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पहली बार आई व्यू वर्ल्ड फिल्म फेस्टिवल दिल्ली में

असद अली | Updated on: 24 February 2016, 13:14 IST

अगले महीने यानी दो से लेकर आठ मार्च तक दिल्ली में आई व्यू वर्ल्ड इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल का आयोजन किया जाएगा. यह एक ऐसा फिल्म महोत्सव है जिसमें लिंग, मानवाधिकार और समाज-संस्कृति से जुड़े संवेदनशील मुद्दों पर आधारित फिल्मों का प्रदर्शन किया जाता है. इस महोत्सव में वो फिल्में, शॉर्ट फिल्में और डॉक्यूमेंट्री दिखाई जाएंगी जो दुनिया के किसी भी हिस्से जब स्क्रीन की गईं तो उन्होंने काफी प्रभाव छोड़ा. 

अब वक्त दिल्ली का आ गया है. इसका आयोजक एनजेंडर्ड एक अंतरराष्ट्रीय कला और मानवाधिकार संगठन है. वर्ष 2008 में न्यूयॉर्क के बाद से यह संगठन फिल्म महोत्सव का लगातार आयोजन करता आया है. पहली बार इसका इसका आयोजन भारत में किया जा रहा है. 

आयोजकों द्वारा इसे भारत लाने के बारे में महोत्सव की निदेशक मायना मुखर्जी कहती हैं, "जब बात लिंगभेद और हाशिए पर पड़े लोगों के मानवाधिकारों की आती है तो दक्षिण एशिया में अभी भी काफी चुप्पी देखने को मिलती है."

हरामखोर और जय गंगाजल जैसी हालिया दो भारतीय फिल्मों का भी महोत्सव में प्रीमियर किया जाएगा. इसके अलावा यूरोप में शरणार्थी समस्या पर बनी डॉक्यूमेंट्री के अलावा मीरा नायर की फिल्मों के साथ ही आई व्यू वर्ल्ड फेस्टिवल में तमाम ऐसी फिल्में दिखाई जाएंगी जो दर्शकों के दिलों को छू लेंगी.

इस महोत्सव के दौरान दिखाई जाने वाली सात ऐसी फिल्मों के बारे में जानिए जो दर्शकों को प्रभावित कर सकती है.

धीपान (जैक्युस ऑडियर्ड, फ्रांस)

2015 में आई यह क्राइम ड्रामा फिल्म तीन श्रीलंकाई शरणार्थियों की यात्रा पर आधारित है. जो अपने संकटग्रस्त देश से भाग जाते हैं. लेकिन इसके बाद वे एक अन्य युद्ध प्रभावित क्षेत्र में खुद को फंसा पाते हैं.

अलीगढ़ (हंसल मेहता, भारत)

राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त फिल्म निर्माता हंसल मेहता की समकालीन भारत के लिए विशेष रूप से प्रासंगिक इस फिल्म का पिछले साल जियो ममी में प्रीमियर किया गया था. प्रो. श्रीनिवास रामचंद्र सिरास के वास्तविक जीवन की कहानी पर आधारित इस फिल्म में दिखाया गया है कि कैसे अपनी यौन पहचान की वजह से उन्हें भेदभाव का सामना करने के साथ ही अपनी नौकरी खोनी पड़ी.

सफ्फरगेट्टे (सारा गैवर्न, ब्रिटेन)

एकेडमी अवॉर्ड नॉमिनी कैरी मुलिगन और हेलेना बॉनहैम कार्टर और तीन बार एकेडमी अवॉर्ड जीतने वाली मेरिल स्ट्रीप ने इस ड्रामा में 20वीं शताब्दी की शुरुआत में ब्रिटेन में समानता के अधिकारों के लिए लड़ाई को दिखाया है.

द ड्रीम ऑफ शाहराजाद (फ्रैंकोइज वर्सटर, भारत)

फीचर फिल्म जितनी लंबी इस डॉक्यूमेंट्री में मिस्र की क्रांति के साथ तुर्की और लेबनान के राजनीतिक माहौल को दिखाया गया है. मशहूर कहानी संग्रह 1001 अरेबियन नाइट्स के अनूठे ढांचे में बुनी गई यह डॉक्यूमेंट्री दिल को छू लेती है.

एवैपोरेटिंग बॉर्डर्स (ईवा रैडिवोरेविक, अमेरिका)

यह वृत्तचित्र कथा साइप्रस द्वीप पर विस्थापन और राजनीतिक प्रवासियों की निरंतर पहचान खोजने पर आधारित है. इस फिल्म को बनाने के लिए शायद फिल्म निर्देशक को पूरी सामग्री मिल चुकी थी क्योंकि उन्होंने सर्बियाई और क्रोएशियाई पूर्वजों वाले परिवार में पूर्व युगोस्लाविया में जन्म लिया था. इसके बाद वो साइप्रस में पले बढ़े और अमेरिका में शिक्षा पाई.

रीलैप्स (रोजी हेबर, अमेरिका)

मोनिका डोगरा और केसी लेगलर अभिनीत 13 मिनट की इस लघु फिल्म में प्यार में पड़ी दो महिलाओं के बारे में दिखाया गया है, जो बीमारी के चलते टूट जाती हैं. यह दोनों अभिनेत्रियां फैशन वर्ल्ड की चुनिंदा ट्रांसजेडर मॉडल्स में से हैं.

लीचेस (पायल सेठी, भारत)

27 मिनट की यह लघु फीचर फिल्म 16 वर्षीय किशोरी रईसा पर आधारित है. जो अपनी छोटी बहन को कॉन्ट्रैक्ट मैरिज से बचाने के लिए एक जोखिम भरी योजना बनाती है. यह कॉन्ट्रैक्ट मैरिज हैदराबाद के कुछ इलाकों में मुसलमानों के बीच काफी लोकप्रिय है.

First published: 24 February 2016, 13:14 IST
 
असद अली @asadali1989

Asad Ali is another cattle class journalist trying to cover Current affairs and Culture when he isn't busy not saving the world.

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