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प्रिय प्रियंका चोपड़ा! सलमान के बचाव से पहले बलात्कार पर कुछ पढ़-लिख लो

स्नेहा वखारिया | Updated on: 30 June 2016, 8:13 IST

सबको आश्चर्य होता है कि हमारी आम बोलचाल में 'फाड़ू' शब्द कहां से आ गया. "गाने की बेस लाइन फाड़ू है", "अनुराग कश्यप की फिल्म फाड़ू हैं", हिन्दी में अक्सर कहा-सुना जाता है "फाड़ कर रख दिया". अंग्रेजी में इसका भावार्थ किल कर देना यानी जबरदस्त, बेहतरीन.

इसके शाब्दिक अर्थ पर जाएं तो इसका अर्थ है चीरफाड़. हमने शायद ही कभी यह महसूस किया हो कि 'फोड़ देना', 'फाड़ू', 'फाड़ कर रख देना' इन सभी शब्दों का इशारा दरअसल बलात्कार की तरफ है. लेकिन हम जाने और अनजाने इसका बेतकल्लुफी से इस्तेमाल करते हैं. खास तौर पर यह शब्द संकेत है वर्जिनिटी खत्म करने का, किसी के हाइमेन को ब्रेक करने का.

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जी हां, किसी लड़की की वर्जिनिटी खत्म करने को हम सब आज भी किसी शानदार उपलब्धि की तरह सुनते आए हैं. इसकी वजह यह है कि हमारे समाज में बलात्कार की संस्कृति की जड़ें बेहद गहरी हैं. बेतकल्लुफी से इन शब्दों का प्रयोग दिखाता है कि किस तरह से बलात्कार संस्कृति हम पर असर रखती है. इस संस्कृति के संकेतों को बाहर निकालकर उनकी पहचान करिए.

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करीब हफ्ते भर पहले सलमान ने अपनी आने वाली फिल्म सुल्तान के लिए की जाने वाली मेहनत के बारे में बताते हुए कहा कि, "ये बहुत मुश्किल काम था, जब मैं रिंग से बाहर निकलता था तो ऐसा लगता था जैसे कोई बलात्कार की शिकार महिला चल रही हो."

मतलब सलमान बहुत ज्यादा कसरत के कारण अपनी जांघों में दर्द भरा खिंचाव महसूस करते थे और इससे उन्होंने अंदाजा लगाया कि बलात्कार पीड़िता ऐसा ही कुछ महसूस करती होगी. मैं कह सकती हूं कि इतनी तकलीफ तो महिलाओं को हर महीने होने वाली माहवारी में ही हो जाती है.

खैर इसको छोड़िए, बलात्कार औरत की जिंदगी में एक डरावने सपने जैसा होता है. ये एक ऐसा मानसिक और भावनात्मक आघात है जिसमें हर दिन पीड़िता मरती है. 

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लंबी लड़ाई के बाद भी उसको न्याय मिलना तय नहीं होता. शायद सलमान खान की दुनिया में ये सारी तकलीफें जिम या शूटिंग के दौरान की जाने वाली कसरत से जांघों में हुए दर्द से की जाती होगी.

सलमान खान को कभी भी जिम्मेदारी भरे बयानों या व्यवहार के लिए नहीं जाना गया न ही उन्हें महिलाओं के प्रति संवेदनशीलता के लिए जाना जाता है. फिर भी उनके इस बयान पर काफी नाराज़गी जताई गई है. असल में हम इस पर जितना ज्यादा लिखते हैं, उतना ज्यादा खुद को कटघरे में खड़ा करते हैं.

हम चर्चा कर चुके हैं कि बलात्कार की ये संस्कृति कैसी है. हमने जिक्र किया है कि कैसे हम कई बार अनजाने में ही बलात्कार का जिक्र करते हैं. हमने उन शब्दों पर भी बात की है जिनमें बलात्कार की संस्कृति का ये भाव छिपा है. 

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जाने अनजाने इस तरह हमने बलात्कार को बहुत हल्के ढंग से लिया है. हम इसके बारे में ऐसे बात करते हैं जैसे जघन्य अपराध की जगह एक ऐसा अनुभव है जिसको महिला को अपनी पूरी क्षमता के साथ नज़रअंदाज कर देना चाहिए.

इस बलात्कार संस्कृति को खत्म करने के लिए पहले हमें अपने आपको और हमारे आसपास किसी को भी माफ करना बंद करना होगा. और सलमान के बयान पर नाराजगी जताना इसी निश्चय का हिस्सा है.

प्रियंका चोपड़ा इस संस्कृति की पैरोकार?

28 जून को आइफा अवार्ड समारोह के दौरान प्रियंका चोपड़ा भी इस मामले में कूद पड़ी. 

प्रियंका ने कहा, "मीडिया को और हम महिलाओं को एक हेडलाइन के लिए विवाद खड़ा करने के बजाय ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि हम अपनी ताकत असली समस्याओं पर लगाएं और देश में हर दिन महिलाओं के साथ जो हो रहा है उस पर बात करें. बिहार में हुए दर्दनाक बलात्कार जैसी कई वास्तविकताएं हैं, इन पर कोई क्यों नहीं बात करता है? सलमान मामले में बहुत कुछ कहा जा चुका है मैं उस पर नहीं बोलूंगी. मैं असली मुद्दों की तरफ ध्यान चाहती हूं. असली मुद्दा ये है कि हम देश में और आम तौर पर महिलाओं के प्रति बेहतर व्यवहार करना सीखें."

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प्रियंका का बयान बेहद निराशाजनक है क्योंकि इससे साफ पता चलता है कि वो बलात्कार की इस संस्कृति को समझती ही नहीं हैं. प्रियंका नहीं समझती कि ये बलात्कार की संस्कृति निरंतरता में है. जिसके एक हिस्से पर साफ दिखता है कि कैसे हम छोटी बच्चियों को वासना भरी निगाहों से देखकर उनको शर्मिंदा करते हैं. 

और इसी संस्कृति की निरंतरता का दूसरा हिस्सा है औरतों को डराना धमकाना, क्रूरता से उनके साथ बलात्कार करना, जैसा कि कथित तौर पर बिहार में हुआ.

इस संस्कृति के पहले हिस्से में लोग बलात्कार से जुड़े चुटकलों या मज़ाक पर हंसते हैं और यौन सम्बंधों में मर्दों के हावी होने के उल्लास का मज़ा लेते हैं और दूसरे घिनौने, आपराधिक हिस्से पर हर 6 में से एक महिला के साथ यौनशोषण के तथ्य को हम स्वीकार कर लेते हैं.

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प्रियंका मानती हैं कि ये दोनों हिस्से एक दूसरे जुदा हैं इसलिए वो एक का बचाव करती है और दूसरे पर बात करने के लिए जोर देती है. वह शब्दों की अनजानी ताकत को नहीं समझती हैं. 

प्रियंका नहीं समझ सकती कि हर जगह, हर वक्त बलात्कार के बारे में हल्के ढंग से बात करने से हम एक गंभीर मसले को सामान्य बना रहे हैं. इस तरह हम इस गुनाह के प्रति घृणा को कम कर रहे हैं.

इस तरह की हल्की बातें हमें बलात्कार जैसे घिनौने अपराध के प्रति उदासीन बनाते हैं और इसे छोटी-मोटी घटना मानकर नजरअंदाज करने की ओर बढ़ाते हैं. दूसरे शब्दों में कहें तो प्रियंका नहीं समझती हैं कि सलमान के बारे में बात करते हुए हम बिहार रेप की ही बात कर रहे हैं.

First published: 30 June 2016, 8:13 IST
 
स्नेहा वखारिया @sneha_vakharia

A Beyonce-loving feminist who writes about literature and lifestyle at Catch, Sneha is a fan of limericks, sonnets, pantoums and anything that rhymes. She loves economics and music, and has found a happy profession in neither. When not being consumed by the great novels of drama and tragedy, she pays the world back with poems of nostalgia, journals of heartbreak and critiques of the comfortable.

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