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...गर अब्बा की ख्वाहिश पूरी होती तो दुनिया नुसरत की रूहानी आवाज से महरूम हो जाती!

कैच ब्यूरो | Updated on: 13 October 2017, 10:00 IST

एक एेसी आवाज जिसे सुनकर सिर सजदे में झुक जाए. आवाज का एेसा तिलिस्म जिसकी आगोश में खुद ब खुद हर शख्स खिंचा चला जाए. हम बात कर रहे हैं सूफियाना आवाज के मालिक नुसरत फतेह अली ख़ान साहब की. खुदा का यह नूर करम बनकर आज ही के दिन दुनिया में आया था.

 

पाकिस्तान बनने के लगभग साल भर बाद नुसरत का जन्म पंजाब के लायलपुर (मौजूदा फैसलाबाद) में हुआ. वो 13 अक्टूबर 1948 को कव्वालों के घराने में जन्मे. सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि नुसरत फतेह अली के अब्बा नहीं चाहते थे कि वो अपनी तरह अपनी औलाद को भी अपनी तरह कव्वाल बनाए. उन्हें लगता था कि कव्वालों की लोग इज्जत नहीं किया करते. ये अलग बात है कि बाद में वो नुसरत फतेह अली खान को संगीत सीखने की इजाजत दे बैठे और उसके बाद जो कुछ हुआ वो पूरी दुनिया में दर्ज है.

नुसरत फतेह अली खान की चार बहने थीं और दो छोटे भाई थे. पिता उस्ताद फतेह अली खान साहब खुद भी मशहूर कव्वाल थे. उन्होंने बड़े बेमन से गायन सीखने की मंजूरी दी. नुसरत को पहले तबला सिखाना शुरू किया लेकिन बाद में नुसरत ने गायन को ही अपना मुकाम बना लिया.

 

दुनिया में शोहरत 1985 लंदन में वर्ल्ड ऑफ म्यूजिक आर्ट एंड डांस फेस्टिवल के जरिए हासिल की. इसमें उन्होंने पीटर गैब्रिएल के साथ अपना म्यूजिक दुनिया के सामने रखा. इसके बाद तो चमत्कार हो गया, जिसने भी इसे सुना वो इसका दीवाना बन गया. ऐसा निराला अंदाज, दुनिया भर में जो लोग पंजाबी-उर्दू और कव्वाली नहीं भी समझ पाते थे, वो भी उनकी आवाज, और अंदाज के दीवाने हो गए.

नुसरत ने ज्यादातर गीत उर्दू और पंजाबी में गाए, लेकिन उन्होंने फारसी, हिंदी और ब्रजभाषा में भी गीतों को सुर दिए. पूर्व और पश्चिम के आलौकिक फ्यूजन में भी उन्होंने अपना पंजाबीपन और सूफियाना अंदाज नहीं छोड़ा, न ही खुद से कोई छेड़-छाड़ की और फ्यूजन को एक नई परिभाषा दी.

First published: 13 October 2017, 9:59 IST
 
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