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मिर्ज्या मूवी रिव्यूः समीक्षकों की राय काफी जुदा

कैच ब्यूरो | Updated on: 7 October 2016, 12:54 IST

शुक्रवार को अनिल कपूर के बेटे हर्षवर्धन कपूर और सय्यामी खेर द्वारा अभिनीत मिर्जा-साहिबा की प्रेम कहानी पर आधारित फिल्म मिर्ज्या सिनेमाघरों में रिलीज हो गई. लेकिन जिस हिसाब से तीन सप्ताह पहले रिलीज हुई पिंक को लेकर तकरीबन सभी समीक्षकों की एक ही राय थी, मिर्ज्या के साथ ऐसा नहीं है और समीक्षकों की राय काफी जुदा है.

कैच अपने पाठकों को एक ही मंच पर अलग-अलग मीडिया घरानों के समीक्षकों द्वारा दी गई रेटिंग से रूबरू करा रहा है ताकि दर्शक इस फिल्म को लेकर एक बड़ी राय बना सकें और फिल्म का भी एक बड़ा परिदृश्य सामने आ सके. बता दें कि राकेश ओमप्रकाश मेहरा द्वारा निर्देशित फिल्म में अनुज चौधरी, आरती मलिक, अंजलि पाटिल, केके रैना और ओमपुरी ने भी भूमिका निभाई है.

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इंडियन एक्सप्रेस की शुभ्रा गुप्ता ने लिखा है कि फिल्म पूरी तरह आई कैंडी है यानी आपकी आंखें फिल्म पर टिकी रहेंगी लेकिन इसमें रोमांस नहीं है. उन्होंने लिखा कि हर्षवर्धन कपूर और सैय्यामी खेर की फिल्म बहुत खूबसूरत है, भव्य निर्माण किया गया है लेकिन फिल्म की सबसे बड़ी कमी दोनों के बीच वो जरूरी बात है जो आपस के प्यार को पर्दे पर जिंदा कर देती. उन्होंने फिल्म को 5 में 1.5 स्टार दिए हैं.

हिंदुस्तान टाइम्स के रोहित वत्स ने फिल्म को राजस्थान में शेक्सपीयर की एक रंगबिरंगी कविता बताया है. उन्होंने लिखा कि लोग पंजाब की मशहूर मिर्जा-साहिबा की प्रेमकथा के बारे में जानते हैं लेकिन वे देखना चाहते थे कि कैसे मेहरा इसे दिखाते हैं. फिल्म में कई तकनीकी खूबियां दिखाने के साथ ही इसे पर्दे पर प्रभावी दिखाया गया है लेकिन 135 मिनट की यह फिल्म दर्शकों का दिल छू लेने वाली प्रेम कहानी के रूप में नजर नहीं आती. वत्स ने फिल्म को 2.5 अंक दिए हैं.

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टाइम्स ऑफ इंडिया की मीना अइय्यर ने फिल्म को भारी भरकम 3.5 अंक दिए हैं. उन्होंने लिखा कि पंजाब के मशहूर लोक साहित्य मिर्जा-साहिबा की कहानी को पर्दे पर राजस्थान में दिखाया गया और सिनेमैटोग्राफर पावेल डाइलस ने इसे अद्भुत रूप से दिखाया है. फिल्म की कई खूबियों के अलावा इसकी कमी दोनों मुख्य कलाकारों के बीच जुनून की कमी है जो पर्दे पर कमाल नहीं दिखाती. इसके अलावा सभी को मालूम असल कहानी का संघर्ष और रहस्य भी फिल्म से गायब है.

दैनिक जागरण के अजय ब्रह्मात्मज ने फिल्म को 3 स्टार दिए हैं और लिखा है कि राकेश मेहरा की यह फिल्म दो कहानियों को एक साथ लेकर चलती है. एक कहानी पंजाब की लोककथा मिर्जा-साहिबा की है तो दूसरी मौजूदा राजस्थान के आदिल-सूची की. हालांकि रंग दे बसंती की तरह दो कहानियों को अपारंपरिक तरह से जोड़ने में वे सफल नहीं हो सके. फिल्म भव्य और सुंदर है लेकिन कमी है तो कंटेंट की. फिल्म बांध नहीं पाती.

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बीबीसी के सुशांत एस मोहन लिखते हैं मेहरा ने फिल्म में बड़ी कमाल की सिनेमैटोग्राफी के साथ प्रेम कहानी दिखाने की कोशिश की है लेकिन इसे एक सरल फिल्म बनाने की जगह वो फिल्म में कहानी को तीन अलग ट्रैक पर चलाते हैं और यहीं से फिल्म आम दर्शकों के मीटर से बाहर चलने लगती है. फिल्म को इतना आर्टिस्टिक टच दिया गया है कि दर्शक परेशान हो सकते हैं. फिल्म का संगीत कानफोड़ू है. वीकेंड पर हजार रुपयों तक की टिकट खरीद कर आप इसे देखें ऐसी सलाह नहीं दी जा सकती लेकिन मना भी नहीं कर सकते हैं, क्योंकि आपकी निजी पसंद है.

First published: 7 October 2016, 12:54 IST
 
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