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माही के पैतृक गांव के लोग नहीं देख पाए 'एमएस धोनी: द अनटोल्ड स्टोरी'

राजू गुसाईं | Updated on: 3 October 2016, 7:47 IST

सुपरस्टार क्रिकेटर महेन्द्र सिंह धोनी के जीवन पर बनी बॉयोपिक 'एमएस धोनी: दि अनटोल्ड स्टोरी' ने पूरे देश में सुर्खियां बटोर ली हैं. पूरे भारत के क्रिकेट प्रेमियों को यह फिल्म अच्छी लगी है क्योंकि इसमें धोनी के सभी प्रमुख मैचों की झलकियां हैं. फिल्म में धोनी की भूमिका अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत ने निभाई है. सुशांत सिंह ने धोनी की बॉडी लैंग्वेज, खेलने की शैली आदि को सटीक रूप से आत्मसात किया है.

पर विडम्बना तो यह है कि महेन्द्र सिंह धोनी के परिवार के लोग ही इस फिल्म को बड़े पर्दे पर नहीं देख पाएंगे. धोनी का पैतृक गांव उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले के लवाली गांव में है. उनके पिता के भाई गणपत अभी भी वहां रहते हैं. लेकिन न तो गणपत न ही अन्य गांव वाले यह फिल्म देख पाएंगे. इस गांव से सबसे नजदीकी सिनेमाघर लगभग 180 किलोमीटर दूर है.

गांव बहुत दूर

लवाली से सबसे नजदीकी सड़क जैनेती है जो गांव से पांच किमी दूर है. यदि किसी को फिल्म देखनी हो तो उसे जीप या बस से 175 किलोमीटर की यात्रा कर नैनीताल जिले के हल्द्वानी आना होगा. हालांकि लवाली से जिला मुख्यालय 75 किलोमीटर ही है लेकिन वहां पर कोई सिनेमा हॉल नहीं है.

अल्मोड़ा के एक स्थानीय निवासी दीप जोशी कहते हैं कि अल्मोड़ा में पहले दो सिनेमा हॉल थे लेकिन वे दोनों आठ-नौ साल पहले बन्द हो गए. गांव के रिमोट लोकेशन पर होने के कारण लवाली के लोगों का उत्साह धरा का धरा ही रह गया है. उन्हें तो तभी अपने धोनी की फिल्म देख पाना नसीब होगा जब वह फिल्म टेलीविजन पर दिखाई जाएगी.

धोनी और उनकी पैतृक जड़ें

धोनी के पैतृक गांव तक जाने के लिए एक टेढ़ी-मेढ़ी और उबड़-खाबड़ सड़क से होकर गुजराना पड़ता है. यहां जाते समय ग्रामीणों को अपने खेतों में काम करते हुए और महिलाओं को अपने पशुओं के लिए चारा काटते और सिर पर ले जाते देखा जा सकता है. लवाली गांव भी उत्तराखंड के अन्य गांवों की तरह ही है. सीमित संसाधनों वाला एक दू-दराज का गांव.

यह गांव हालांकि सड़क से जुड़ा हुआ है लेकिन विकास से कोसों दूर है. एक बड़ी विडम्बना यह भी है कि इस गांव में कोई खेल का मैदान भी नहीं है. गांव में लगभग 50 परिवार हैं और यहां की आबादी 500-550 के आसपास है.

धोनी के चचेरे भाई हेयात कहते हैं कि जब कोई बीमार होता है तो हम लोग उसे खाट पर लादकर निकटतम अस्पताल में ले जाते है. यह अस्पताल जैनेती में है. वह कहते हैं कि हम लोगों ने हाल ही में जिला प्रशासन को गांव में स्टेडियम बनाने के लिए एक प्रस्ताव भेजा है. स्टेडियम के लिए गांव वाले अपनी भूमि भी देने को तैयार हैं लेकिन अभी तक कुछ नहीं हुआ है.

धोनी का पैतृक निवास स्थान.

महेन्द्र सिंह के पिता पान सिंह ने 1972-73 में उस समय गांव छोड़ दिया था, जब उनकी रांची स्टील फैक्ट्री में नौकरी लगी थी. महेन्द्र भी गांव में आखिरी बार 2003 में आए थे. सम्भवतः व्यस्तता के कारण वे गांव ने आ सके हों. महेन्द्र सिंह का विवाह जब 2011 में देहरादून में हुआ था, उस समय उनके कई रिश्तेदार बहुत ही चुपचाप तरीके से गांव से उनके विवाह में शामिल होने आए थे. 

लवाली गांव में रहने वाले पूरन भंडारी कहते हैं, 'पान सिंह चाचा 2011 में एक विवाह कार्यक्रम में शामिल होने के लिए गांव आए थे. चाचा रांची में रहने के लिए कई साल पहले गांव छोड़कर चले गए थे पर वह अभी भी अपना सम्पर्क गांव से रखे हुए हैं.'

सफेद पैंट, काला जैकेट और ऊनी टोपी पहने धोनी के पिता पान सिंह. 2011 में गांव पहुंचे धोनी के पिता की फाइल फोटो.

लवाली गांव आया सबकी निगाह में

धोनी के अंतरराष्ट्रीय जगत में नाम कमाने के बाद लवाली गांव मीडिया और उनके मित्रों के बीच सुर्खियों में आ गया. हाल के वर्षों में कई क्रिकेट प्रेमी इस गांव में आ चुके हैं. पहाड़ की सैर करने वाले कई अन्य लोग भी यहां आ जाते हैं.

जब कभी यह अफवाह उड़ती है कि धोनी अपने गांव आने वाले हैं तो मीडिया का हुजूम भी उमड़ पड़ता है. लेकिन इतना होने पर भी गांव वालों के लिए अपने लाड़ले पुत्र पर बनी फिल्म को देखना आसान नहीं है. सभी लोग इंतजार में हैं कि टीवी पर यह फिल्म आए और वे उसे धोनी के पैतृक घर में लगे टीवी पर देखें.

First published: 3 October 2016, 7:47 IST
 
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