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अजहर: बीसीसीआई की राजनीति फिल्म के निर्देशक की पकड़ से बाहर है

रजा नकवी | Updated on: 15 May 2016, 8:58 IST

इमरान हाशमी अभिनीत "अजहर" भारतीयों को 1990 के दशक की मैच फिक्सिंग के दौर में ले जात है. इस शुक्रवार की अलसायी सुबह यानि तेरह मई को रिलीज इस फिल्म में लोगों ने कोई खास दिलचस्पी नहीं दिखाई. पहले दिन के शो में सिनेमा हॉल आधे खाली नजर आये. ध्यान रहे, 13 को पश्चिम के अंधविश्वासी और नोएडा के बिल्डर अशुभ अंक मानते हैं.

इसके मुकाबले बॉलीवुड के अनुभवी कलाकार इरफान खान, जिनकी हॉलीवुड में पूछ बढ़ती दिख रही है, अपनी फिल्म मदारी के ट्रेलर से ही बड़ी संख्या में लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचने में कामयाब रहे, साथ ही अपने इस बयान से भी कि अपनी आने वाली फिल्म में वह मरहूम राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम की भूमिका करना पसंद करेंगे.  

खेल के प्रेमियों और जानकारों ने जरूर इस फिल्म को देखा. इस दौरान मेरे साथ कुछ रिपोर्टर भी थे. दो घंटे 11 मिनट लंबी यह फिल्म अपने दर्शकों को मामू लोगों (उन एनआरआई लोगों को मामू के नाम से पुकारा जाता था जो बुकीज को क्रिकेटरों से करीबी बढ़ाने में मदद करते थे) और कासिम बैंजो के दौर में ले गई. 

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बैंजो वह संदिग्ध बिचौलिया था, जिस पर आरोप थे कि उसने मरहूम दक्षिण अफ्रीकी क्रिकेटर हैंसी क्रोनिये के साथ मिल कर कई मैच फिक्स करने में मदद की, लेकिन सबूत के अभाव में किंग्स कमीशन ने उसे छोड़ दिया.

लेकिन फिल्म की ऐसी फूहड़ प्रस्तुति नहीं चलेगी क्योंकि फिक्सिंग एक कला है, क्योंकि बेहद गंदे तरीके से लिखे नोट्स की जगह अब महंगे मैकबुक और आईपैड ने ले ली है. पुलिस ऐसे नोट्स बरामद करते समय काफी उत्साहित थी, लेकिन न्यायालय में इसे बतौर सबूत साबित करने में नाकाम रही.  

यदि भारतीय क्रिकेट के इस पहले सबसे बड़े स्कैंडल की भारतीय क्रिकेट से जुड़े मौजूदा संकट से तुलना की गई होती, तो यह फिल्म बनाना ज्यादा प्रासंगिक होता, अन्यथा इस फिल्म का कोई मतलब नहीं है. चाहे वह फिक्सिंग पर आधारित हो या फिर मशहूर दागी क्रिकेटर पर.

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गौरतलब है कि पूर्व मुख्य न्यायाधीश लोढ़ा ने अभी अपना काम पूरा नहीं किया है और दुनिया का सबसे अमीर क्रिकेट बोर्ड मुश्किलों में है. बुरा तो यह है कि आप यह कहानी तकरीबन 16 सालों बाद दुनिया के सामने पेश कर रहे हैं.

आज के युवा की पसंद विराट कोहली है, उन्हें उस पूर्व क्रिकेटर में कोई रुचि नहीं है, जिसकी कलाइयां महान गुंडप्पा विश्वनाथ की तरह जादुई स्ट्रोक से दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर देती थीं. इस फिल्म के संदर्भ में एक और बुरी बात यह है कि जब भी बॉलीवुड ने खेल को रुपहले पर्दे पर पेश करने की कोशिश की है, उसके नतीजे काफी निराशाजनक रहे हैं. इस बार भी हाल कुछ वैसा ही है.

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फिल्म में कुछ उठान भी हैं, लेकिन बहुत कम. मुझे एक दृश्य अच्छा लगा, वह ओपनिंग शॉट जिसमें करनवीर शर्मा (जो पूर्व ऑलराउंडर मनोज प्रभाकर की भूमिका में हैं) एक पत्रकार से अजहरुद्दीन पर स्टिंग करने के लिए कहते हैं.

इस तरह की चीजें अब तक चल रही हैं. मैंने खुद देखा है कि किस तरह दक्षिण और पश्चिम के लोगों ने मिल कर जगमोहन डालमिया के बारे में खूब उल्टा-सीधा लिखवाया, जब वह बीसीसीआई में किसी पद पर नहीं थे. हालांकि आखिरकार इस बुजुर्ग क्रिकेट प्रशासक पर सभी मामले बाद में वापस ले लिये गये थे.

इसी तरह की गंदगी वीरेंद्र सहवाग के बारे में फैलायी गई. कई लोगों ने उनकी फिटनेस के बारे में लिखा. हालांकि सहवाग का एक शानदार कैच देख कर एमएस धोनी भी चकित रह गये, जिनके बारे में माना जाता है कि उन्होंने सहवाग के बारे में ऐसी खबरें चलवाईं थीं.

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लेकिन 1990 के दशक में स्टिंग की कल्पना हास्यास्पद है. मुझे एक घटना याद आती है जब मशहूर फिल्मकार सत्यजीत रे ने बॉलीवुड की कामयाब फिल्म धरमवीर के निर्देशक के बारे में बताते हुए कहा था कि उसने रथ के पहियों की मरम्मत के लिए अपने नायकों धर्मेंद्र और जीतेंद्र से जेडोर टूल्स का इस्तेमाल करवा दिया था.   

अजहर ने बचकाने चेहरे वाले हाशमी को अपनी सीरियल किसर की भूमिका से मुक्ति दिलाई है. वह दिखाते हैं कि किस तरह अजहरुद्दीेन ने टेस्ट मैच में करियर की शुरुआत में ही लगातार तीन शतक बना डाले, बाद में वह टीम के कप्तान भी बने और फिर ग्लैमर और जालफरेबी की दुनिया में पहुंच गये.

फिल्म में एक दृश्य भी है जिसमें बोर्ड अध्यक्ष उनसे पूछते हैं, मियां कप्तान बनोगे?

फिल्म भारतीय क्रिकेट से जुड़े इस अहम पहलू को भी सरसरी तौर पर छूती नजर आती है कि किस तरह यह काफी लंबे समय तक पश्चिम और दक्षिण के बीच की जबरदस्त गुटबाजी का शिकार रहा है. यह सिलसिला तब टूटा जब हरियाणा से आने वाले कपिल देव और फिर बाद में बंगाल से आने वाले सौरव गांगुली कप्तान बने. लेकिन मुझे लगता है कि बीसीसीआई की जबरदस्त राजनीति इस फिल्म के निर्देशक की पकड़ से बाहर है.

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कोर्टरूम के दृश्य भी थोड़ा प्रभाव छोड़ने में सफल रहे हैं, जहां दो अनुभवी कलाकार लारा दत्ता और कुणाल रॉय कपूर चिल्लपों के बीच अजहरुद्दीन के मैच फिक्सिंग मामले में एक-दूसरे से बहस करते हैं. दत्ता उनको सजा देने की मांग करती हैं और कपूर कहते हैं कि अजहरुद्दीन के पास उस अवैध पैसे का एक हिस्सा लेने के अलावा कोई रास्ता ही नहीं बचा था.

याद करें, ऐसा माना जाता रहा है कि बॉलीवुड के कई सितारों से नजदीकियों की वजह से अजहरुद्दीन को जाल में फंसा लिया गया. शायद इसी वजह से हालात ऐसे बने कि उन्हें संगीता बिजलानी (नरगिस फाखरी) को स्वीकार करना पड़ा और अपनी पहली बीवी नौरीन (प्राची देसाई) को छोड़ना पड़ा.

इस क्रिकेटर की जिंदगी में इन दो औरतों की काफी छोटी भूमिका रही है. हालांकि इतना जरूर है कि बिजलानी ने इस जमीनी क्रिकेटर को क्रिकेट से जुड़ी ग्लैमरस दुनिया से परिचित कराया. रोलेक्स घड़ियों, बीएमडब्ल्यू कारों और टुक्सेडो सूट के लिए अजहर की दीवानगी जितनी बढ़ती गई, वह मैच फिक्स करने के लिए उतने अधिक पैसे मांगते गए.

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और कुछ खास ध्यान देने लायक नहीं है. यह भी नहीं कि किस तरह रवि शास्त्री (क्रिकेट छोड़ने के बाद भी वह शानदार जिंदगी गुजार रहे हैं) और नवजोत सिंह सिद्धू (जिनकी जिंदगी क्रिकेट, राजनीति और कॉमेडी का रोचक कॉकटेल बन गयी है) उनके खिलाफ इकट्ठा हुए और किस तरह कपिल देव ने उनसे कहा कि कप्तानी टीम के लिए नहीं, देश के लिए होती है. इसमें कुछ नया नहीं है. हर युवा कप्तान को अपने सीनियर से यह ज्ञान मिलता है. ये बातें दर्शकों को आकर्षित नहीं करेंगी.

दरअसल यह फिल्म बहुत देर से आयी है. इसे एक दशक पहले ही आ जाना चाहिए था. तब इसका कोई मतलब बनता. अब तो यह ट्विटर के अगले ट्रेंडिंग रोल तक भी नहीं टिकेगी. फेसबुक पर भी नहीं.

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क्रिकेट की ही तरह फिक्सिंग भी एक कला बन गयी है. अब ये लोग अपने जाल फैलाने के लिए फाइव स्टार होटल बुक करते हैं और मैच बांट लेते हैं, जैसे वे बड़े समुद्र में मछली मारने की तैयारी कर रहे हों (हर सदस्य के अपने खास संपर्क होने चाहिए). ऐसे विषय पर बेहतरीन फिल्म बनाने के लिए आपको काफी यथार्थवादी होना पड़ेगा, बिल्कुल ब्लू डायमंड की तरह.

First published: 15 May 2016, 8:58 IST
 
रजा नकवी @Mir_Naqvi

Raza is an alumnus of the Indian Institute of Mass Communication (IIMC) and has worked with the Hindustan Times in the past. A passionate follower of crime stories, he is currently working as a Sub-Editor at the Speed News desk.

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