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एक छोटा बलोची बालक जो अपने बड़े संघर्षों से भारत का बड़ा अभिनेता बना

आदित्य मेनन | Updated on: 20 August 2016, 22:46 IST

इन दिनों बलोचिस्तान अपने आजादी के संघर्ष को लेकर चर्चा में है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वतंत्रता दिवस के अपने भाषण में इसका उल्लेख करके खुले आम जता दिया कि भारत इस संघर्ष में बलोचिस्तानियों के साथ है.

पर कुछ पल के लिए हम भू-राजनीति को एक तरफ रख कर उस शख्स की बात करते हैं, जो लगभग आठ दशक पहले अपने बालपन में बलोचिस्तान से मुंबई आया और बाद में बॉलीवुड की कुछ बेहद लोकप्रिय हस्तियों में शुमार हो गया.

ये हैं अभिनेता, पटकथा एवं संवाद लेखक और निर्देशक के तौर पर मशहूर कादर खान, जो उन विरल हास्य अभिनेताओं में हैं, जिन्हें अभिनय के लिए अन्य पुरस्कारों के साथ बेस्ट कॉमेडियन का भी अवार्ड मिला.

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पर यहां तक पहुंचने का सफर उनके लिए कतई आसान नहीं था, जैसा कि कुछ साल पहले एक साक्षात्कार में खान ने बताया, 'मेरी मां बलोचिस्तान में क्वेटा से थीं. मेरे पिता कांधार से थे. अधिकारिक रूप से मैं काबुल में जन्मा था, पर मेरे कुछ रिश्तेदार बताते हैं कि मेरा जन्म क्वेटा में हुआ था.'

हालांकि पठान होने के नाते, खान की मां का परिवार बलोचिस्तान के पिशिन से था. क्वेटा के उत्तर में 55 किमी दूर पिशिन बलोचिस्तान के पठान बहुल इलाके का हिस्सा है. दरअसल इस जिले में काफी संख्या में पठान परिवार रहते हैं.

मैं यह बताने के लिए उनका हमेशा आभारी रहूंगा क्योंकि मुझे ऐसे ही मालूम हुआ कि मैं वास्तव में कब जन्मा था

जन्मस्थान की तरह ही खान की जन्मतिथि भी बहुत उलझी हुई है. एक कार्यक्रम के दौरान खान ने कहा, 'मुझे बताया गया था कि मैं तब जन्मा था जब सोहराब मोदी की 'पुकार' रिलीज हुई थी. इसके कई सालों बाद मैंने सोहराब मोदी से फिल्म के रिलीज होने की तारीख पूछी, तो उन्होंने बताया कि वह अक्टूबर 1939 का साल था. मैं यह बताने के लिए उनका हमेशा आभारी रहूंगा क्योंकि मुझे ऐसे ही मालूम हुआ कि मैं वास्तव में कब जन्मा था.'

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उस समय क्वेटा और काबुल के हालात अच्छे नहीं थे, इसलिए उनके परिवार को अपना वतन छोड़कर मुंबई प्रवास करना पड़ा. तब की दुखद स्थितियों को याद करते हुए एक साक्षात्कार में कादर खान कहते हैं, 'वहां (क्वेटा और काबुल में) जीना बहुत मुश्किल हो गया था. मुझसे पहले मेरे मां-बाप के चार बेटे थे. सभी आठ की उम्र तक पहुंच कर गुजर गए. उसके बाद मैं जन्मा. मेरे पैरेंट्स के लिए बहुत मुश्किल घड़ी थी.'

खान ने अपनी बात जारी रखी, 'मेरी मां को परेशान किया गया था और उन्हें डर था कि मैं वहां नहीं बच पाऊंगा. फिर मेरे पैरेंट्स ने मुंबई शिफ्ट होने का फैसला किया. मुझ नन्हें, निर्जीव से बालक को बांहों में थामे, हजारों किलोमीटर की दूरी तय कर वे यहां मुंबई पहुंचे.'

पर संकट अभी खत्म नहीं हुआ था. शुरुआती दौर में मुंबई में उनका परिवार कमाठीपुरा की गंदी बस्ती में रहा. यह मुंबई का सबसे पुराना रेड लाइट क्षेत्र है. उन दिनों को याद करते हुए खान ने कहा, 'यह सबसे खराब जगह थी, जिसकी कोई कल्पना कर सकता है. सब जगह गंदगी थी. हम सैक्स वर्कर्स, हिजड़े, नशेड़ी और छोटे अपराधियों के बीच रहते थे. यह हमारे पैतृक जिले से बिल्कुल अलग जगह थी, जिसे हम पीछे छोड़ आए थे.'

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परिवार को एक और अग्नि परीक्षा से गुजरना पड़ा. जब खान छोटे ही थे, उनके माता-पिता अलग हो गए, उनका तलाक हो गया. क्वेटा से उनके मामा और नाना ने मां पर पुनर्विवाह के लिए जोर डाला क्योंकि उन्हें लगा कि मुंबई जैसे शहर में एक अकेली, खूबसूरत महिला नहीं रह पाएगी.'

परिवार का खर्च चलाने के लिए मैं बचपन में एक छोटी फैक्ट्री में काम करना चाहता था. लेकिन मां ने रोक दिया

उनके सौतेले पिता बढ़ई थे, जो खान के मुताबिक ज्यादा काम नहीं करते थे. आर्थिक तंगी के दौर को याद करते हुए खान आगे बताते हैं, 'इस तकलीफ में अपने परिवार का खर्च चलाने के लिए मैं बचपन में एक छोटी फैक्ट्री में काम करना चाहता था. लेकिन मां ने रोक दिया. उन्होंने कहा, जो 2-3 रुपए तुम कमाओगे, उससे अपनी गरीबी और भूख की समस्या का हल नहीं होगा. यदि तुम इससे बाहर निकालना चाहते हो, तो पढ़ो. तब तक मैं तुम्हारे लिए संघर्ष करूंगी. मां के इस हौसले के बाद मैंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा और अपनी पढा़ई पूरी करने में लगा रहा.'

खान ने इंजीनियरिंग में पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा किया और 1970 में भायखला में एमएच साबू सिद्दीक कालेज ऑफ इंजीनियरिंग में सिविल इंजीनियरिंग पढ़ाने लगे. उस समय उन्होंने कॉलेज के वार्षिक समारोह में एक नाटक में अभिनय किया था और सभी उपस्थित जनों ने उनकी तारीफ की थी.

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जाहिर तौर पर दिलीप कुमार भी पेशावर से मुंबई आए थे, उन्होंने खान के बारे में सुना और उनका अभिनय देखना चाहा. उनके अभिनय से कुमार इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने उन्हें 1970 में बंगाली फिल्म 'सगीना महतो' के लिए साइन किया.

इस तरह पेशावर से आए एक प्रवासी भारतीय दिलीप कुमार ने सिलिगुड़ी की पृष्ठभूमि पर बनी इस बंगाली फिल्म में कादर खान को अभिनय का मौका दिया और क्वेटा से आया यह प्रवासी भारतीय मुंबई फिल्म इंडस्ट्री का हिस्सा बना.

जीवन के आठवें दशक में भी उनका यह सफर जारी है.

First published: 20 August 2016, 22:46 IST
 
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