव दिया है. इस फिल्म में बीजेपी और आरएसएस की नेताओं की भूमिका को उजागर किया गया है.

सेंसर बोर्ड के अनुसार 'इन दिनों मुजफ्फरनगर' में केवल हिंदुओं को बुरा दिखाया गया है

सीबीएफसी के प्रमुख पहलाज निहलानी ने 'इन दिनों मुजफ्फरनगर' नामक डाक्यूमेंट्री के प्रदर्शन पर प्रतिबंध लगा दिया है.

फिल्म सर्टिफिकेशन अपीलैट ट्राइब्यूनल (एफसीएटी) ने 19 अगस्त 2014 को फिल्म को स्क्रीनिंग सर्टिफिकेट देने से मना कर दिया था. उस फैसले के बाद निर्माताओं ने रिवाइजिंग कमिटी में अपील की थी. कमेटी ने फिल्म को स्क्रीनिंग सर्टिफिकेट देने से इनकार कर दिया. बोर्ड के अध्यक्ष पहलाज निहलानी इस कमेटी के प्रमुख थे.

एफसीएटी के अनुसार फिल्म 'अत्यधिक भड़काऊ' है और इसमें 'केवल हिन्दू समाज को बुरा दिखाया गया है.' एफसीएटी के अनुसार इस फिल्म से 'सांप्रदायिक हिंसा भड़क' सकती है.

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एफसीएटी के अनुसार फिल्म "एक राजनीतिक पार्टी (बीजेपी) के खिलाफ ज्यादा आलोचनात्मक है" और उसके शीर्ष नेताओं का नाम इस तरह लिया गया है "जिससे लगता है कि पार्टी का सांप्रदायिक दंगों में हाथ था."

सिनेमैटोग्राफी एक्ट के नियम 32 के तहत एफसीएटी किसी फिल्म को प्रमाणपत्र देने से पहले उसपर सरकार से राय ले सकती है. निहलानी ने इस फिल्म को प्रमाणपत्र देने से पहले भारत के गृह मंत्रालय से सलाह मांगी थी.

मंत्रालय ने सेंसर बोर्ड को फिल्म को प्रमाणपत्र न देने का सुझाव दिया क्योंकि इसमें बीजेपी नेताओं अमित शाह, संजीव बालियान और आरएसएस नेता इंद्रेश कुमारा को 'अपमानजनक' रूप से पेश किया गया है.

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डाक्यूमेंट्री की सह-निर्देशक मीरा चौधरी कहती हैं कि इसमें दिखाया गया है 'लव जिहाद' का मुसलमानों के खिलाफ दंगा भड़काने के लिए किस तरह इस्तेमाल किया गया है. चौधरी ने ये फिल्म अपने पति शुभ्रोदीप चक्रवर्ती के साथ मिलकर बनाई थी. चक्रवर्ती का 2014 में ब्रेन हैमरेज से निधन हो गया.

'इन दिनों मुजफ्फरनगर' की निर्देशक सेंसर बोर्ड और सरकार के खिलाफ लडेंगी अदालती लड़ाई

मीरा और उनके पति ने अपनी फिल्म में दिखाया है कि 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने हिन्दू वोटों को एकजुट करने के लिए सांप्रदायिक तनाव को बढ़ावा दिया था.

चौधरी ने सेंसर बोर्ड के फैसले के खिलाफ कोर्ट में अपील की. अभी ये मामला दिल्ली हाईकोर्ट में विचाराधीन है. 30 मार्च को अदालत ने सेंसर बोर्ड को फिल्म को प्रमाणपत्र न देने को लेकर लताड़ लगाई थी.

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चौधरी का कहना है उनकी डाक्यूमेंट्री काल्पनिक कहानी नहीं है. ये वास्तिवक फुटेज, इंटरव्यू और पीडितों के बयान पर आधारित है. चौधरी ने सरकार के फैसले को 'दुर्भावनापूर्ण' बताया है.

चौधरी सरकार के फैसले के खिलाफ अदालती लड़ाई लड़ने के लिए प्रतिबद्ध हैं. वो कहती हैं कि ये लड़ाई फिल्म की नहीं, बल्कि सच की लड़ाई है.

वो कहते हैं, "किसी को भी सांप्रदायिक हिंसा को चुनावी औजार के तौर पर प्रयोग करने की इजाजत नहीं होनी चाहिए."

First published: 3 May 2016, 11:06 IST
 
सौरभ दत्ता @catchnews

संवाददाता, कैच न्यूज़

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