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लेडीज रूम: ताजा हवा का झोंका नहीं बल्कि पूरा तूफ़ान है

पलाश कृष्ण मेहरोत्रा | Updated on: 18 September 2016, 8:14 IST

जेएनयू की पूर्व छात्रा आशिमा छिब्बर निर्देशित और रत्नाबली भट्टाचार्जी और नेहा कौल मेहरा द्वारा लिखित इस वेब सीरीज में सबा आजाद और श्रेया धन्वंतरी ने डिंगो और खन्ना के किरदार निभाए हैं.

पूर्व में नेह मेहरा 'गर्लियापा' एपिसोड (यह भी एक वेब सीरीज थी) और 'हाउ आई रेप्ड योर मदर' जैसे वेब सिरीज की स्क्रिप्ट लिख चुकी हैं. 'हाउ आई रेप्ड योर मदर' शादीशुदा जिंदगी में होने वाले जबरन रेप जैसे संजीदा विषय पर बेचैन कर देने वाली हास्य प्रस्तुति थी.

'लेडीज रूम' के 6 एपिसोड्स हैं, उनमें से हरेक को 1,00,000 से भी ज्यादा बार देखा गया है और यूट्यूब पर इसके करीब 70 लाख दर्शक हैं. फिलहाल इस पर एक पूरी फिल्म बनाने की योजना भी चल रही है.

खन्ना और डिंगो बीस साल की किशोरवय लड़कियां हैं और जिस तरह की वे बातें करती हैं, पूरी दुनिया में इस उम्र की लड़कियां अमूमन ऐसे ही विषयों पर और इसी अंदाज में बातें करती हैं: ड्रग्स के साथ प्रयोग (ट्रिपिंग बॉल्स), सेक्स ऑन टिंडर, कामुक दोस्त, गर्भपात, पुरुष प्रधान बॉस और दफ्तर का सबसे घिनौना शख्स आदि.

जिस बात ने इस वेब सिरीज की ओर हमारा ध्यान सबसे पहले खींचा, वे थे इस वेब सिरीज के संवाद. कुछ-कुछ इसी अंदाज में आज की पीढ़ी बोलती है, और शो की दोनों लेखिकाएं बड़ी सहजता से बोलचाल की भाषा को पकड़ने मे कामयाब रही हैं. इसके लिए उनकी तारीफ अलग से होनी चाहिए. यह शो इस मायने में भी हटकर है क्योंकि इसमें ('गर्लियपा' की तरह) प्रत्यक्ष संदेश देने की कोशिश नहीं की गई है. शो से दर्शक क्या लेते हैं, यह उनके विवेक पर छोड़ दिया गया है.

तुम जैसे एबॉर्शन टाइप्स...

शो का एक एपिसोड 'डिक्स, पिक्स और डिक पिक्स' कन्या भ्रूण हत्या पर है, जिममें निर्माताओं ने एक ऐसे यथार्थ को खूबसूरती के साथ पेश किया है, जिस पर समझौता नहीं किया जा सकता, और वे इसमें आपको गुदगुदाते हुए संदेश नहीं दे रहे हैं.

इसका यथार्थ और संजीदा हास्य, दर्शकों को शब्दों के पीछे के भाव समझने को बाध्य करता है और उनके जेहन में झकझोरने वाले प्रश्न उभर कर आते हैं. 'डिक्स, पिक्स और डिक पिक्स' में डिंगो और खन्ना लोटस मेटरनिटी क्लिनिक जाती हैं. यहां दो अलग-अलग भारत आपस में टकराते हैं.

पहला वह भारत, जहां बिंदास सिंगल लड़कियों के विवाह पूर्व लड़कों के साथ यौन संबंध हैं और उन्हें गर्भपात करवाने में शर्म नहीं आती है. औरतें अपने शरीर की मालिक खुद हैं. दूसरा भारत उसी क्लिनिक में कन्या भ्रूण हत्या के लिए जाता है.

वह पाखंडी नर्स बाद वाली इंडिया के लिए बेहद कोमल और संवेदनशील है, पर पहले वाली इंडिया के लिए नफरत रखती है. खन्ना के विवाह पूर्व संबंधों की ओर इशारा करते हुए वह पाखंडी नर्स घृणा से कहती है, 'तुम जैसे एबॉर्शन टाइप्स'. जबकि 'कन्या भ्रूण हत्यारी' महिलाओं और उनके परिवार के साथ उसकी पूरी आत्मीयता है.

डिंगो और खन्ना चिकित्सा प्रक्रिया के प्रति बेहद हिकारत भरा नजरिया रखती हैं:

खन्ना: शिट्टी टिट्टी दीदी (नर्स की ओर इशारा) प्रोब को मेरी योनि में इस तरह घुमा रही थी जैसे मथनी का इस्तेमाल कर रही हो.

डिंगो: इसमें कोई शक नहीं कि इसने मुझे थोड़ा उत्तेजित कर दिया था.

खन्ना (अविचलित, उदासीन): हां, डिंगो, सही कह रही हो. अरे भाई, तुम्हें किसी के साथ की जरूरत है.

सही स्वाइप किया?

इस बीच खन्ना के ऑफिस में काम करने वाले घटिया शख्स अच्युत गिरोडिया ने डिंगो को टिंडर पर संदेश दिया, जिसे डिंगो जोर से पढ़ती है: 'बेबी, तुमने मुझे ऐस्ट्रोनॉट बना दिया क्योंकि मैं तुम्हारे ... में भ्रमण करना चाहता था.'

हमें मालूम हुआ कि गिरोडिया की पत्नी ने तीसरे बेटे की आस में दो बार गर्भपात करवाया है. 'लास्ट दो बार गिरा के लगा था कि इस बार मेरे घर में खुशियां आएंगी ही नहीं.'

उसने अच्युत के साथ अपनी शादी को लेकर गर्व से कहा था, 'जयपुर के नं. वन बेचलर, अब बॉम्बे के नं. वन हस्बैंड हैं.'

पर आज बात अलग है. उसकी गैरकानूनी जांचें बताती हैं कि बेटा ही होगा. खबर सुनने के बाद आरती गिरोडिया (जिन्हें लड़कियां मोटी गिरोडिया कहती हैं) खुशी से फूट पड़ती है- 'मैं सोचती हूं कि सूर्योदय के समय डॉगी शुभ है ना!'

और यह सब वेलेंटाइन डे पर होता है.

शो औरतों तक सीमित नहीं

जहां लेडीज रूम महिलाओं पर केंद्रित शो है लेकिन इसे सिर्फ इसी दायरे में बांधना ठीक नहीं होगा. यह महिलाओं के प्रति प्राय: बनी रहने वाली रोमांटिक या भावनात्मक थीम से आगे जाकर विषयों को छूती है.

यह शो जितना औरतों के बीच हिट है, उतना ही पुरुषों के बीच भी. शो का प्रभाव कितना व्यापक रहा है, यह इससे पता चलता है कि लड़के अपनी खन्ना फ्रैंड को असल जिंदगी में 'खन्नी' कहने लगे हैं, जिस तरह से डिंगो अपनी बेस्ट फ्रैंड को पुकारती है.

लेडीज रूम का एक और पहलू, जो उसे केवल औरतों तक सीमित नहीं रखता, वह है उसकी भाषा. हम जानते हैं, महानगरों में भारतीय युवा इस तरह से बोलते हैं, पर हमने उन्हें कभी ऐसा बोलते नहीं सुना, ना तो फिल्मों में और ना ही किताबों में.

चेतन भगत के पात्र इस तरह नहीं बोलते. ना ही '3 इडियट्स' में भारतीय युवा. और चूंकि संयोग से शो के दो पात्र औरतें हैं, सच तो यह है कि भारतीय युवक भी इस तरह से बोलते हैं: 'उसे उसकी ही चाल से मात दो, बहन...द', या जब बॉस खन्ना का फोन आए तब: 'बहन...द काट दिया.'

नशा मनबहलाव के लिए

इन विषयों को किसी ने भी फिल्मों में ईमानदारी से रिप्रोड्यूस नहीं किया है, जिस तरह से युवाओं में नशे का सेवन कभी भी मान्य मनबहलाव के तौर पर नहीं लिया गया जबकि यह एक शहरी हकीकत है.

लेडीज रूम में दिखाया गया है कि हालांकि भारतीय युवा रिक्रिएशन के लिए एमडीएमए (ड्रग) का प्रयोग कर रहे हैं, पर जरूरी नहीं कि अंत में वे नाउम्मीद नशेड़ी हो जाएं और अपनी लालसा को पूरा करने के लिए मां की हत्या करने तक में नहीं हिचकिचाएं.

हमारे सिनेमा में जीवन से जुड़े असली संवाद होते हैं, पर ये शहर में रहने वाले मध्यम वर्ग पर लागू नहीं होते. जब इस वर्ग की बात आती है, संवाद लेखक लिखने से पहले हमेशा सोचते हैं. अश्लील संवाद ज्यादातर डाकू (बैंडिट क्वीन), पश्चिम यूपी के सामंती गैंगस्टर्स (ओंकारा) और पुलिस वाले और नशे के आदी (उड़ता पंजाब) लोगों के लिए ही प्रयोग किए जाते हैं.

पर हम? द्विभाषी वर्ग, जहां से लेखक और एक्टर्स आते हैं?

लेडीज रूम शहरी युवाओं की भाषा को पकड़ने में सफल रहा है और इसीलिए क्रातिकारी है. जिन्होंने इस शो पर पैसा लगाया है, उनके लिए दो शब्द... यशराज फिल्म्स का यह कदम इस बात का सूचक है कि उनका नजरिया अपेक्षाकृत प्रगतिशील हो गया है.

दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे जैसी वेडिंग म्युजिकल्स देने वाले यशराज अब लेडीज रूम को सहयोग देने को तैयार हैं. भारत बदल गया है. वाइआरएफ बदल गया है. तो वाइ क्यों नहीं. लेडीज रूम जिस तरह से झकझोरता है, उतना कोई और नहीं.

(लेखक की नई किताब 'हाउस स्पिरिट: ड्रिंकिंग इन इंडिया' हाल में प्रकाशित हुई है)

First published: 18 September 2016, 8:14 IST
 
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